भविष्य महा पुराण

तिथिदान (तिथियोंमें दानके पदार्थ)

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले और विघ्नोंको हरनेवाले तिथिदान (तिथियोंमें दिये जानेवाले दान-पदार्थो) का विधान बता रहा हूँ। इस दानके करनेसे कायिक, वाचिक और मानसिक पाप उसी क्षण कट जाते हैं। श्रावण, कार्तिक, चैत्र, वैशाख अथवा फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षको प्रतिपदा तिथिसे यह पुण्यवर्धक दान प्रारम्भ करना चाहिये। धन, श्रद्धा, सहयोगी और सत्पात्र-ये सब मिल जायें तो वही उत्तम दानका समय है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा परमें हो श्रद्धापूर्वक दान देनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है प्रतिपदाके दिन एक सुवर्णमय अष्टदल कमल बनाकर उसपर सुवर्णमय ब्रह्माकी स्थापना करे। इस कमलको सुगन्धित घृतसे पूर्ण औदुम्बरके पात्रमें रखकर पुष्प, धूप आदिसे ब्रह्माकी पूजा करे और ब्राह्मणकी पूजा कर उसे वह प्रतिमा दानमें दे दे। दाता इससे अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है और निष्कामभावसे यह दान करनेपर तो ब्रह्मीभूत हो जाता है। द्वितीयाके दिन सुवर्णकी अग्निकी प्रतिमा बनाये, उसे गुड़ तथा घृतसे पूरित ताम्रपात्रमें रखे और उस पात्रको जलपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित करे, फिर व्याहतियोंसे घृत और तिलोंसे एक सौ आहुति

देकर पूर्णाहुति प्रदान करे। वस्त्र-माला, अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्यसे उस मूर्तिका पूजनकर ब्राह्मणको दे दे और वह्रिमें प्रीयताम्' यह वाक्य ठच्चारण करे। इससे जन्मभर किये गये पापोंसे मुक्त होकर वह वह्रिलोकमें निवास करता है- ऐसा नारदमुनिने कहा है। तृतीयाके दिन सुवर्णकी राधादेवीकी मूर्ति बनाकर उसे ताम्रपात्रमें लवणके ऊपर स्थापित करे और दो रक्त वस्त्रोंसे उसे आच्छादित कर कुंकुमसे अलंकृत कर दे। जीरा, कटुक, गुड़ भी उसके पास रखे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको प्रदान कर दे। इससे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। जहाँ सुवर्णप्रासाद हों, दूधकी नदियाँ बहती हों और गन्धर्व-अप्सराएँ जहाँ निवास करते हों, उन लोकोंमें वह पुरुष बहुत काल सुख भोगकर पुनः मर्त्यलोकमें जन्म लेता है और रूपवान, भाग्यशाली, दाता, भोगी, धनाढ्य और पुत्र-पौत्रसे युक्त होता है तथा यदि स्त्री भी इस दानको करती है तो वह भी इन्हीं फलोंको प्राप्त करती है।

चतुर्थीके दिन सुवर्णके एक पलसे अधिक प्रमाणके अंकुशयुक्त हाथीकी प्रतिमा बनाकर एक द्रोण तिलोंके ऊपर उसे स्थापित करे और वस्त्र, पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर ब्राह्मणोंको प्रदान करे तथा 'गणेशो मे प्रीयताम्' यह वाक्य कहे। जो पुरुष यह दान करता है उसके किसी भी कार्यमें विघ्न नहीं होता और सात जन्मत्तक वह महान् हस्तियोंका स्वामी होता है तथा गजेन्द्रपर चढ़कर सब लोकोंको जीत लेता है। पशमीके दिन एक पल सुवर्णका नाग बनाकर घृत-दुग्धसे पूर्ण एक पात्रमें उसे स्थापित कर विधिपूर्वक उसका पूजन करे। पूजनके अनन्तर उसे ब्राहाणको देकर प्रणामकर क्षमापन करे। यह दाग नागोंके उपनवको दूर करता है और दाताको दोनों लोकमें सुख प्राप्त होता है। सर्पके काटनेसे मरे हुए पुरुषके उसारके लिये शिवजीने से प्रायशित्त कहा है। षष्ठीके दिन मयूरपर मारूढ़ तथा हाथमें शक्ति लिये और सुवर्णकी माला पहने कार्तिकंपकी एक सुवर्णकी प्रतिमा बनाये। उसे एक द्रोण चावलके ऊपर स्थापित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि सभी उपचारोंसे उसका पूजन करे और कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रदान करे। इस दानको करनेवाला पुरुष बहुत ऐश्वर्य प्राप्तकर अन्तमें स्वर्गको जाता है और यदि शूद्र इस दानको करे तो जन्मान्तरमें ब्राह्मण होता है। यदि ब्राह्मण ऐसा करता है तो ब्रह्मत्वको प्रास करता है। सप्तमीको सुवर्णकी अश्वयुक्त सूर्य प्रतिमा बनाकर सब उपचारोंसे उसका पूजनकर दक्षिणासहित ब्राह्मणको दे दे। इससे गन्धर्व संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष सूर्यलोकको प्राप्त करता है।

अष्टमीके दिन एक सर्वलक्षणसम्पन्न वृषभको दो श्वेत वस्त्र ओढ़ाकर उसके गलेमें घण्टा बाँधकर उसका पूजन करे और 'वृषभध्वजो मे प्रीयताम्' यह वाक्य उच्चारण कर ब्राह्मणको प्रदान करे। उसकी प्रदक्षिणा करे तथा ब्राह्मणके द्वारदेशतक उसके साथ जाय। इससे उसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। वृषकें स्कन्ध प्रदेशमें चौदह भुवन प्रतिष्ठित रहते हैं। इसलिये वृषदान करनेसे चौदह भुवनोंके दान करनेका फल प्राप्त होता है। नवमीके दिन सुवर्णका एक सिंह बनाकर नीले वस्त्रसे उसे आच्छादित करे और उसे आठ मोतियोंसे जटित करे । दैत्योंका विनाश करनेवाली देवी भगवतीका ध्यानकर उस प्रतिमाको उत्तम ब्राह्मणको दान कर दे। इसके प्रभावसे सब प्रकारके उत्तम फल प्राप्त होते हैं और भयंकर वनोंमें तथा दुगोंगे एवं चोरों तथा सादि हिंसक जीवोंका उसको भय नहीं होता। कोई भी हिंसक प्राणी उसकी हिंसा नहीं कर पाता और अन्त समयमें देवताओंसे पूजित हो वह देवीलोकको प्राप्त करता है। वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर पुण्यक्षीण होनेपर मर्त्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा राजा होता है। दशमीको दस दिशा-देवियोंकी सोनेकी प्रतिमा बनाकर और दस पात्रों में नमक, गुड़, दूध, निष्पाच, तिल, दही, घी, गोमय, चावल तथा उड़द भरकर इनके ऊपर एक-एक देवीकी स्थापना करे। वस्त्र-पुष्य आदिसे उनकी पूजाकर ब्राह्मणको दान कर दे। इस दानसे दानककि सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और मृत्युके अनन्तर वह स्वर्गमें पूजित होता है। बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीमें उत्तम कुलमें जन्म प्राप्त करता है। एकादशीके दिन सुवर्णकी भगवान् विष्णुको प्रतिमा बनाये। उसे घृतपूर्ण ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित कर सभी उपचारोंसे उसका पूजन करे। पूजनके अनन्तर पञ्चाग्नि तापनेवाले तथा पौराणिक ब्राह्मणको इसे देना चाहिये। इससे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।

द्वादशीके दिन गौ, वृष, सुवर्ण, सप्तधान्य, गुड़, फल, घृत और अनेक प्रकारके रस तथा फलवाले वृक्ष, फूल तथा सुगन्धित पदार्थ आदिको यथाशक्ति एकत्र कर सबको नवीन वस्त्रसे आच्छादित कर सत्पात्र ब्राह्मणोंको दान करे अथवा एक ही ब्राह्मणको प्रदान करे। इससे दाता बहुत कीर्ति और ऐश्वर्य प्राप्तकर अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। वहाँ बहुत कालतक निवास कर पुण्यक्षय होनेपर पृथ्वीपर जन्म लेकर यज्ञ करनेवाला दानी और प्रतापी राजा होकर शतायु होता है। त्रयोदशीके दिन तेरह सत्पात्र ब्राहमणोको स्नान कराये, उत्तम वस्त्र पहिनाये, गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर उनकी अर्चना करे तथा उत्तम भोजन कराये और दक्षिणामें सुवर्ण देकर 'धर्मो में प्रीयताम्' ऐसा कहे और श्रद्धापूर्वक धर्मराजके इन तेरह नामों-धर्मराज, काल, चित्रगुप्त, दण्डी, मृत्यु, क्षयरूप, अन्तक, यम, प्रेतनाथ, रौद्र, वैवस्वत, महिषस्थ तथा देवका उच्चारणकर नमस्कार करे और विसर्जन करे। इस विधिसे जो पुरुष यमराजका अर्चन करता है, वह सभी रोगोंसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और यममार्गमें कष्ट नहीं पाता। पितृलोकमें बहुत कालतक निवासकर वह मर्त्यलोकमें जन्म लेकर सुखी और पुत्रवान् होता है।

चतुर्दशीके दिन उत्तम सुन्दर सोनेकी महिषकी प्रतिमा बनाकर उसे जलपूर्ण कलशपर स्थापित कर वस्त्रसे ढककर वस्त्र तथा अलंकारोंसे सुशोभित करे। उसके साथ वृषभ भी रखे। इस प्रकार निर्माणकर उसे कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इससे शिवलोककी प्राप्ति होती है, वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर आरोग्य, धन और उत्तम कुलमें जन्म पाता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमाके दिन वृषोत्सर्ग करना चाहिये । चाँदीकी एक चन्द्रमाकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर वस्त्र तथा आभूषणसहित ब्राह्मणको प्रदान करे। यह दान करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होता है और अप्सराओंसे पूजित होता है। जो पुरुष इस क्रमसे प्रतिपदा आदि तिथियों में ब्राह्मणोंको दान करता है, वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक आदिमें बहुत कालतक निवासकर अन्तमें शिव-सायुज्यको प्राप्त करता है। (अध्याय १९३)