सूतजी बोले-ब्राह्मणो! देवमन्दिर, तडाग आदिके निर्माण करने में सबसे पहले प्रमाणानुसार गृहीत की गयी भूमिका संशोधन कर दस हाथ अथवा पाँच हाथके प्रमाणमें बैलोंसे उसे जुतवाना चाहिये। देवमन्दिरके लिये गृहीत भूमिको सफेद बैलोंसे तथा कूप, बगीचे आदिके लिये काले बैलोंसे जुतवाये। यदि वह भूमि ग्रह-यागके लिये हो तो उसे जुतवानेकी आवश्यकता नहीं, मात्र उसे स्वच्छ कर लेना चाहिये। उस पूर्वोक्त स्थानको तीन दिन जुतवाना चाहिये। फिर उसमें पाँच प्रकारके धान्य बोने चाहिये। देवपक्षमें तथा उद्यानके लिये सात प्रकारके धान्य वपन करने चाहिये मूंग, उड़द, धान, तिल तथा साँचा-ये पाँच व्रीहिगण हैं। मसूर और मटर या चना मिलानेसे सात व्रीहिगण होते हैं। (यदि ये बोज तीन, पाँच या सात रातोंमें अङ्कुरित हो जाते हैं तो उनके फल इस प्रकार जानने चाहिये-तीन रातवालो भूमि उत्तम, पाँच रातवाली भूमि मध्यम तथा सात रातवाली भूमि कनिष्ठ है। कनिष्ठ भूमिको सर्वथा त्याग देना चाहिये।) चैत, लाल, पीली और काली-इन चार वर्णोवाली पृथ्वी क्रमशः ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये प्रशंसित मानी गयी है। प्रासाद आदिके निर्माणमें पहले भूमिको परीक्षा कर लेनी चाहिये। उसकी एक विधि इस प्रकार है-
अरत्रिमात्र (लगभग एक हाथ लम्बा) बिल्यकालको बारह अंगुलके गमे, गाइकर उसके भूमिले ऊपरवालेभागमे चारों ओर चार लकड़ियाँ लगाकर उन्हें ऊनसे लपेटकर तेलसे भिगो ले। इन्हें चार बत्तियोंके रूपमें दीपककी भाँति प्रज्वलित करे। पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बत्ती जलती रहे तो शुभ तथा दक्षिण एवं उत्तरकी ओरकी जलती रहे तो अशुभ माना गया है। यदि चारों बत्तियाँ बुझ जायें या मन्द हो जाये तो विपत्तिकारक है। इस प्रकार सम्यक्-रूपसे भूमिकी परीक्षा कर उस भूमिको सूत्रसे आवेष्टित तथा कीलितकर वास्तुका पूजन करे। तदनन्तर वास्तुबलि देकर भूमि खोदनेवाले खनित्रकी भी पूजा करे। वास्तुके मध्यमें एक हाथके पैमानेमें भूमिको घी, मधु, स्वर्णमिश्रित जल तथा रत्नमिश्रित जलसे ईशानाभिमुख होकर लीप दे, फिर खोदते समय 'आ ब्रह्मन्0 मन्त्रका उच्चारण करे। जो वास्तुदेवताका बिना पूजन किये प्रासाद, तडाग आदिका निर्माण करता है, यमराज उसका आधा पुण्य ना कर देते हैं। अतः प्रासाद, आराम, उद्यान, महाकूप, गृहनिर्माणमें पहले वास्तुदेवताका विधिपूर्वक पूजा करना चाहिये। जहाँ स्तम्भकी आवश्यकता हो वहाँ साल, खैर, पलास, केसर, बेल तथा बकुल-इन वृक्षोंसे निर्मित यूप कलियुगमें प्रशस्त माने गये हैं। यदि वापी, कृप आदिका विधिहीन खनन एवं आम्र आदि वृक्षोंका विधिहीन रोपण करे तो उसे कुछ भी फल प्राप्त नहीं होता, अपितु केवल अधोगति ही मिलती है। नदीके किनारे, शाशान तथा अपने घरसे दक्षिणको और तुलसीवृक्षका रोषण न करे अन्यथा यम यातना भोगनी पड़ती
१-भूमि-परीक्षा, वास्तु-विधान तथा प्रासाद आदिको प्रतिष्ठा आदिपर विस्तृत विचार समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, बृहत्संहिता, शिल्पान, गृहरजभूषण आदि ग्रन्थों में हुआ है। मत्स्य, अग्नि तथा विष्णुधर्मोत्तरमुराणमें भी इसका दर्जा आया है। इस विद्याका संकित उल्लेख ऋग्वेद, शतपश्च बाझण, औससूत्रों एवं गनुस्मृति ३ । ८९ आदिमें भी है। वास्तुविधाके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता विश्वकर्मा और भव दानव हैं।
२-आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवस्त्रिी जायलामा राष्ट्र राजानमः शूर इपथ्योऽतिव्याधी नहारथो जायतां दोग्धी धेनुर्वोडानावानशुः सष्ति पुरन्थिर्वोषा
जिष्णू रथ सभेयो युवास्य यजम्लनस्य वीरो जायता निकामे निकामे नः पर्गयो वर्षतु फलवत्यो न औषधयः पच्यन्त योगाशेमो न: कल्पताम् ।
(यतु २२।२२)
है। विधिपूर्वक वृक्षोंका रोपण करनेसे उसके पत्र, पुष्प तथा फलके रज-रेणुओं आदिका समागम उसके पितरोंको प्रतिदिन तृप्त करता है। जो व्यक्ति छाया, फूल और फल देनेवाले वृक्षोंका रोपण करता है या मार्गमें तथा देवालयमें वृक्षोंको लगाता है, वह अपने पितरोंको बड़े- बड़े पापोंसे तारता है और रोपणकर्ता इस मनुष्य- लोकमें महती कीर्ति तथा शुभ परिणामको प्राप्त करता है और अतीत तथा अनागत पितरों को स्वर्गमें जाकर भी तारता ही रहता है। अतः द्विजगण! वृक्ष लगाना अत्यन्त शुभदायक है। जिसको पुत्र नहीं है, उसके लिये वृक्ष ही पुत्र हैं, वृक्षारोपणकतकि लौकिक पारलौकिक कर्म वृक्ष ही करते रहते हैं तथा स्वर्ग प्रदान करते हैं। यदि कोई अश्वत्थ- वृक्षका आरोपण करता है तो वहीं उसके लिये एक लाख पुत्रोंसे भी बढ़कर है। अतएव अपनी सद्गतिके लिये कम-से-कम एक या दो अथवा तीन अश्वत्थ वृक्ष लगाना ही चाहिये। हजार, लाख, करोड़ जो भी मुक्तिके साधन हैं, उनमें एक अश्वत्थ-वृक्ष लगानेको बराबरी नहीं कर सकते।
अशोक वृक्ष लगानेसे कभी शोक नहीं होता, प्लक्ष (पाकड़)-वृक्ष उत्तम स्त्री प्रदान करवाता है। ज्ञानरूपी फल भी देता है। बिल्व-वृक्ष दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है। जामुनका वृक्ष धन देता है. दूका वृक्ष कुलवृद्धि कराता है। दाडिम (अनार)- का वृक्ष स्त्री सुख प्राप्त कराता है। बकुल पाप नाशक, बंगुल (तिनिश) बल-भुद्धिपद है। धातकी (धव) स्वर्ग प्रदान करता है। वटवृक्ष मोक्षपद्र आम्रवृक्षं अभीष्ट कामनाप्रद और गुवाक (सुपारी) का वृक्ष सिद्धिप्रद है। बल्वल मधूक(महुआ) तथा अर्जुन- वृक्ष सब प्रकारका अन्न प्रदान करता है। कदम्ब-वृक्षसे विपुल लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तिंतिडी (इमली) का वृक्ष धर्मदूषक माना गया है। शमी-वृक्ष रोग-नाशक है। केसरसे शत्रुओंका विनाश होता है। श्वेत वट धनप्रदाता, पनस (कटहल)- वृक्ष मन्द बुद्धिकारक है। मर्कटी (केंवाच) एवं कदम-वृक्षके लगानेसे संततिका क्षय होता है। शीशम, अर्जुन, जयन्ती, करवीर, बेल तथा पलाश-वृक्षोंके आरोपणसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। विधिपूर्वक वृक्षका रोपण करनेसे स्वर्ग-सुख प्राप्त होता है और रोपणकर्ताके तीन जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। सौ वृक्षोंका रोपण करनेवाला ब्रह्मारूप और हजार वृक्षोंका रोपण करनेवाला विष्णुरूप बन जाता है। वृक्षके आरोपणमें वैशाख मास श्रेष्ठ एवं ज्येष्ठ अशुभ है। आषाढ़, श्रावण तथा भाद्रपद ये भी श्रेष्ठ हैं। आश्विन, कार्तिकमें वृक्ष लगानेसे विनाश या क्षय होता है। श्वेत तुलसी प्रशस्त मानी गयी है। अश्वत्थ, वटवृक्ष और श्रीवृक्षका छेदन करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मघाती कहलाता है। वृक्षच्छेदी व्यक्ति मूक और सैकड़ों व्याधियोंसे युक्त होता है। तितिडीके बीजोंको इक्षुदण्डसे पीसकर उसे जलमें मिलाकर सोंचनेसे अशोकको तथा नारियलके जल एवं शहद-जलसे सींचनेसे आम्रवृक्षकी वृद्धि होती है। अश्वत्थ- वृक्षके मूलसे दस हाथ चारों ओरका क्षेत्र पवित्र पुरुषोत्तम क्षेत्र माना गया है और उसकी छाया जहाँतक पहुँचती है तथा अश्वत्थ-वृक्षके संसर्गसे न बहनेवाला जल जहाँतक पहुँचता है, वह क्षेत्र गङ्गाके समान पवित्र माना गया है।
सूतजी पुन: बोले-विप्रथेष्ठ। तान्त्रिक पद्धतिके अनुसार सभी प्रतिष्ठादि कार्यों में शुद्ध दिन हो लेना चाहिये। वृक्षोक उद्यान में कुआँ अवश्य बनवाना चाहिये। तुलसी वनमें कोई याग नहीं करना चाहिये। तालाब, बड़े बाग तथा देवस्थानके मध्य से नहीं बनवाना चाहिये। परंतु देवस्थान में तहाग बनवाना चाहिये शिवलिङ्गकी प्रतिष्ठाम अन्य देवीको स्थापना नहीं करनी चाहिये। इसमें देश-काल (और शैवागमों)-की मर्यादाके अनुसार आचरण करना चाहिये। उनके विपरीत आचरण करनेपर आयुका हास होता है। द्विजगण! तालाब, पुष्करिणी तथा उद्यान आदिका जो परिमाण बताया गया हो, यदि उससे कम पैमानेपर ये बनाये जायें तो दोष है, किंतु दस हाथके परिमाणमें हों तो कोई दोष नहीं है। यदि वे दो हजार हाथोंसे अधिक प्रमाणमें बनाये गये हों तो उनकी प्रतिष्ठा विधिपूर्वक अवश्य करनी चाहिये। (अध्याय १०-११)