महाराज युधिष्ठिरने पूछा-भगवन् ! वर्षाकालमें आकाश नीले मेघसे आच्छादित हो जाता है। मोर चारों ओर मीठी-मीठी बोली बोलने लगते हैं। मेढकोंकी ध्वनि भी बड़ी सुहावनी लगती है, इस समय कुलीन स्त्रियाँ किसको अर्घ्य दें तथा कौन-सा सत्कर्म करें और वे किस तिथिमें कौन-सा व्रत करें? आप इसका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! श्रेष्ठ स्त्रियोंको इस समय रोहिणी चन्द्र-ततका पालन करना चाहिये। श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी एकादशीको पवित्र होकर सवाषधिमिश्रित जलसे स्नान करे, अनन्तर उड़दके आटेकी एक सौ इन्दुरिका और पाँच घृत-मोदक बनाये। सभी सामग्रियों को लेकर उत्तम जलाशयपर जाय और उसके तटपर गोबरसे मण्डलकी रचना करे, उसमें रोहिणीके साथ चन्द्रमाको अङ्कित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य आदिसे उनकी अर्चना करे और इस प्रकार उनकी प्रार्थना करे -
सोमराज नमस्तुभ्यं रोहिण्यै ते नमो नमः ।
महासति महादेवि सम्पादय ममेप्सितम्॥
(उत्तरपर्व ६७।८)
अनन्तर 'सोमो मे प्रीयताम्' तथा 'देवी रोहिणी मे प्रीयताम्' ऐसा कहते हुए पूजन-द्रव्य ब्राह्मणके लिये निवेदित कर दे। अनन्तर कमरतक जलमें उतरकर मनमें रोहिणीसहित चन्द्रमाका ध्यान करते हुए उन इन्दुरिकाओंका भक्षण कर ले। अनन्तर जलसे बाहर आकर ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा दे। प्रतिवर्ष इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तिपूर्वक व्रत करता है, वह धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे परिपूर्ण होकर बहुत दिनोंतक सुख भोगकर तीर्थ-स्थानमें मृत्युको प्राप्त करता है और ब्रह्मलोकको जाता है, अनन्तर विष्णुलोक, तदनन्तर शिवलोकमें जाता है।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! आप यह बतायें कि अवियोगव्रत किस विधिसे किया जाता है?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अवियोगज्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ है, मैं उसका विधान बतलाता हूँ, आप ध्यानपूर्वक सुनें।
भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको प्रात: उठकर जलाशयपर जाकर खान करे, शुद्ध शुक्ल वस्त्र धारणकर सुन्दर लिपे-पुते स्थानपर गोबरसे एक मण्डलका निर्माण कर, उसमें लक्ष्मीसहित विष्णु, गौरीसहित शिव, सावित्रीसहित ब्रह्मा, राज्ञी सहित सूर्यनारायणकी प्रतिमा स्थापितकर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि, उपचारोंसे इन चारों देवदम्पतियोंके पृथक्-पृथक् नाम-मन्त्रोंसे आदिमें 'ॐ' कार तथा अन्तमें 'नमः' पदकी योजनाकर पूजा एवं प्रार्थना करे। अनन्तर ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। फिर विविध दान देकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इस अवियोगव्रतको जो करता है, उसका कभी भी इष्टजनों (मित्र, पुत्र, पत्नी आदि)- से वियोग नहीं होता और बहुत समयत्तक वह सांसारिक सुखोंका भोगकर क्रमशः विष्णु, शिव, ब्रह्मा और सूर्यलोकमें निवास कर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह भी अपने सभी अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर विष्णुलोकको प्रास करती है। (अध्याय ६७-६८)