भविष्य महा पुराण

अन्नदानकी महिमाके प्रसंगमें राजा श्वेत और एक वैश्यकी कथा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! किसी। समय मुनियोंने अन्नदानका जो माहात्म्य कहा था, ठसे मैं कह रहा हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें। अनघ! आप अनवान करें, जिससे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है। वनमें श्रीरामचन्द्रजीने दुःखी होकर लक्ष्मणसे कहा था 'लक्ष्मण! सम्पूर्ण पृथ्वी अनसे परिपूर्ण है, फिर भी हमलोगोंको अन्न नहीं मिल रहा है, इससे यही जान पड़ता है कि हमलोगोंने पूर्वजन्मोंमें ब्राह्मणों को कभी अत्रका भोजन नहीं कराया *।' मनुष्य जिस कर्मरूपी बीजको बोता है, जैसा कर्म करता है, वह उसीका फल पाता है। संसारमें यह ठीक ही कहा जाता है कि बिना दिये कुछ नहीं मिलता। भोजनयोग्य जिस अत्रका दान किया जाता है, वह अन्नदान परम श्रेयस्कर है। भारत! भोज्य पदार्थोंमें बहुतसे पदार्थ हैं, किंतु अन्नका दान सब दानोंसे श्रेष्ठ दान है। सत्यसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं, संतोषसे बड़ा कोई सुख नहीं और अन्नदानसे बढ़कर कोई दान नहीं हैं। स्नान, अनुलेपन और वस्त्रालंकारोंसे मनुष्योंको वैसी तृत्ति नहीं होती, जैसी भोजनसे होती है। इस विषयमें एक इतिहास है-

राजन्! बहुत पहले एक श्वेत नामके चक्रवर्ती राजा हुए हैं, उन्होंने अनेक यज्ञ किये और अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त की। अनेक प्रकारका दान दिये और धर्मपूर्वक राज्यपर शासन किया। राजाने अनेक प्रकारके उत्तम भोग भोगकर अन्तमें राज्यका परित्याग कर वनमें जाकर तपस्या की अन्तमें वे दिव्य विमानमें आरूढ़ होकर स्वर्ग गये वहाँ विद्याधर, किंनर आदिके साथ विहार करने लगे। अप्सराएँ उनकी सेवायें रहती थी। गन्धर्व उन्हें गीत सुनाकर रिझाते, इन्द्र भी उनका बड़ा सम्मान करते थे। राजाको दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि पहननेको तो मिलता था, परंतु भोजनके समय विमानमें बैठकर भूलोकमें आकर अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खाना पड़ता था। प्रतिदिन मांसका भोजन करनेके बाद भी पूर्वजन्मके कर्मके कारण उस पूर्वशरीरका मांस घटता नहीं था। इस प्रकार प्रतिदिन मांस-भक्षणसे व्याकुल होकर राजाने ब्रह्माजीसे कहा-'ब्रह्मन् ! आपके अनुग्रहसे मुझे स्वर्गका सुख प्राप्त हुआ है, सभी देवता मेरा आदर करते हैं। सभी सामग्री उपभोगके लिये प्राप्त होती रहती है, परंतु सभी भोगोंके रहते हुए भी यह पापिनी क्षुधा कभी शान्त नहीं होती, मुझे सदा सताती रहती है। इसी कारण मुझे अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खानेके लिये भूलोकमें जाना पड़ता है और इसमें मुझे बड़ी घृणा होती है। मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिससे मुझे उत्तम भोजन नहीं मिलता। आप कृपाकर ऐसा कोई उपाय बतायें, जिससे मेरा यह दुःख दूर हो जाय।'

ब्रह्माजी बोले-राजन् ! आपने अनेक प्रकारके दान दिये हैं, बहुत-से यज्ञ किये हैं और गुरुजनोंको भी संतुष्ट किया है, परंतु ब्राह्मणों को स्वादिष्ट उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन नहीं कराया। अन्नदान न करने से ही आज आपकी यह दशा हो रही है। अन्नसे बढ़कर कोई संजीवनी नहीं। अन्नको ही अमृत जानना चाहिये। इसलिये अब आप पृच्चीपर जाकर वेदशास्त्र जाननेवाले कुलीन ब्राह्मणों को भोजन करायें। उससे आपका यह दुःख दूर हो जायगा।

* पृथिव्यामत्रपूर्णायां वयमश्रस्य काङशिणः।

सौमित्रे नूनमस्माभिर्न ब्राह्मणमुखे हुतम् ॥

 (उत्तरपर्व १५९।४)

ब्रह्माजीका वचन सुनकर राजा श्वेतने पृथ्वीपर आकर महर्षि अगस्त्यजीको परमभक्तिसे भोजन कराया और अपने गलेकी दिव्य एकावली (माला*)- को दक्षिणाके रूपमें समर्पित किया। अगस्त्यजीको भोजन कराते ही राजा घेत संतुष्ट हो गये और सभी देवता वहाँ आकर अतीव आदरपूर्वक राजाको विमानमें बैठाकर स्वर्गलोक चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने जब रावणका वध कर दिया, तब वह एकावली आगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीको दे दी। यह अन्नदानका ही माहात्म्य है।

मेरा वचन सत्य है कि प्राणियोंके लिये अत्रसे चढ़कर कोई उत्तम पदार्थ नहीं है। अन्न जीवोंका प्राण है । अन्न ही तेज, बल और सुख है। इसलिये अत्रदाता प्राणदाता हैं। भूखा व्यक्ति जिस दूसरे व्यक्तिके घर आशा करके जाता है और वहाँसे संतुष्ट होकर आता है तो भोजन देनेवाला व्यक्ति धन्य हो जाता है, उसके समान पुण्यकर्मा और कौन होगा? दीक्षा-प्राप्त सातक, कपिला गौ, याज्ञिक, राजा, भिक्षु तथा महोदधि-ये सब दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं। इसलिये घरपर आये भूखे व्यक्तिको जो भोजन न दे सके उसका गृहस्थाश्रम व्यर्थ है। अन्नके बिना कोई अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकता। मनुष्योंका दुष्कृत अर्थात् किया हुआ दूषित कर्म अन्नमें प्रविष्ट हो जाता है, इसलिये जो ऐसे व्यक्तिका अन्न खाता है, वह अन्न ट्रेनेवालेके दुष्कृतका ही भक्षण करता है। इसके विपरीत अमृतमय पवित्र परानका भोजन करनेवाले व्यक्तिका एक महीने का किया हुआ पुण्य अन्नदाताको प्राप्त हो जाता है। जिस अनके दानका इतना महत्त्व है, उसका दान क्यों नहीं करते? (अर्थात् घोड़ा- बाहुन अवश्य करो, कला चाहिये। जो व्यक्ति ब्राह्मण, अतिथि आदिको भोजन आदि कराने तथा भिक्षा देनेके पूर्व ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह केवल पाप ही भक्षण करता है। जिस व्यक्तिने दस हजार या एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया है, उसने मानो ब्रह्मलोकमें अपना स्थान बना लिया।

प्राचीन कालमें वाराणसीमें देवता और ब्राह्मणोंका पूजक धनेश्वर नामका एक वैश्य रहता था। उसकी दूकानमें एक स्थानपर एक सर्पिणीने अण्डा दिया और वह उस अण्डेको छोड़कर कहीं अन्यत्र चली गयी। वैश्यने अण्डेको देखा और उसपर दयाकर उसकी रक्षा करने लगा। कुछ समय बाद अण्डेको फोड़कर कृष्ण सर्पका बच्चा बाहर निकला। उस सर्पके बच्चेको वैश्य प्रतिदिन दूध पिलाता था। वह सर्प भी वैश्यके पैरोंपर लोटता, उसके अङ्गोंको चाटता और पूरे घरमें निर्भय हो घूमता रहता। वैश्य भी भली भाँति सर्पकी रक्षा करता। थोड़े ही समय में वह भयंकर सर्प हो गया। किसी समयकी बात है, वह धनेश्वर गङ्गा-स्नान करने के लिये गया था और उसका पुत्र दूकानपर बैठकर सामान बेच रहा था। उसी समय वह सर्प उस लड़केके पैरोंके बीचसे निकला, जिससे वह लड़का डर गया और उसने सर्पको डंडेसे मारा। चोट लगते ही सर्प उछलकर वैश्यपुत्रके सिरपर बैठ गया और क्रोधित्त होकर कहने लगा-'मूर्ख! मैं तुम्हारे पिताको शरणमें हूँ और तुम्हारे पिताने ही मेरा पालन-पोषण किया है, इसलिये मैं तुम्हारा भी भला ही चाहता था, परंतु तुमने मुझे अकारण ही प्रताड़ित किया है, इसलिये अब मैं तुम्हें जीवित नहीं छोडूंगा।' सर्पक इस प्रकार कहनेके साथ ही वैश्यके घरमें दु:खी हो सब रोने लगे।

उसी समय अच्युत, गोविन्द, अनन्त आदि भगवानके पवित्र नामाका उच्चारण करता हुआ स्रानकर वह धनेश्वर भी घर आ गया। पुत्रकी

*महाराज श्वेतकी कथा कई स्थानोंपर है, किंतु वाल्मीकीय रामायण उत्तरकाण्ड के 77 तथा 78 सर्गोंमें बड़ी रम्ब शैली और मधुर पदावालियों वर्णित हुई है। वहाँ एकावली मालाकी जगह केयूर आदि दिव्य आभूषणकी बात निर्दिष्ट है।

वैसी स्थिति देखकर उसने सर्पसे कहा-'पन्नग! तुम मेरे पुत्रके मस्तकपर फण फैलाये क्यों बैठे हो? यह ठीक ही कहा गया है कि मूर्ख मित्र और हीन जातिमें उत्पन्न प्राणीके साथ सम्बन्ध करना अपने हाथसे जलता हुआ अंगारा ठठाना है।' वणिक्की बात सुनकर साँपने कहा-

धनेश्वर ! तुम्हारे पुत्रने मुझे निरपराध ही मारा है, इसलिये तुम्हारे सामने ही मैं इसका प्राण ले रहा हैं, जिससे अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे।' यह सुनकर धनेश्वरने कहा-'सर्प! जो उपकार, भक्ति तथा स्रेह आदिको भूलकर अपने रास्तेसे भटक जाय अर्थात् अपने कर्तव्यमार्गको छोड़ दे, उसे कौन रोक सकता है, परंतु क्षणमात्र तुम इस बालकको छोड़ दो, दंश न करो, जिससे मैं ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपना औवदेहिक कर्म अपने हाथसे कर सकूँ, क्योंकि बादमें मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा।' सने इस बातको स्वीकार कर लिया।

तदनन्तर वैश्यने वेदवेत्ता और जितेन्द्रिय एक हजार ब्राह्मणों तथा संन्यासियों आदिको घो. पायससहित मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया। भोजनसे संतुष्ट हो ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा-

वणिक्पुत्र चिरं जीव नश्यन्तु तव शत्रवः ।

अभीष्टफलसंसिद्धिरस्तु ते ब्राह्मणाज्ञया।

(उत्तरपर्व १६२।६३)

'वणिक्पुत्र! ब्राह्मणोंकी आज्ञासे तुम चिरंजीची होओ, तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जाये और तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जाय।'

ऐसा कहकर बाहाणो अक्षत और पुष्प वैश्यपुत्रके मस्तकपर छोड़े। ब्राह्मणों के वाग्वजसे ताड़ित होकर वह सर्प मस्तकसे गिरा और मर गया। सर्पको मरा हुआ देखकर धनेश्वरको बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा कि मैंने इस सर्पको पुत्रकी भौति पाला था और आज यह मेरे ही दोषसे मर गया। यह बड़ा ही अनुचित हुआ। उपकार करनेवालेमें जो साधुता रखता है, उसकी साधुतामें कौन-सी विशेषता रहती है ? अर्थात् वह प्रशंसाके योग्य नहीं है, किंतु जो अपकारियोंमें साधुता रखता है, उसको साधुता ही सराहनीय है।

इस प्रकार अनेक प्रकारसे यशात्ताप करते हुए दुःखी होकर वैश्यने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात्रिमें सो सका । प्रातःकाल होते ही गङ्गामें स्रान कर देवता-पितरोंका पूजन तर्पण आदि कर घर आया और पुन: एक हजार ब्राह्मणों को अनेक प्रकारके उत्तम व्यसनोंका भोजन कराकर संतुष्ट किया। इसपर ब्राहाणोंने प्रसन्न होकर कहा 'धनेश्वर ! हमलोग तुमसे बहुत ही संतुए हैं, इसलिये तुम वर माँगो। यह सुनकर उसने बर माँगा कि 'यह मृग सर्प पुनः जीवित हो जाय।' वैश्यके यह कहनेपर ब्राह्मणोंने अभिमन्त्रित जल सर्पके ऊपर छिड़का। जलके छोटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया। यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ और नगरके लोग धनेश्वरकी प्रशंसा करने लगे।'

महाराज! यह सहल ब्राह्मण भोजन (अन्नदान) का संक्षेपसे मैंने माहातय वर्णन किया। जो व्यक्ति ब्राह्मणों को और अध्यागतीको अन्न देता है, वह बहुत दिनतका संसार सुखको भोगकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १६९)

१-मूख मित्रं सम्बन्धं होनजातिजनो हि यः ।

य: करोत्यबुधोऽङ्गारान् स स्वहस्तेन कर्षति ॥

(उत्तरपर्च १६९ । ५६)

२-उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः ।

अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्धिरिष्यते ।।

(उत्तरपर्व १६९।६७)