सूतजी बोले-विप्रवर! अब मैं शुक्लवंशका वर्णन करता हूँ। जब भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका- वृन्दावन आदिकी लीला समाप्त कर अपने परमधामको पधारे, उसके कुछ दिनोंके पश्चात् कलियुगका आगमन हुआ। कलियुगके चार हजार चार सौ वर्ष बीत जानेपर भारतकी भूमि म्लेच्छोंसे आक्रान्त हो गयी। न्यूह नामक यवनने सम्पूर्ण जगत्को म्लेच्छोंसे परिपूर्ण कर दिया था। कलियुगके प्रारम्भिक एक हजार वर्ष बीतनेपर देवराट् महेन्द्रने श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें एक काश्यप नामके ब्राह्मणको भेजा। देवशक्ति आर्यावतीने उसका आनन्दपूर्वक पाणिग्रहण किया। उससे दस पुत्र* उत्पन्न हुए। बादमें काश्यप मित्र देशमें आ गये। उन्होंने मिस्र में उत्पन्न दस हजार म्लेच्छोंको वशमें कर पुन: अपने स्थानपर आकर उन्हें अपना शिष्य बना लिया तथा वे सप्तपुरियोंके वे नष्ट होनेके बाद सरस्वती और दृषद्वती नदीके मध्य श्रेष्ठ ब्रह्मांधर्तमें निवास करने लगे। मनुधर्मके अनुयायी राजा काश्यपने अपने पुत्र तपस्वी द्विज श्रेष्ठ शुक्लको बुलाकर उसे मनुधर्मका उपदेश देकर रैवत (गिरनार) शिखरपर तपस्या करनेके लिये आदेश दिया और अपने नौ पुत्रों तथा शिष्यों को भी सनातन मनुधर्मका उपदेश दिया। शुक्लने भी रैवतश्रृंगपर तपस्याके द्वारा सच्चिदानन्दविग्रह जगन्नाथ वासुदेवको संतुष्ट किया। भगवान् द्वारकानाथ प्रसन्न होकर उस विपका हाथ पकड़कर समुद्रके किनारे ले आये और दिव्य शोभासम्मन अपनी द्वारका नगरी उसे दिखायी लगभग दो हजार वर्ष बीतनेके बाद अग्रिद्वार से वह शुक्ल अर्बुद (आबू) पर्वतपर गया और वहाँ उसने अपने तीन भाइयों तथा द्विजोंके साथ बौद्धोंको जीतकर हरिकी कृपासे द्वारकाको पुन: प्रतिष्ठित किया। द्वारकामें कृष्णके ध्यानमें तत्पर रहकर शुक्लने प्रसन्नतापूर्वक निवास किया। उसने पश्चिम भारतवर्षमें दस वर्षतक राज्य किया।
नारायणकी कृपासे शुक्लको विष्वक्सेन नामक पुत्र हुआ, उसने बीस वर्षतक राज्य किया और उसे जयसेन नामका पुत्र हुआ, तीस वर्षतक उसने राज्य किया और उसे विसेन नामक पुत्र हुआ। पचास वर्षतक उसने राज्य किया और उसे प्रमोदा और मोदसिंह नामकी दो संतानें हुई। विसेनने अपनी कन्या प्रमोदाका विवाह विक्रमके साथ कर दिया और पुत्र मोदसिंहको अपना उत्तम राज्य समर्पित कर दिया। मोदसिंहका पुत्र हुआ सिन्धुवर्मा । उसने पैतृक स्थानको छोड़कर सिन्धुनदीके तटपर राज्य किया। पृथ्वीपर वह स्थान सिन्धुदेशके नामसे प्रसिद्ध हुआ। सिन्धुवर्माका पुत्र सिन्धुदीप हुआ और सिन्धुढीपका पुत्र श्रीपति हुआ। श्रीपतिने गौतमवंशमें उत्पन्न कच्छदेशमें रहनेवाली काछपीसे विवाह किया और पुलिन्द तथा यवनोंको जीतकर वहाँ देश बसाया। सिन्धुकूलमें वह देश श्रीपतिके नामसे प्रसिद्ध हुआ। श्रीपतिका पुत्र हुआ भुजवर्मा । भुजवनि शबर और, भीलोको जीतकर देश बसाया, जो इस पृथ्वीपर 'भुजदेश' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। भुजवर्माका पुत्र रणवर्मा और उसका पुत्र चित्रवर्मा हुआ। चित्रवर्माने बनके बीचमें 'चित्र' नामकी एक नगरी बसायी और उसको धर्मवर्मा नामक पुत्र हुआ। उसको कृष्णवर्मा
उपाध्याय दीक्षितश्च पाठकः शुक्लभित्रको ।
हिजो द्विवेदी र निवेदी पाउडा एव च
चतुर्वेदादि कविता नामतुल्य गुनः मताः।
(उत्तरपच ।।६।४-५, प्रतिमनचर्व ४॥ २६ ॥६-८)
नामक पुत्र हुआ। कृष्णवर्माको उदय नामका पुत्र हुआ । उदयने वनके बीचमें एक सुन्दर 'उदयपुर' नामका नगर बसाया। उसका पुत्र वाप्यकर्मा हुआ। वाप्यकर्माने अनेक वापी-कूप, तड़ाग, सुन्दर- सुन्दर महल आदि बनवाये। वह धर्मात्मा सदा धर्मकार्य में संलग्न रहता था।
उसी समय एक लाख सैन्यसे युक्त महामदके अनुयायी बीरबलद नामक एक राजाने वाप्यकर्मापर चढ़ाई कर दी, परंतु वाप्यकर्माने पैशाचों और म्लेच्छोंको जीतकर भगवान् कृष्णका कृष्णोत्सव मनाया। वाप्यकर्माको गुहिल नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र कालभोज हुआ। कालभोजका पुत्र हुआ राष्ट्रपाल । राष्ट्रपालने अपने पैतृक स्थानका परित्याग कर सभी मङ्गलोंको प्रदान करनेवाली शारदादेवीकी आराधना की। राष्ट्रपालको वैष्णवी शक्ति प्राप्त हुई। उसके तपसे प्रसन्न हो शारदादेवीने मणिदेवसे रक्षित अत्यन्त रमणीय महावती' नामकी पुरी प्रदान की। उस बुद्धिमान् राजा राष्ट्रपालने उस पुरीमें दस वर्षातक राज्य किया।
राजा राष्ट्रपालको बिजय और प्रजय नामके दो पुत्र प्राप्त हुए। प्रजयने अपने माता-पिताको त्यागकर गङ्गातटपर जाकर बारह वर्षोतक शारदादेवीकी कठोर तपस्या की। शारदादेवी एक कन्याके रूपमें वेणुवादन करती हुई घोड़ेपर सबार हो राजाके सामने उपस्थित हुई और हँसकर बोली- राजपुत्र । तुम किसलिये शिवाकी आराधना कर रहे हो? तुम्हें तपस्याका फल मेरे द्वारा शोध ही प्राप्त होगा।' यह सुनकर प्रजयने कहा-'देवि आपको नमस्कार है, आपनझे एक नवीन नगर प्रदान करें। यह सुनकर देवोगेजयको एक सुन्दर घोड़ा प्रदान किया और वे वेणु-वादन करती हुई दक्षिण दिशाकी ओर चली गयीं। वह राजा भी उस अश्वपर चढ़कर उनके पीछे-पीछे नेत्र बंदकर पश्चिम दिशाकी ओर आया। इसके बाद वह जहाँ मर्कण नामका पक्षिराट् था, वहाँ गया। उसे देखकर वह भयभीत हो गया। तब उस राजाने दोनों नेत्रोंको खोल लिया और कन्याके द्वारा रचित एक शुभ नगरको देखा। उस नगरके उत्तरी भागमें गङ्गा, दक्षिणमें पाण्डुरा, पश्चिममें ईशसरिता तथा पूर्वमें मर्कण पक्षीका स्थान था। यह स्थान कुछ कुब्ज (टेढा) था। कन्याद्वारा निर्मित होने एवं कुछ कुब्ज (टेढ़ा) होनेके कारण यह स्थान कान्यकुब्ज नामसे प्रसिद्ध हुआ। राष्ट्रपालके पुत्र जयपालने दस वर्षतक राज्य किया। वेणुवादन करनेके कारण उसको वेणुक नामका पुत्र प्राप्त हुआ। राजा वेणुकने देवीके द्वारा प्रदत्त मनोहर कन्यामती नामकी कन्याके साथ विवाह किया। कन्यामतीले उसे सात पुत्रियाँ उत्पन्न हुई। वे मातृकाओंकी मङ्गल कलासे समुद्भुत थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं-शोतला, पार्वतो, कन्या, पुष्पवती, गोवर्धनी, सिन्दूरा तथा काली। ये ही क्रमश: ब्राही, माहेश्वरी, कौमारी, वैग्णवी, बाराही, इन्द्राणी और चाम्नुण्डा नामसे प्रसिद्ध हुई। अनन्तर उस रानीसे यशोविग्रह नामक पुत्र हुआ। वह बहुत बलवान् धर्मात्मा तथा आर्यदेशका मालिक था। यशोविग्रहने बीस वर्षतक इस पृथ्वीपर राज्य किया। उसका पुत्र हुआ महीचन्द्र। महीचन्द्रने भी अपने पिता के समान ही राज्य किया। उसका पुत्र चन्द्रदेव हुआ, चन्द्रदेवका पुत्र सन्दपाल राजा हुआ। उसने दस बर्षातक राज्य किया। उसका पुत्र कुम्भपाल हुआ।
ददर्श नगर रम्य कन्या रचितं शुभम् ।
उत्तरे तस्य वै गङ्गा दक्षिणेनास पाण्डुरा॥
पश्चिमे ईशसरिता पूर्व पक्षीस पक्राणः ।
कुलभूतमभूग्राम कान्यकुन्ज इति स्मृतः ॥
(प्रतिसगंधर्व ४।३।५० ५१)
'म्लेच्छ और पैशाचधर्मका अनुयायी महामोद राजनीया नामक नगरीका अधिपति था, उसने बहुत-से देशोंको लूटकर धन एकत्र किया था। वह कुम्भपालके पास गया। उसने कुम्भपालको बहुत-सा धन दिया। बुद्धिमान् कुम्भपालने बीस वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र देवपाल हुआ।
देवपालने अनंगपाल नामक राजाकी कन्या चन्द्रकान्तिके साथ विधिपूर्वक विवाह किया। देवपालने कान्यकुब्ज प्राप्तकर अनेक राजाओंको जीतकर अपने पिताके समान राज्य किया। उसे जयचन्द्र और रत्नभानु नामके दो पुत्र हुए। जयचन्द्रने पूर्व और रत्नभानुने उत्तर दिशामें आर्यदेशको जीतकर वैष्णवराज्यको प्राप्त किया। रत्नभानुका पुत्र लक्षण नामसे विख्यात हुआ। वह कुरुक्षेत्रमें युद्ध करता हुआ दिवंगत हो गया। बुद्धिमान् वैश्यपाल, कुम्भपाल और शुक्लवंश समाप्त हो गया। विष्वक्सेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राजा विष्वक्सेनवंशीय, विसेनके कुलमें उत्पन्न होनेवाले विसेनवंशीय क्षत्रिय, गुहिलके कुलमें उत्पन्न होनेवाले गौहिल क्षत्रिय, राष्ट्रपालके कुलमें उत्पन्न होनेवाले राष्ट्रपालवंशीय क्षत्रिय कहलाये। शुक्लवंशके धुरंधर लक्षणके मरनेके बाद सभी प्रधान क्षत्रिय राजा कुरुक्षेत्रमें समाप्त हो गये। शेष छोटे-छोटे राजा वर्णसंकर तथा म्लेच्छोंसे दूषित होकर भयानक म्लेच्छ-राज्यमें स्थित हो गये। (अध्याय ३)