भगवान् श्रीकृष्णा बोले-महाराज ! अब मैं सभी पापों का नाशक तथा सुर, असुर और मुनियों के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ बृहत्तपोव्रतका विधान बतलाता हूँ, आप सुनें-आश्विन मासकी पूर्णिमाके दिन आत्मशुद्धिपूर्वक उपचासकर रातमें घृतमिश्रित पायसका भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रात:
*सभी रामायणोंमें शत्रुघ्र-पन्नीका नाम श्रुतिकीर्ति प्राप्त होता है। इस ठरणका पर्याय मानना चाहिये। भाव प्रायः समान है।
उठकर पवित्र हो आचमनकर बिल्वके काष्ठसे दन्तधावन करे। अनन्तर इस मन्त्रसे महादेवजीकी प्रार्थना करनी चाहिये-
अहं देवव्रतमिदं कर्तुमिच्छामि शाश्वतम्।
तवाज्ञया महादेव यथा निर्वहते कुरु॥
(उत्तरपर्व १२॥ ४)
'महादेव! मैं आपकी आज्ञासे निरन्तर बृहत्तपोव्रत करना चाहता हूँ। जिस प्रकार मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो जाय, आप वैसी कृपा करें।'
नियमपूर्वक सोलह वर्षपर्यन्त प्रतिपद्का व्रत करना चाहिये। फिर मार्गशीर्ष मासकी प्रतिपदाको उपवास कर गुरुजनोंसे आदेश प्राप्त करके महादेवका स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये और रातमें दीपक जलाकर शिवको निवेदित करना चाहिये। शिवभक्त सपलीक सोलह ब्राह्मणों को निमन्त्रित कर वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजन कर भोजन कराये या आठ दम्पतिको भोजन कराये यदि शक्ति न हो तो एक ही दम्पतिका पूजन करे। निराहार व्रत करके रातमें भूमिपर शयन करना चाहिये। सूर्योदय होनेपर स्नान करके सभी सामग्रियोंको लेकर शिवजीका उद्धर्तन एवं पचगव्यसे स्नान कराना चाहिये। अनन्तर पञ्चामृत, तिलमिश्रित जल और गर्म जलसे स्नान कराना चाहिये। स्नानके अनन्तर कर्पूर, चन्दन आदिका लेपकर कमल आदि उत्तम पुष्प चढ़ाने चाहिये। वस्त्र, पताका, वितान, धूप, दीप, घण्टा एवं भौति- भौतिके नैवेध महादेवजीको समर्पित कर अपि प्रज्वलित कर एवं उसकी पूजाकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। घर आकर पञ्चगव्य प्राशन कर आचार्य आदिको भोजन कराकर अपने सभी बचुभों के साथ मौन होकर भोजन करना चाहिये। फिर स्वर्ण, काल आदि देकर ब्राह्मणोंसे क्षमा मांगे। धनवान् व्यक्ति श्रद्धापूर्वक साङ्गोपाङ्ग निर्दिष्ट विधिसे पूजन को एवं यदि कोई व्यक्ति निर्धन हो तो वह श्रद्धापूर्वक जल, पुष्प आदिसे पूजा करे। इससे व्रतके सम्यक् फलकी प्राप्ति होती है। श्रद्धाके साथ कार्तिककी प्रतिपदासे लेकर प्रतिमास इस विधिसे व्रत करना चाहिये। अनन्तर पारणा करनी चाहिये। सोलहवें वर्षमें पारणाके दिन शिवजीकी पूजा कर सोनेकी सींग, चाँदीके खुर और घण्टा, काँसेके दोहन-पात्रके साथ उत्तम गाय महादेवजीके निमित्त शिवभक्त ब्राह्मणों को देनी चाहिये। अनन्तर सोलह ब्राह्मणोंका विधि-विधानसे पूजनकर यथाशक्ति वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजनकर उत्तम पदार्थोका भोजन कराना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर दक्षिणा दे। दीनों, अन्धों, अनाथों आदिको भी भोजन कराकर कुछ दान देना चाहिये। यह बृहत्तपोव्रत ब्रह्महत्या जैसे पापोंका हरण और तीनों लोकोंमें अनेक प्रकारके उत्तम भोगोंको प्रदान करनेवाला है। चारों वर्गों के लिये यह स्वर्गकी सीढ़ी है। धन पाकर भी जो इस व्रतको नहीं करता, वह मूढ़-बुद्धि है। सधवा स्त्री यदि इसे करती है तो उसका पतिसे वियोग नहीं होता और विधवा स्त्रीको भी भविष्यमें वैधव्य न प्राप्त हो, इसलिये उसे यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके अनुष्ठानसे धन, आयु, रूप, सौभाग्य आदिको प्राप्ति होती है। सभी स्त्री-पुरुष इस व्रतको कर सकते हैं। सोलह वर्षांतक इस बृहत्तपोव्रतका भक्तिपूर्वक अनुष्ठान कर व्रती सुर्यमण्डलका भेदन कर शिवजीके चरणोंको प्राप्त करता है। (अध्याय १२)