भविष्य महा पुराण

एकाह-प्रतिष्ठा तथा काली आदि देवियोंकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजीने कहा-ब्राह्मणो ! कलियुगमें अल्प सामर्थ्यवान् व्यक्ति देवता आदिकी प्रतिष्ठा एक दिनमें भी कर सकता है। जिस दिन प्रतिष्ठा करनी हो उसी दिन विद्वान् ब्राह्मण घृताधिवास कराये। जब सूर्यभगवान् उत्तरायणके हों, तब प्रतिष्ठादि कार्य करने चाहिये। शरत्काल व्यतीत हो जानेपर वसन्त ऋतुमें यज्ञका आरम्भ करना चाहिये । नारायण आदि मूर्तियोंके बत्तीस भेद हैं। गजानन आदि देवताओंकी प्रतिष्ठा विहित कालमें ही करनी चाहिये।' बुद्धिमान् मनुष्य नित्य- क्रियासे निवृत्त होकर आभ्युदयिक कर्म करे। अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर यज्ञ-गृहमें प्रवेश करे। वहाँ प्रत्येक कुम्भके ऊपर भगवान् गणेश, नवग्रह तथा दिम्पालाका विधिवत् पूजन करे। वेदीपर भगवान् विष्णु और उनके परिवारका पूजन करे । सर्वप्रथम भगवान् विष्णुको विभिन्न तीर्थ, समुद्र, नदियों आदिके जल, पञ्चामृत, पञ्चगव्य, सप्त मृत्तिकामिश्रित जल, तिलके तेल, कषाय-द्रव्य और पुष्पोदकसे स्नान कराये। तुलसी, आम, शमी, कमल तथा करवीरके पत्र-पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। इसके बाद मूर्तिमें प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न 'करे। तत्पश्चात् विधिपूर्वक हवन करे। ब्राह्मणोंको दक्षिणाद्वारा संतुष्टकर पूर्णाहुति प्रदान करे।

ब्राह्मणो। अब मैं काली आदि महाशक्तियोंको प्रतिष्ठा एवं अधिवासनको संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। प्रतिहाके पूर्व दिन देवीकी प्रतिमाका अधिवासन कर आभ्युदयिक श्राद्ध करे। सर्वप्रथम भगवतीको प्रतिमाको कमलयुक्त जलसे, फिर पञ्चगव्यसे स्नान कराये। कुम्भके ऊपर भगवती दुर्गाकी अर्चना करे। तदनन्तर मूर्तिकी प्राण-प्रतिष्ठा करे। बिल्व-पत्र और बिल्व-फलोंसे सौ आहुतियाँ दे। दक्षिणामें सुवर्ण प्रदान करे। भगवती कालिका और ताराकी प्रतिमाओंका अलग-अलग अर्चन करे। भगवतीको नाना प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे तीन दिनतक स्नान कराये और नैवेद्य अर्पण करे। ताँबेके कलशपर तीन दिनतक प्रात:कालमें देवीकी अर्चना करे, फिर कन्याओंद्वारा सुगन्धिन जलसे भगवतीको स्नान कराये। आठवें दिन भी रात्रिमें विशेष पूजन करे एवं पायस-होम करे।

आगमों के अनुसार शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठामें तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराये और विशेषरूपसे भगवान् की प्रतिमाका अधिवासन करे। नित्य-क्रिया करके आभ्युदयिक श्राद्ध करे। दूसरे दिन प्रात: आचार्यका वरण करे। विधिके अनुसार प्रतिमाको स्नान कराकर शिवलिङ्गका परिवार के साथ पूजन करे। विधिपूर्वक तिलमयी या स्वर्णमयी अथवा साक्षात् गौका दान करे। हवनकी समाप्तिपर शुद्ध घृतसे वसुधारा प्रदान करे। इसी तरह सूर्य, गणेश, ब्रह्मा आदि देवताओं तथा वाराही एवं त्रिपुरादेवी और भुवनेश्वरी, महामाया, अम्बिका, कामाक्षी, इन्द्राक्षी तथा अपराजिता आदि महाशक्तियोंकी प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा भी विधिपूर्वक करनी चाहिये और राधि- जागरण कर महान् उत्साय चारना चाहिये। देवीकी प्रतिक्षाम कुमारी पूजन भी करना चाहिये। (अध्याय 18-19)