भविष्य महा पुराण

विवाह-संस्कारके उपक्रममें स्त्रियोंके शुभ और अशुभ लक्षणोंका वर्णन तथा आचरणकी श्रेष्ठता

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! गुरुके आश्रममें ब्रह्मचर्यद्वतका पालन करते हुए स्नातकको वेदाध्ययन कर गृहस्था ग्राम प्रवेश करना चाहिये। घर आनेपर उस ब्रह्मचारीको पहले पुष्य-माला पहनाकर, शय्यापर बिठाकर उसका मधुपर्कविधिसे पूजन करना चाहिये। तब गुरुसे आज्ञा प्राप्तकर उसे शुभ लक्षणोंसे युक्त सजातीय कन्यासे विवाह करना चाहिये।

राजा शतानीकने पूछा-हे मुनीश्वर! आप प्रथम स्त्रियोंके लक्षणों का वर्णन करें और यह भी बतायें कि किन लक्षणों से युक्त कन्या शुभ होती है।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! पूर्वकालमें ऋषियोंके पूछनेपर ब्रह्माजीने स्त्रियोंके जो उत्तम लक्षण कहे हैं, उन्हें मैं संक्षेपमें बतलाता हूँ, आप ध्यान देकर सुने।

ब्रह्माजीने कहा-ऋषिगणो ! जिस स्त्रीके चरण लाल काल के समान कास्तिवाले अत्यन्त कोमल

तथा भूमिपर समतल रूपसे पड़ते हों अर्थात् बीचमें ऊँचे न रहें, वे चरण उत्तम एवं सुख-भोग प्रदान करनेवाले होते हैं। जिस स्त्रीके चरण रूखे, फटे हुए, मांसरहित और नाड़ियोंसे युक्त हों, वह स्त्री दरिद्रा और दुर्भगा होती है। यदि पैरकी अंगुलियाँ परस्पर मिली हों, सीधी, गोल, स्निग्ध और सूक्ष्म नखोंसे युक्त हों तो ऐसी स्त्री अत्यन्त ऐश्वर्यको प्राप्त करनेवाली और राजमहिषी होती है। छोटी अंगुलियाँ आयुको बढ़ाती हैं, परंतु छोटी और विरल अंगुलियाँ धनका नाश करनेवाली होती हैं।

जिस स्त्रीके हाथकी रेखाएं गहरी, स्निग्ध और रक्तवर्णकी होती हैं, वह सुख भोगनेवाली होती है, इसके विपरीत टेढ़ी और टूटी हुई हों तो वह दरिद्र होती है। जिसके हाथमें कनिष्ठाके मूलसे तर्जनीतक पूरी रेखा चली जाय तो ऐसी

*श्रद्धानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि।

अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्रं दुष्कुलादपि।।

विषादप्यभूतं ब्राहं बालदपि सुभाषितम्।

अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम्।।

(ब्राह्मपर्वारन्छ-२०८)

स्त्री सी वर्षतक जीवित रहती है और यदि न्यून हो तो आयु कम होती है। जिस स्त्रीके हाथकी अंगुलियौ गोल, लम्बी, पतली, मिलानेपर छिद्ररहित, कोमल तथा रक्तवर्णकी हों, वह स्त्री अनेक सुख-भोगोंको प्राप्त करती है। जिसके नख बन्धुजीव- पुष्पके समान लाल एवं ऊँचे और स्निग्ध हाँ तो वह ऐश्वर्यको प्राप्त करती है तथा रूखे, टेढे, अनेक प्रकारके रंगवाले अथवा श्रेत या नीले-पीले नोंवाली स्त्री दुर्भाग्य और दारिद्र्यको प्राप्त होती है। जिस स्त्रीके हाथ फटे हुए, रूखे और विषम अर्थात् ऊँचे-नीचे एवं छोटे-बड़े हों वह कष्ट भोगती है। जिस स्त्रीकी अँगुलियों के पर्वो में समान रेखा हो अथवा यवका चिह्न होता है, उसे अपार सुख तथा अक्षय धन-धान्य प्राप्त होता है जिस स्त्रीका मणिबन्ध सुस्पष्ट तीन रेखाऑसे सुशोभित होता है, वह चिरकालतक अक्षय भोग और दीर्घ आयुको प्राप्त करती है।

जिस स्त्रीकी ग्रीवामें चार अङ्गुलके परिमापमें स्पष्ट तीन रेखाएँ हों तो वह सदा रत्नोंके आभूषण धारण करनेवाली होती है। दुर्बल ग्रीवावाली स्त्री निर्धन, दीर्घ ग्रीवावाली बन्धकी, ह्रस्वग्रोवावाली मृतवत्सा होती है और स्थूल ग्रीवावालौ दुःख- संताप प्राप्त करती है। जिसके दोनों कंधे और कृकाटिका (गरदनका उठा हुआ पिछला भाग) ऊँचे न हों, वह स्त्री दीर्घ आयुवाली तथा उसका पति भी चिरकालतक जीता है।

जिस स्त्रीको नासिका न बहुत मोटी, न पतली, न टेढ़ी, न अधिक लम्बी और न ऊँची होती है वह श्रेष्ठ होती है। जिस स्त्रोको भौहें ऊँची, कोमल, सूक्ष्म तथा आपसमें मिली हुई न हों, ऐसी स्त्री सुख प्राप्त करती है। धनुषके समान भौहे सौभाग्य प्रदान करनेवाली होती है स्त्रियोंके काले, खिग्ध, कोमल और लम्बे घुँघराले केश उत्तम होते हैं।

हंस, कोयल, वीणा, भ्रमर, मयूर तथा वेणु (वंशी) के समान स्वरवाली स्त्रियाँ अपार सुख- सम्पत्ति प्राप्त करती हैं और दास-दासियोंसे युक्त होती हैं। इसके विपरीत फूटे हुए काँसेके स्वरके समान स्वरवाली या गर्दभ और कौवेके सदृश स्वरवाली स्त्रियाँ रोग, व्याधि, भय, शोक तथा दरिद्रताको प्राप्त करती हैं। हंस, गाय, वृषभ, चक्रवाक तथा मदमस्त हाथीके समान चालवाली स्त्रियाँ अपने कुलको विख्यात बनानेवाली और राजाकी रानी होती हैं। श्वान, सियार और कौवेके समान गतिबाली स्त्री निन्दनीय होती है। मृगके समान गतिवाली दासी तथा द्रुतगामिनी स्त्री बन्धकी होती है। स्त्रियोंका फलिनी, गोरोचन, स्वर्ण, कुंकुम अथवा नये-नये निकले हुए दूर्वाङ्करके सदृश रंग उत्तम होता है। जिन स्त्रियों के शरीर तथा अङ्ग कोमल, रोम और पसीनेसे रहित तथा सुगन्धित होते हैं, वे स्त्रियाँ पूज्य होतो हैं।

कपिलवर्णवाली, अधिकाङ्गी, रोगिणी, रोमोंसे रहित, अत्यन्त छोटी (बौनी), वाचाल तथा पिंगल- वर्णवाली कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये । नक्षत्र, वृक्ष, नदी, म्लेच्छ, पर्वत, पक्षी, साँप आदि और दासीके नामपर जिसका नाम हो तथा डरावने नामवाली कन्यासे विवाह नहीं करना चाहिये। जिसके सब अङ्ग ठीक हो, सुन्दर नाम हो, हंस या हाथीकी सी गति हो, जो सूक्ष्म रोम, केश और दौतावाली तथा कोमलाङ्गी हो, ऐसी कल्यासे विवाह करना उत्तम होता है। गौ तथा धन धान्यादिसे अत्यधिक समृद्ध होने पर भी इन दस कुलोंगे विवाहका सम्बन्ध स्थापित नहीं करना चाहिये जो संस्कारोंसे रहित हों, जिनमें पुरुष संतति न होती हो, जो वेदके पतन-पाठनसे रहित हों, जिनमें स्त्री पुरुषों के शरीरॉपर बहुत लम्बे केश हो, जिनमें

अर्श (बवासीर), क्षय (राजयक्ष्मा), मन्दाग्नि, मिरगी, श्वेत दाग और कुष्ठ-जैसे रोग होते हों।

ब्रह्माजीने ऋषियोंसे पुन: कहा-ये सब उत्तम लक्षण जिस कन्यामें हों और जिसका आचरण भी अच्छा हो उस कन्यासे विवाह करना चाहिये। स्त्रीके लक्षणोंकी अपेक्षा उसके सदाचारको ही अधिक प्रशस्त कहा गया है। जो स्त्री सुन्दर शरीर तथा शुभ लक्षणोंसे युक्त भी है, किंतु यदि वह सदाचारसम्पन्न (उत्तम आचरणयुक्त) नहीं है तो वह प्रशस्त नहीं मानी गयी है। अत: स्त्रियों में आचरणको मर्यादाको अवश्य देखना चाहिये । ऐसे सल्लक्षणों तथा सदाचारसे सम्पन्न सुकन्यासे विवाह करनेपर ऋद्धि, वृद्धि तथा सत्कीर्ति प्राप्त होती है। (अध्याय ५)