राजा शतानीकने कहा-ब्राह्मण श्रेष्ठ! आप सौर-धर्मका पुनः विस्तारसे वर्णन कीजिये।
सुमन्तु मुनि बोले-महाबाहो ! तुम धन्य हो, इस लोक में सौर-धर्मका प्रेमी तुम्हारे समान अन्य कोई भी राजा नहीं है। इस सम्बन्धमें मैं आपको
विद्वान् द्विजको देना कन्यादान कहा जाता है। मध्यम या उत्तम नवीन वस्त्रका दान वस्त्रदान कहा जाता है। एक मासमें दो सौ चालीस ग्रासोंका भक्षण करना चान्द्रायणर-व्रत कहलाता है। सभी शास्त्रोंके ज्ञाता तथा तपस्यापरायण जितेन्द्रिय ऋषियों एवं देवोंसे सेवित जल-स्थान तीर्थ कहा जाता है। सूर्यसम्बन्धी स्थानोंको पुण्य-क्षेत्र कहा जाता है। उन सूर्यसम्बन्धी क्षेत्रोंमें मरनेवाला व्यक्ति सूर्य-सायुज्यको प्राप्त करता है। तीर्थोंमें दान-देनेसे, उद्यान लगाने एवं देवालय, धर्मशाला आदि बनवानेसे अक्षय फल प्राप्त होता है। क्षमा एवं नि:स्पृहता, दया, सत्य, दान, शील, तप तथा अध्ययन-इन आठ अङ्गोंसे युक्त व्यक्ति श्रेष्ठ पात्र कहा जाता है। भगवान् सूर्यमें भक्ति, क्षमा, सत्य, दसों इन्द्रियोंका विनिग्रह तथा सभीके प्रति मैत्रीभाव रखना सौर-धर्म हैं।
जो भक्तिपूर्वक भविष्यपुराण लिखवाता है, वह सौ कोरि युग वर्षातक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सूर्यमन्दिरका निर्माण करवाता है, उसे उत्तम स्थानकी प्राति होती है। (अध्याय १७१-१७२)
प्राचीन कालमें गरुड़ एवं अरुणके बीच हुए संवादको पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप इसे ध्यानपूर्वक चुनें।
अरुणने कहा-खगश्रेष्ठ! यह सौर-धर्म अज्ञान सागरमें निमग्न समस्त प्राणियोंका उद्धार करनेवाला
१-शुक्ल पक्ष प्रतिदिन एक-एक पासको वृद्धि तथा कृष्ण पक्षमें एक-एक ग्रासको न्यूनताके नियमका पालन करनेमें दो सौ चालीस पास एक मासमें होते हैं।
चान्द्रायणके मुख्य तीन भेद हैं -यव-पध्य, पिपीलिका-मध्य और शिशु-चान्द्रायण। यव-मध्यमें शुक्ल पक्ष की प्रतिपदासे आरम्भ कर पूर्णिमाको पदह ग्राससे लेकर क्रमश: घटाते हुए अमारास्माको सम्मान कर दिया जाता है। पिष्टोलिकामे पूर्णिमाको प्रारम्भ कर कृष्ण पक्षमें क्रमशः एक-एक ग्राम घटते हुए अमावास्याको उपवाप्त कर फिर पूर्णिमाको पूरा किया जाता है और शिष्टु या सामान्य चान्द्रायण प्रतिदिन आठ ग्रास लिया जाता है। इस प्रकार तीस दिनों में दो सौ चालीस ग्रास हो जाता है।
है। पक्षिराज । जो लोग भक्तिभावसे भगवान् सूर्यका स्मरण-कीर्तन और भजन करते हैं, वे परमपदको प्राप्त होते हैं। खगाधिप। जिसने इस लोकमें जन्म ग्रहणकर इन देवेश भगवान भास्करकी उपासना नहीं की, वह संसारके क्लेशॆमें ही निमान रहता है। मनुष्य-जीवन परम दुर्लभ है, इसे प्राप्त कर जिसने भगवान् सूर्यका पूजन किया, उसीका जन्म लेना सफल है। जो श्रद्धा-भक्तिसे भगवान् सूर्यका स्मरण करता है, वह कभी किसी प्रकारके दुःखका भागी नहीं होता।
जिन्हें महान् भोगोंके सुख-प्राप्तिकी कामना है तथा जो राज्यासन पाना चाहते हैं अथवा स्वर्गीय सौभाग्य-प्राप्तिके इच्छुक हैं एवं जिन्हें अतुल कान्ति, भोग, त्याग, यश, श्री, सौन्दर्य, जगत्की ख्याति, कीर्ति और धर्म आदिकी अभिलाषा है, उन्हें सूर्यकी भक्ति करनी चाहिये।
जो परम श्रद्धा-भावसे भगवान् सूर्यकी आराधना करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। विविध आकारवाली डाकिनियाँ, पिशाच और राक्षस अथवा कोई भी उसे कुछ भी पीड़ा नहीं दे सकते। इसके अतिरिक्त कोई भी जीव उसे नहीं सता सकते। सूर्यको उपासना करनेवाले मनुष्यके शत्रुगण नष्ट हो जाते हैं और उन्हें संग्राममें विजय प्राप्त होती है। वीर! वह नीरोग होता है। आपत्तियाँ उसका स्पर्शतक नहीं कर पाती। सूर्योपासक मनुष्यकी धन, आयु, यश, विद्या और सभी प्रकारके कल्याण-मालकी अभिवृद्धि होती रहती है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते है।
ब्रह्माजीने भगवान् सूर्यको आराधना कर ब्राहा पदको प्राति की थी। देवोंके ईश भगवान् विष्णुने विष्णुत्व पदको सूर्यके अनसे हो पात किया है। भगवान् शंकर भी भगवान् सूर्यको आराधनासे ही जगन्नाथ को जाते है तथा उनके प्रसादसे ही
उन्हें महादेवत्व-पद प्राप्त हुआ है एवं उनकी ही आराधनासे एक सहन नेत्रोंवाले इन्द्रने भी इन्द्रत्वको प्राप्त किया है। मातृवर्ग, देवगण, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस और सभी सुरोंके नायक भगवान् सूर्यकी सदा पूजा किया करते हैं। यह समस्त जगत् भगवान् सूर्यमें ही नित्य प्रतिष्ठित है। जो मनुष्य अन्धकारनाशक भगवान् सूर्यको पूजा नहीं करता, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अधिकारी नहीं है। पक्षिश्रेष्ठ! आपत्तिग्रस्त होनेपर भी भगवान् सूर्यकी पूजा सदा करणीय है। जो मनुष्य भगवान् सूर्यकी पूजा नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ है। प्रत्येक व्यक्तिको देवाधिदेव भगवान् सूर्यको पूजा- उपासना करके ही भोजन करना चाहिये। जो सूर्यभक्त हैं, वे समस्त द्वन्द्वोंके सहन करनेवाले, वीर, नीति-विधि-युक्तचित्त, परोपकारपरायण तथा गुरुको सेवामें अनुरक्त रहते हैं। वे अमानी, बुद्धिमान्, असक्त, अस्पर्धावाले, नि:स्पृह, शान्त, स्वात्मानन्द, भद्र और नित्य स्वागतवादी होते हैं। सूर्यभक्त अल्पभाषी, शूर, शास्त्रमर्मज्ञ, प्रस्त्रमनस्क, शौचाचारसम्पन्न और दाक्षिण्ययुक्त होते हैं।
सूर्यके भक्त दम्भ, मत्सरता, तृष्णा एवं लोभरसे वर्जित हुआ करते हैं। वे शठ और कुत्सित नहीं होते। जिस प्रकार कमलका पत्र जलसे निर्लिस रहता है, उसी प्रकार सूर्यभक्त मनुष्य विषयोंमें कभी लिप्त नहीं होते। जबतक इन्द्रियोंकी शक्ति क्षीण नहीं होती, तबतक भगवान सूर्य की आराधना सम्पन्न कर लेनी चाहिये; क्योंकि मानव असमर्थ होनेपर इसे नहीं कर सकता और यह मानव- जीवन यों ही व्यर्थ चला जाता है। भगवान् सूर्यको पूजाके समान इस जगत्में अन्य कोई भी धर्मका कार्य नहीं है। अतः देवदेवेश भगवान् सूर्यका पूजन करे। जो मानव भक्तिपूर्वक शान्त, अज, प्रभु, देवदेवेश सूर्यकी पूजा किया करते हैं,
वे इस लोकमें सुख प्राप्त करके परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। सर्वप्रथम ब्रह्माजीने अपने परम प्रष्ट अन्तरात्मासे भगवान् सूर्यकी पूजा कर अञ्जलि बाँधकर जो स्तोत्र' कहा था, उसका भाव इस प्रकार है-
'षडैश्वर्यसम्पन्न, शान्त-चित्तसे युक्त, देवोंके मार्ग-प्रणेता एवं सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान् सूर्यको मैं सदा प्रणाम करता हूँ। जो देवदेवेश शाश्वत, शोभन, शुद्ध, दिवस्पति, चित्रभानु, दिवाकर और ईशोंके