भगवान् श्रीकृष्णा बोले-महाराज युधिष्ठिर! एक बार महर्षि लोमश मधुरा आये और वहाँ मेरे माता-पिता--देवकी-वसुदेवने उनकी बड़ी श्रद्धासे आवभगत की। फिर वे प्रेमसे बैठकर अनेक प्रकारकी कथाएँ कहने लगे। उन्होंने उसी प्रसंगमें मेरी मातासे कहा--'देवकी ! कंसने तुम्हारे बहुतसे पुत्रोंको मार डाला है, अत: तुम मृतवत्सा एवं दुःखभागिनी बन गयी हो। इसी प्रकारसे प्राचीन कालमें चन्द्रमुखी नामकी एक सुलक्षणा रानी भी मृतवत्सा एवं दु:खी हो गयी थी। परंतु उसने एक ऐसे व्रतका अनुष्ठान किया, जिसके प्रभावसे यह जीवत्पुत्रा हो गयी। इसलिये देवकी! तुम भी उस व्रतके अनुष्ठानके प्रभावसे वैसी हो जाओगी, इसमें संशय नहीं।'
माता देवकीने उनसे पूछा-महाराज! वह चन्द्रमुखी रानी कौन थी? उसने सौभाग्य और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाला कौन-सा व्रत किया था? जिसके कारण उसकी संतान जीवित हो गयी। आप मुझे भी वह व्रत बतलानेकी कृपा करें।
लोमशमुनि बोले-प्राचीन कालमें अयोध्यामें नहुष नामके एक प्रसिद्ध राजा थे, उन्हींकी महारानीका नाम चन्द्रमुखी था। राजाके पुरोहितकी पत्नी मानमानिकासे रानी चन्द्रमुखीकी बहुत प्रीति थी। एक दिन वे दोनों सखियाँ स्नान करने के लिये सरयू-तटपर गयौं। उस समय नगरकी और भी बहुत-सी स्त्रियाँ वहाँ स्नान करने आयी हुई थीं। उन सब स्त्रियोंने स्नानकर एक मण्डल बनाया और उसमें शिव-पार्वतीकी प्रतिमा चित्रितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदिसे भक्तिपूर्वक यथाविधि उनकी पूजा की। अनन्तर उन्हें प्रणामकर जब वे सभी अपने घर जानेको उद्यत हुई, तब महारानी चन्द्रमुखी तथा पुरोहितको स्त्री मानमानिकाने उनसे पूछा-'देवियो! तुमलोगोंने यह किसकी और किस उद्देश्यसे पूजा की है?' इसपर वे कहने लगी-'हमलोगोंने भगवान् शिव एवं भगवती पार्वतीकी पूजा की है और उनके प्रति आत्म- समर्पण कर यह सुवर्णसूत्रमय धागा भी हाथमें धारण किया है। हम सब जबतक प्राण रहेंगे, तबतक इसे धारण किये रहेंगी और शिव पार्वतीका पूजन भी किया करेंगी।' यह सुनकर उन दोनोंने भी यह व्रत करनेका निश्चय किया और वे अपने घर आ गयीं तथा नियमसे व्रत करने लगीं। परंतु कुछ समय बाद रानी चन्द्रमुखी प्रमादवश व्रत करना भूल गयी और सूत्र भी न बाँध सकी। इस कारण मरनेके अनन्तर वह वानरी हुई, पुरोहितकी स्त्रीका भी व्रत भङ्ग हो गया, इसलिये मरकर वह कुक्कुटी हुई। उन योनियों में भी उनकी मित्रता और पूर्वजन्मकी स्मृतियाँ बनी रहीं।
कुछ कालके अनन्तर दोनोंकी मृत्यु हो गयी। फिर रानी चन्द्रमुखी तो मालव देशके पृथ्वीनाथ नामक राजाकी मुख्य रानी और पुरोहित अग्निमीलकी स्त्री मानमानिका उसी राजाके पुरोहितकी पत्नी हुई। रानीका नाम ईश्वरी और पुरोहितकी स्त्रीका नाम भूषणा था। भूषणाको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान था। उसके आठ उत्तम पुत्र हुए। परंतु रानी ईश्वरीको बहुत समयके बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह रोगग्रस्त रहता था। इस कारण थोड़े ही समय बाद (नवें वर्ष) उसकी मृत्यु हो गयी। तब दुःखी हो भूषणा अपनी सखी रानी ईश्वरीको आश्वासन देने उनके पास आयो । भूषणाके बहुतसे पुत्रों को देखकर ईश्वरीके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी, फलस्वरूप रानी ईश्वरीने धीरे-धीरे भूषणाके सभी पुत्र मरवा डाले, परंतु भगवान् शंकरके अनुग्रहसे वे मरकर भी पुनः जीवित हो उठे। तब ईश्वरीने भूषणाको अपने यहाँ बुलवाया और उससे पूछा-'सखि ! तुमने ऐसा कौन-सा पुण्यकर्म किया है, जिसके कारण तुम्हारे मरे हुए भी पुत्र जीवित हो जाते हैं और तुम्हारे बहुतसे चिरंजीवी पुत्र उत्पन्न हुए हैं, मुक्ता आदि आभूषणोंसे रहित होनेपर भी कैसे तुम सदा सुशोभित रहती हो?'
भूषणाने कहा-सखि ! मुक्ताभरण सप्तमी- व्रतका विलक्षण माहात्म्य है। भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको किये जानेवाले इस व्रतमें स्नानकर एक मण्डल बनाकर उसमें शिव-पार्वतीका पूजन करे और शिवको आत्म-निवेदित सूत्र (दोरक)- को हाथमें धारण करे अथवा चाँदी, सोनेकी अंगूठी बनाकर अंगुलीमें पहने। उस दिन उपवास करे। बादमें व्रतका उद्यापन करे। उद्यापनके दिन शिव-पार्वतीका मण्डलमें पूजन कर वह अंगूठी ताम्रके पात्रमें रखकर ब्राह्मणको दे दे तथा यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी कराये। इस व्रतके करनेसे सभी पदार्थ प्राप्त होते हैं।
सखि ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिको तुमने और मैंने साथ हो इस व्रतका नियम ग्रहण किया था, परंतु प्रमादवश तुमने इसे छोड़ दिया, इसीसे तुम्हारा पुत्र नष्ट हो गया और राज्य पाकर भी तुम दु:खी ही रहती हो। मैंने व्रतका भक्तिपूर्वक पालन किया, इससे मैं सब प्रकारसे सुखी हूँ, परंतु मेरा व्रत अन्तमें भङ्ग हो गया था, इसलिये एक जन्म में मुझे कुक्कुटी बनना पड़ा। सखि! मैं तुम्हें अपने द्वारा किये गये
व्रतका आधा पुण्यफल देती है, इससे तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जायेंगे। इतना कहकर भूषणाने अपने व्रतका आधा पुण्यफल ईश्वरीको दे दिया। उसके प्रभावसे ईश्वरीके दीर्घ आयुवाले बहुत पुत्र उत्पन्न हुए और उसे सब प्रकारका सुख प्राप्त हुआ तथा अन्तमें मोक्ष भी प्राप्त हुआ।
लोमशमुनि बोले-देवकी ! तुम भी इस व्रतको करो, इससे तुम्हारी संतान स्थिर हो जायगी और तुम्हारा पुत्र तीनों लोकोका स्वामी होगा। यह कहकर लोमशमुनि अपने आश्रमको चले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! (मेरी माताको इसी ब्रतके प्रभावसे मेरे जैसा पुत्र पैदा हुआ और मेरी इतनी आयु बढ़ी तथा कंस आदि दुष्टोंसे बच भी गया।) यह प्रसंगवश मैंने इस व्रतका माहात्म्य बतलाया है, अन्य जो भी कोई स्त्री इस व्रतका आचरण करेगी, उसे कभी संतानका वियोग नहीं होगा और अन्ता वह शिवलोकको पास करेगी*।