भविष्य महा पुराण

राजा शालिवाहन तथा ईशामसीहकी कथा

सूतजीने कहा-ऋषियो! प्रात: कालमें पुम्सोकसे पीड़ित सभी पाण्डव प्रेतकार्य कर पितामह भीष्मके पास आये। उनसे उन्होंने राजधर्म मोक्षधर्म और दानयमों के स्वरूपको अलग-अलग रूपसे पलोभाति समझा। तदनन्तर उन्होंने उत्तम आचरणोसे तीन अवमेध यज्ञ किये। पाण्डवोंने छत्तीस वर्ष तक राज्य किया और अन्त में वे स्वर्ग चले गये। कतिधर्म की हिनेपर भी अपने अंशसे उत्पन्न होंगे।

अब आप सब मुनिगण अपने-अपने स्थानको पधारें। मैं योगनिद्राके वशीभूत हो रहा हूँ, अब मैं समाधिस्थ होकर गुणातीत परब्रह्मका ध्यान करूंगा। यह सुनकर नैमिषारण्यवासी मुनिगण यौगिक सिद्धिका अवलम्बन कर आत्मसामीप्यमें स्थित हो गये। दीर्घकाल व्यतीत होनेपर शौनकादि मुनि ध्यानसे उठकर पुनः सूतजीके पास पहुंचे।

मुनियोंने पूछा-सूतजी महाराज ! विक्रमाख्यानका तथा द्वापरमें शिवकी आज्ञासे होनेवाले राजाओंका आप वर्णन कीजिये।

सूतजी बोले-मुनियो ! विक्रमादित्यके स्वर्गलोक चले जाने के बाद बहुतसे राजा हुए। पूर्व में कपिल स्थानसे पश्चिममें सिन्धु नदीतक, उत्तरमें बदरीक्षेत्रसे दक्षिणमें सेतुबन्धतककी सीमावाले भारतवर्षमें उस समय अठारह राज्य या प्रदेश थे। उनके नाम इस प्रकार हैं-इन्द्रप्रस्थ, पाञ्चाल, कुरुक्षेत्र, कम्पिल, अन्तर्वेदी, व्रज, अजमेर, मरुधन्ब ( मारवाड़), गुर्जर (गुजरात), महाराष्ट्र, द्रविड़ (तमिलनाडु), कलिंग (उड़ीसा), अवन्ती (उज्जैन), उडुप (आन्ध्र), बंग, गौड़, मागध तथा कौशल्या इन राज्योंपर अलग-अलग राजाओंने शासन किया । वहाँकी भाषाएँ भिन्न भिन्न रहीं और समय-समयपर विभिन्न धर्म-प्रचारक भी हुए। एक सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर धर्मका चिनाश सुनकर शक आदि विदेशी राजा अनेक लोगोंके साथ सिन्धु नंदीको पारकर आदेशमें आये और कुछ लोग हिमालसके हिममार्गसे यहाँ आये। उन्होंने आयोको जीतकर उनका धन लूट लिया और अपने देशमें लौट गये। इसी समय विक्रमादित्यका पौत्र राजा शालिवाहन पिताके सिंहासनपर आसीन हुआ। उसने शक, चीन आदि देशीकी सेनापर विजय पायी। बाहोक, कानरूप, रोमा नया खुर देशमें उत्पन्न हुए दुष्टों को पकड़कर कतार दण्ड दिया और उनका सारा कोष छीन लिया। उसने म्लेच्छों तथा आयोकी अलग- अलग देश-मर्यादा स्थापित की। सिन्धु-प्रदेशको आयोका उत्तम स्थान निर्धारित किया और म्लेच्छोंकि लिये सिन्धुके उस पारका प्रदेश नियत किया। एक समयकी बात है, वह शकाधीश शालिवाहन हिमशिखरपर गया। उसने हूण देशके मध्य स्थित पर्वतपर एक सुन्दर पुरुषको देखा। उसका शरीर गोरा था और वह श्वेत वस्त्र धारण किये था। उस व्यक्तिको देखकर शकराजने प्रसन्नतासे पूछा- 'आप कौन हैं ?' उसने कहा-'मैं ईशपुत्र हूँ और कुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुआ हूँ। मैं म्लेच्छ-धर्मका प्रचारक और सत्य-व्रतमें स्थित हूँ।' राजाने पूछा- आपका कौन-सा धर्म है?'

ईशपुत्रने कहा-महाराज! सत्यका विनाश हो जानेपर मर्यादारहित म्लेच्छ-प्रदेशमें मैं मसीह बनकर आया और दस्युओंके मध्य भयंकर ईशामसी नामसे एक कन्या उत्पन्न हुई। उसोको म्लेच्छोंसे प्राप्त कर मैंने मसीहत्त्व प्राप्त किया। मैंने म्लेच्छोंमें जिस धर्मको स्थापना की है, उसे सुनिये-'सबसे पहले मानस और दैहिक मलको निकालकर शरीरको पूर्णत: निर्मल कर लेना चाहिये। फिर इष्ट देवताका जप करना चाहिये। सत्य वाणी बोलनी चाहिये, न्यायसे चलना चाहिये और मनको एकाग्र कर सूर्यमण्डलमें स्थित परमात्माकी पूजा  करनी चाहिये, क्योंकि ईश्वर और सूर्यमें समानता है। परमात्मा भी अचल हैं और सूर्य भी अचल है। सूर्य अनित्य भूतोंके सारका चारों ओरसे आकर्षण करते हैं। हे भूपाल। ऐसे कृत्यसे वह मसीहा विलीन हो गयी, पर मेरे हृदय में नित्य विशुद्ध कल्याणकारिणी मूर्ति प्राय हुई है। इसलिये मेरा नाम ईशामसीह  प्रतिष्ठित हुआ।

यह सुनकर राजा शालिवाहनने उस म्लेच्छ- पूज्यको प्रणाम किया और उसे दारुण म्लेच्छ- स्थानमें प्रतिष्ठित किया तथा अपने राज्यमें आकर उस राजाने अश्वमेध यज्ञ किया और साठ वर्षतक राज्य करके स्वर्गलोक चला गया।