भविष्य महा पुराण

आदित्य-मण्डलदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! अब मैं समस्त अशुभोंके निवारण करनेवाले श्रेयस्कर आदित्य-मण्डलके दानका वर्णन करता हूँ। जौ अथवा गोधूमके चूर्णमें गुड़ मिलाकर उसे गौके घृतमें भलीभाँति पकाकर सूर्यमण्डलके समान एक अति सुन्दर अपूप बनाये और फिर सूर्यभगवान्का पूजनकर उनके आगे रक्त चन्दनका मण्डप अंकितकर उसके ऊपर वह सूर्यमण्डलात्मक मण्डक (एक प्रकारका पिटक) रखे। ब्राह्मणको सादर आमन्त्रित कर रक्त वस्त्र तथा दक्षिणासहित वह मण्डक इस मन्त्रको पड़ते हुए ब्राहाणको प्रदान करे-

आदित्यतेजसोत्पन्न राजनं विधिनिर्मितम् ।

श्रेयसे मम विन वं प्रतिगृहेदमुत्तमम्॥

(उत्तरपर्व ४४।५)

ब्राह्मण भी उसे ग्रहणकर निम्नलिखित मन्त्र बोले-

कामदं धनद धयं पुत्रदं सुखदं तव।

आदित्यप्रीतये दत्तं प्रतिगृह्णामि मण्डलम्॥

(उत्तरपर्व ४४।६)

इस प्रकार विजयसप्तमीको मण्डकका दान करे और सामर्थ्य होनेपर सूर्यभगवान्की प्रीतिके लिये शुद्धभावसे नित्य ही मण्डक प्रदान करे। इस चिधिसे जो मण्डकका दान करता है, वह भगवान् सूर्यके अनुग्रहसे राजा होता है और स्वर्गलोकमें भगवान् सूर्यको तरह सुशोभित होता है। (अध्याय ४४)