सुमन्तुजी बोले-राजन् ! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको अर्कसप्तमी कहते हैं। इसमें षष्ठीको उपवास रहकर स्नान करके गन्ध, पुष्प, गुग्गुल, अर्क-पुष्प, श्वेत करवीर एवं चन्दनादिसे भगवान् दिवाकरकी पूजा करनी चाहिये। रविकी प्रसन्नताके लिये नैवेद्यमें गुडोदक समर्पित करें। इस प्रकार दिनमें भानुकी पूजा करके रातमें निद्रारहित होकर उनके मन्त्रका जप करे।
शतानीकने पूछा-मुने! भगवान् सूर्यका प्रिय मन्त्र कौन-सा है ? उसे बतायें और धूप-दीपका भी निर्देश करें; जिससे उस मन्त्रका जप करता हुआ मैं दिवाकरकी पूजा कर सकूँ।
सुमन्तुजीने कहा-हे भरतश्रेष्ठ! मैं इस विधिको संक्षेपसे कह रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि एकाग्रचित्त होकर षडक्षर-मन्त्रका जप, होम तथा पूजा आदि सभी कर्म सम्पादित करे। सर्वप्रथम यथाशक्ति गायत्री मन्त्रका जप करना चाहिये। सौरी गायत्री- मन्त्र इस प्रकार है-'ॐ भास्कराय विद्महे सहस्ररश्मि धीमहि। तत्रः सूर्यः प्रचोदयात्॥' इसे भगवान् सूर्यने स्वयं कहा है। यह सौरी गायत्री- मन्त्र परम श्रेष्ठ है। इसका श्रद्धापूर्वक एक बार जप करनेसे ही मामव पवित्र हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। सप्तमी के दिन प्रातःकाल एकाग्रचित्त हो इस मन्त्रका जप करे और भक्तिपूर्वक भास्करको पूजा करे। राजन्! यथाशक्ति श्रद्धापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन कराये। धनको कंजूसी न करे। जो सूर्य के प्रति श्रद्धा सम्पन्न नहीं हैं, उन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये। शाल्योदन, मूंग, अपूर गुड़से बने पुए, दूध तथा दहीका भोजन कराना चाहिये। इससे भास्कर तुम होते है। भोजनके बर्ज्य पदार्थ इस प्रकार है-कुलथी मसूर से तथा बड़ी। उड़द आदि कड़वा तथा दुर्गन्धयुत्क पदार्थ भी निवेदित नहीं करने चाहिये।
अर्कवृक्षको 'ॐ खखोल्काय नमः' से पूजा कर अर्क-पल्लवोंको ग्रहण करे। फिर स्नानकर अर्क-पुष्पसे रविकी पूजा करके ब्राह्मणको भोजन कराये और 'अर्को में प्रीयताम्' सूर्यदेव मुझपर प्रसन्न हों, ऐसा कहे। तदनन्तर देवताके सम्मुख दाँत और ओठसे स्पर्श किये बिना निम्रलिखित मन्त्रसे अर्कसम्युटकी प्रार्थना करते हुए जलके साथ पूर्वाभिमुख होकर अर्कपुट निगल जाय ।
ॐ अर्कसम्पुट भद्रं ते सुभद्रं मेऽस्तु वै सदा।
ममापि कुरु भद्रं वै प्राशनाट् वित्तदो भव ॥
(बामपर्व २१०।७३)
इस मन्त्रका जप करते हुए जो अर्कका ध्यान करता है तथा अर्कसम्पुटका प्राशन करता है, वह श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होता है।
दाँतसे स्पर्श न किये जानेके कारण अर्कपुट अर्कसम्पुट कहलाता है। जो इस विधिसे वर्षभर सूर्यनारायणको प्रसन्नताके लिये श्रद्धापूर्वक सप्तमी व्रत करता है, उस मनुष्यका धन सात पीढ़ीतक अक्षय तथा अचल हो जाता है। हे राजन्! इस अनुष्ठानसे सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमि कुष्ठरोगसे मुक्त हो गये तथा सिद्धि प्राप्त की। साथ ही बृहद्वल्क, राजा जनक, महर्षि याज्ञवल्क्य तथा कृष्णापुत्र साम्व-इन सबने भी भगवान् सूर्यको पूजा करके और इस व्रतके अनुष्ठानसे उनकी साम्यता प्राप्त कर ली। यह अर्क-सप्तमी पवित्र, पापनाशिनी, पुण्यप्रद तथा धन्य है। अपने कल्याणके लिये इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये।
शतानीकने पूछा- मुने! जनक आदिने भगवान् सूर्यकी पूजा करके जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त की, उसे तो मैंने नहधा सुना है, किंतु महर्षि कौथुनिने किस प्रकार अर्ककी आराधना कर सिद्धि प्राप्त की और वे कैसे कुष्ठ-रोगसे मुक्त हुए, इसका मुझे ज्ञान नहीं है। वे कौथुमि कौन थे, उन्हें कैसे कुष्ठ हुआ? हे द्विज श्रेष्ठ! किस प्रकार उन्होंने देवाधिदेव दिवाकरकी आराधना की? इन सभी बातोंको मुझे संक्षेपमें सुनायें।
सुमन्तुजीने कहा-राजन् ! आपने बहुत अच्छी जिज्ञासा की है। इस विषयकों आप श्रवण करें। प्राचीन कालमें हिरण्यनाभ नामके एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे अपने पुत्रके साथ महाराजा जनकके आश्रमपर गये। वहाँ अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। क्रोधवश कौथुमिसे एक ब्राह्मणका वध हो गया। पुत्रके द्वारा विप्रको मारा गया देखकर पिताने कौथुमिका परित्याग कर दिया। सज्जनों तथा कुटुम्बियोंने भी उनका बहिष्कार कर दिया। शोक और दुःखसे दु:खी होकर वे दिव्य देवालयों में गये और उन्होंने अनेक तीर्थों की यात्राएँ की, किंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिल सकी। ब्रह्महत्याके कारण उन्हें भयंकर कुष्ठ नामक व्याधिने ग्रस्त कर लिया। नाक, कान आदि अङ्ग गलकर गिर गये। शरीरसे पौब और रक्त बहने लगा। समस्त पृथ्वीपर घूमते वे पुनः अपने पिताके घर आये। दुःखसे व्याकुलचित्त हो उन्होंने अपने पितासे कहा- मैं पवित्र तीर्थों और अनेक देवालयों में गया, किंतु इस क्रूर ब्रह्महत्यासे मुक्त नहीं हो सका। प्रायश्चित्त करनेपर भी मुझे इससे छुटकारा नहीं मिला है अबमच्या ककहाँ जाऊँ? कैसे मैं रोगसे मुक्ति पाई.? हे अनय अल्प परिचम साध्य जिला कर्मके करनेमें इस ब्रह्महत्यारुपी व्याधिसे मुझे छुटकारा मिले, उस उपायको आप शीघ्र बतायें और मेरा कल्याण करें।
हिरण्यनाभने कहा-पुत्र! पृथ्वीमें घूमते हुए तुमने जो क्लेश प्राप्त किया है, उसे मैं भलीभांति जानता हूँ। तुम अनेक तीर्थोंमें गये और प्रायश्चित्त भी किये, परंतु ब्रह्महत्यासे मुक्ति न मिली, अब मैं एक उपाय बताता हूँ, उस उपायसे तुम अनायास ही ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाओगे।
कौथुमिने कहा-विभो! मैं ब्रह्मादि देवों में किसकी आराधना करूँ? मैं तो शरीरसे भी विकल हूँ, अतः सभी कर्मोका यथावत् सम्पादन मुझसे सम्भव नहीं है, फिर किस प्रकार मैं देवताको संतुष्ट कर सकूँगा।
हिरण्यनाभने कहा-ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, वरुण आदि देवताओंने भक्तिपूर्वक भगवान् भास्करकी पूजा की है और इसी कारण वे स्वर्गलोकमें आनन्दित हो रहे हैं। हे पुत्र! मैं भगवान् सूर्यके समान किसी भी देवताको नहीं जानता हूँ। वे सभी कामनाओंको देनेवाले और माता-पिता तथा सभीके मान्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है। इसलिये तुम उनके मन्त्रका जप करते हुए तथा सामवेदके मन्त्रोंका गान करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी आराधना करो और उनसे सम्बन्धित इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही रोगसे मुक्ति मिलेगी और तुम मोक्ष प्राप्त कर लोगे।
सुमन्तुजीने कहा-राजन्! सामगान करनेवाले महर्षि कौथुमिने श्रद्धा-समन्वित हो अपने पिताद्वारा निर्दिष्ट सूर्योपासनाको विधिसे भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्यकी आराधना की। भगवान् भास्करकी कृपासे महर्षि कौथुमि दिव्य मूर्तिमान् हो गये और उन्होंने भगवान् भास्करके दिव्य मण्डलमें प्रवेश किया । (अध्याय २१०-२११)
* महर्षि की शुमि एक वैदिक मन्त्रद्रष्टा कपि है। सामणेद संहिताको कौथुमी शारखा अत्यन्त प्रसिद्ध है और इस समय यही प्राप्त है । उसके या कीट यही है ये प्राच्य साया भी कहलाते हैं। शौनकीय चरणब्यूर-प्रथमें स्वामधेदको शायः एक हजार शाम्राओं को विस्तृत चर्चा है।