भविष्य महा पुराण

सप्तमी-कल्पमें भगवान् सूर्यके परिवारका निरुपण एवं शाक-सप्तमी-व्रत

सुमन्तु मुनिने कहा- राजन्! अब मैं सप्तमी कल्पका वर्णन करता हूँ। सप्तमी तिथिको भगवान् सूर्वका आविर्भाव हुआ था। वे अण्ण्ड के साथ उत्तन्न और अण्ड रहते हुए ही उन्होंने बद्धि प्राप्त की। बहुत दिनोंतक अण्डमें रहनेके कारण ये 'मार्तण्ड' के नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये अण्डमें ही स्थिततो दक्ष प्रजापतिने अपनी रुपवती कन्या रूपाको भायकि रूपमें इन्हें अर्गित किया*। दक्षकी आज्ञासे विश्वकर्माने इनके शरीरका संस्कार किया, जिससे ये अतिशय तेजस्वी हो गये। अण्डमें स्थित रहते ही इन्हें यमुना एवं यम नामकी दो संतानें प्राप्त हुई। भगवान् सूर्यका तेज सहन न कर सकनेके कारण उनकी स्त्री व्याकुल हो सोचने लगी-इनके अतिशय तेजके कारण मेरी दृष्टि इनकी ओर ठहर नहीं पाती, जिससे इनके अङ्गोंको मैं देख नहीं पा रही हूँ। मेरा सुवर्ण वर्ण, कमनीय शरीर इनके तेजसे दाध हो श्यामवर्णका हो गया है। इनके साथ मेरा निर्वाह होना बहुत कठिन है। यह सोचकर उसने अपनी छायासे एक स्त्री उत्पन्न कर उससे कहा-'तुम भगवान् सूर्यके समीप मेरी जगह रहना, परंतु यह भेद खुलने न पाये।' ऐसा समझाकर उसने उस छाया नामकी स्त्रीको वहाँ रख दिया तथा अपनी संतान यम और यमुनाको वहीं छोड़कर वह तपस्या करनेके लिये उत्तरकुरु देशमें चली गयी और वहाँ घोडीका रूप धारण कर तपस्यामें रत रहते हुए इधर-उधर अनेक वर्षातक घूमती रही।

'भगवान् सूर्यने छायाको हो अपनी पली समझा। कुछ समयके बाद छायासे शनैश्चर और तपती नामको दो संतानें उत्पन्न हुई। छाया अपनी संतानपर यमुना तथा यमसे अधिक स्नेह करतो थी। एक दिन यमुना और तपतीमें विवाद हो गया। पारस्परिक शापसे दोनों नदी हो गयीं। एक बार छायाने यमुनाके भाई यमको ताडित किया। इसपर यमने क्रुद्ध होकर छायाको मारनेके लिये पैर उठाया। छायाने कुर होकर शाप दे दिया-

'मूढ ! तुमने मेरे ऊपर चरण उठाया है, इसलिये तुम्हारा प्राणियों का प्राणहिंसक रूपी यह बीभत्स कर्म तबतक रहेगा, जबतक सूर्य और चन्द रहेंगे। यदि तुम मेरे शापसे कलुषित अपने पैरको

पृथ्वीपर रखोगे तो कृमिगण उसे खा जायेंगे।'

यम और छायाका इस प्रकार विवाद हो हो रहा था कि उसी समय भगवान् सूर्य वहां आ पहुँचे। यमने अपने पिता भगवान् सूर्यसे कहा- 'पिताजी! यह हमारी माता कदापि नहीं हो सकती, यह कोई और स्त्री है। यह हमें नित्य क्रूर भावसे देखती है और हम सभी भाई-बहनों में समान दृष्टि तथा समान व्यवहार नहीं रखती। यह सुनकर भगवान् सूर्यन क्रुद्ध होकर छायासे कहा- 'तुम्हें यह उचित नहीं है कि अपनी संतानों में ही एकसे प्रेम करो और दूसरेसे द्वेष । जितनी संताने हों सबको समान ही समझना चाहिये। तुम विषम- दृष्टिसे क्यों देखती हो? यह सुनकर छाया तो कुछ  न बोली, पर यमने पुनः कहा-'पिताजी! यह दुष्टा मेरी माता नहीं है, बल्कि मेरी माताकी छाया है। इसीसे इसने मुझे शाप दिया है।' यह कहकर यमने पूरा वृत्तान्त उन्हें बतला दिया। इसपर भगवान् सूर्यने कहा--'बेटा ! तुम चिन्ता न करो कृमिगण मांस और रुधिर लेकर भूलोकको चलें जायेंगे, इससे तुम्हारा पाँव गलेगा नहीं, अच्छा हो जायगा और ब्रह्माजीकी आज्ञासे तुम लोकपालपदक भी प्राप्त करोगे। तुम्हारी बहन यमुनाका जल गङ्गाजलके समान पवित्र हो जायगा और तपतीक जल नर्मदाजलके तुल्य पवित्र माना जायगा। आजसे यह छाया सबके देहोंमें अवस्थित होगी।'

ऐसी व्यवस्था और पर्यादा स्थिर कर भगवान सूर्य दक्ष प्रजापतिके पास गये और उन्हें अपने आगमनका कारण बताते हुए सम्पूर्ण वृत्तान्त कत्त सुनाया। इसपर दक्ष प्रजापतिने कहा-'आपके  अति प्रचण्ड तेजसे व्याकुल होकर आपकी भाय उत्तरकुरु देशमें चली गयी है। अब आप विश्वकर्मा ने अपना रूप प्रशस्त करवा लें। यह कहकर उन्होंने

*सूर्यकी पश्री रुपा का दूसरा नाम संज्ञा है। अन्य पुराणोंमें संज्ञाकी विश्वकर्मकी पुत्री कहा गया है।

विश्वकर्माको बुलाकर उनसे कहा-'विश्वकर्मन् ! आप इनका सुन्दर रूप प्रकाशित कर दें। तब सूर्यकी सम्मति पाकर विश्वकर्माने अपने तक्षण- कर्मसे सूर्यको खरादना प्रारम्भ किया। अङ्गोंके तराशनेके कारण सूर्यको अतिशय पीड़ा हो रही थी और बार-बार मूर्छा आ जाती थी। इसीलिये विश्वकर्मान सब अङ्ग तो ठीक कर लिये, पर जब पैरोंको अङ्गुलियोंको छोड़ दिया तब सूर्य भगवान्ने कहा-'विश्वकर्मन्! आपने तो अपना कार्य पूर्ण कर लिया, परंतु हम पीड़ासे व्याकुल हो रहे हैं। इसका कोई उपाय बताइये।' विश्वकर्माने कहा-'भगवन् ! आप रक्त चन्दन और करवीरके. पुष्पोंका सम्पूर्ण शरीरमें लेप करें, इससे तत्काल यह वेदना शान्त हो जायगी।' भगवान् सूर्यने विश्वकांके कथनानुसार अपने सारे शरीरमें इनका लेप किया, जिससे उनकी सारी वेदना मिट गयी। उसी दिनसे रक्त चन्दन और करवीरके पुष्प भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हो गये और उनकी पूजामें प्रयुक्त होने लगे। सूर्यभगवान्के शरीरके खरादनेसे जो तेज निकला, उस तेजसे दैत्योंके विनाश करनेवाले बजका निर्माण हुआ। भगवान् सूर्यने भी अपना उत्तम रूप प्राप्तकर प्रसन्नमनसे अपनी भार्याके दर्शनोंको उत्कण्ठासे तत्काल उत्तरकुरुकी ओर प्रस्थान किया। वहाँ उन्होंने देखा कि वह घोड़ीका रूप धारण कर विचरण कर रही है। भगवान् सूर्य भी अश्वका रूप धारण कर उससे मिले।

पर पुरुषको आशंकासे उसने अपने दोनों नासापुटोंसे सूर्य के तेजको एक साथ बाहर फेंक दिया, जिससे अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई और यही देवताओंके वैध हुए। तेजके अन्तिम अंशसे रेवतकी उत्पत्ति हुई। तपती, शनि और साचणि ये तीन संतान छाबासे और यमुना तथा यम

संज्ञासे उत्पन्न हुए। सूर्यको अपनी भार्या उत्तरकुरुमें सप्तमी तिथिके दिन प्राप्त हुई, उन्हें दिव्य रूप सप्तमी तिथिको ही मिला तथा संतानें भी इसी तिथिको प्राप्त हुईं, अतः सप्तमी तिथि भगवान् सूर्यको अतिशय प्रिय है।

जो व्यक्ति पञ्चमी तिथिको एक समय भोजन कर षष्ठीको उपवास करता है तथा सप्तमीको दिनमें उपवास कर भक्ष्य- भोज्योंके साथ विविध शाक-पदार्थोंको भगवान् सूर्यके लिये अर्पण कर ब्राह्मणोंको देता है तथा रात्रिमें मौन होकर भोजन करता है, वह अनेक प्रकारके सुखोंका भोग करता है तथा सर्वत्र विजय प्राप्त करता एवं अन्तमें उत्तम विमानपर चढ़कर सूर्यलोकमें कई मन्वन्तरोंतक निवासकर पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रोंसे समन्वित चक्रवर्ती राजा होता है तथा दीर्घकालपर्यन्त निष्कण्टक राज्य करता है।

राजा कुरुने इस सप्तमी-व्रतका बहुत कालतक अनुष्ठान किया और केवल शाकका ही भोजन किया। इसीसे उन्होंने कुरुक्षेत्र नामक पुण्यक्षेत्र प्रास किया और इसका नाम रखा धर्मक्षेत्र । सप्तमी, नवमी, षष्ठी, तृतीया और पञ्चमी-ये तिथियाँ बहुत उत्तम हैं और स्त्री-पुरुषोंको मनोवाञ्छित फल प्रदान करनेवाली हैं। माघकी सप्तमी, आश्विनकी नवमी, भाद्रपदकी षष्ठी, वैशाखकी तृतीया और भाद्रपद मासकी पञ्चमी-ये तिथियाँ इन महीनोंमें विशेष प्रशस्त मानी गयी हैं। कार्तिक शुक्ला सप्तमीसे इस व्रतको ग्रहण करना चाहिये। उत्तम शाकको सिद्ध कर ब्राह्मणोंको देना चाहिये और रात्रिमें स्वयं भी शाक ही ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार चार मासतक व्रतकर व्रतका पहला धारण करना चाहिये। उस दिन पशगव्यले सूर्यभगवानको सान कराना चाहिये और स्वयं भी पशगयका प्राशन करना चाहिये, अनन्तर

केसरका चन्दन, अगस्त्यके पुष्प, अपराजित नामक धूप और पायसका नैवेद्य सूर्यनारायणको समर्पित करना चाहिये। ब्राह्मणों को भी पायसका भोजन कराना चाहिये। दूसरे पारणमें कुशाके जलसे भगवान् सूर्यनारायणको स्नान कराकर स्वयं गोमयका प्राशन करना चाहिये और श्वेतचन्दन, सुगन्धित पुष्प, अगरुका धूप तथा गुडके अपूप नैवेद्यमें अर्पण करना चाहिये और वर्षके समाप्त होनेपर तीसरा पारण करना चाहिये। गौर सर्घषका उबटन लगाकर भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर रक्तचन्दन, करवीरके पुष्प, गुग्गुलका धूप और अनेक भक्ष्य- भोज्यसहित दही-भात नैवेद्य अर्पण करना चाहिये। तथा यही ब्राह्मणोंको भी भोजन कराना चाहिये । भगवान् सूर्यनारायणके सम्मुख ब्राह्मणसे पुराण- श्रवण करना चाहिये अथवा स्वयं बाँचना चाहिये । अन्तमें ब्राह्मणको भोजन कराकर पौराणिकको वस्त्र-आभूषण, दक्षिणा आदि देकर प्रसन्न करना चाहिये। पौराणिकके संतुष्ट होनेपर भगवान् सूर्यनारायण प्रसन्न हो जाते हैं। रक्त चन्दन, करवीरके पुष्प, गुग्गुलका धूप, मोदक, पायसका नैवेद्य, घृत, ताम्रपात्र, पुराण-ग्रन्थ और पौराणिक-ये सब भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हैं। राजन् ! यह शाक-सप्तमी-व्रत भगवान् सूर्यको अति प्रिय है। इस व्रतका करनेवाला पुरुष भाग्यशाली होता है। (अध्याय ४७)