भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! कार्तिक और माधकी पूर्णिमा, चैत्रकी पूर्णिमा तथा तृतीया और वैशाखकी पूर्णिमा एवं द्वादशीमें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न वृषभको चार गौओंके साथ छोड़नेसे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। इस तृपोत्सर्गको विधिको गर्गाचार्यने मुझसे इस प्रकार बतलाया है सबसे पहले षोडशमातृकाका पूजन कर मातृश्राद्ध तथा फिर आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। फिर एक कलश स्थापित कर उसपर रुद्रका पूजन करके घृतसे हवन करना चाहिये। उस सर्वाङ्गसुन्दर तरुण बछड़ेके वाम भागमें त्रिशूल और दक्षिण भागमें चनयुक्त चिह्न अङ्कितकर कुंकुम आदिसे अनुलित करे, गले में पुष्पकी माला पहना दे। अनन्तर चार तरुण बछियाओंको भी भूषित कर उनके कानमें कहे कि 'आपके पतिस्वरूप इस पृष्ट एवं सुन्दर वृषको में विसर्जित कर रहा है, आप इसके साथ स्वच्छन्दतापूर्वक प्रसन होकर विहार करें।' पुनः उनको वस्त्रसे आच्छादितकर एवं स्वादिष्ट भोजनसे संतुष्टकर देवालय, गोष्ठ अथवा नदी संगम आदि स्थानों में छोड़ना चाहिये। वे पुरुष धन्य हैं, जो स्वेच्छाचारी, गरजते हुए, ककुद्यान् तथा अहंकारसे पूर्ण वृष छोड़ते हैं। इस विधिसे जो वृषोत्सर्ग करता है, उसके दस पुस्त पहलेके और दस पुस्त आगेके पुरुष सदतिको प्राप्त करते हैं। यदि वृष नदीके जल में प्रवेश करता है और उसके सोंगसे या उसे जो जल उछलता है, उस लर्पणरूप जलसे वृषोत्सर्ग करनेवाले व्यक्तिके पितरोंको अक्षयतृप्ति प्राप्त होती है। अपने सागसे या खुसे यदि वह मिट्टी खोदता है तो वृपोत्सर्ग करनेवाले पितरों के लिये वह खोदी भूमि जल भर जानेपर मधुनुल्या बन जाती है। चार हजार हाथ लम्बे-चौड़े तडाग बनानेसे पितरोंको उतनी तृप्ति नहीं होती, जितनी तृप्ति एक वृष छोड़ने होती है। मधु और तिलको एक साथ मिलाकर पिण्डदान करनेसे पितरोंको जो
तृप्ति नहीं होती, वह वृप्ति एक वृषोत्सर्ग करनेसे प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने पितरोंके उद्धारके लिये वृष छोड़ता है, वह स्वयं भी स्वर्गलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १३१)