युधिष्ठिरने कहा-भगवन् ! दिति (दैत्योंकी जननी)-ने जिस व्रतके करनेसे उनचास मरुद्दों को पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, अब मैं आपसे उस मदनद्वादशी व्रतके विषयमें सुनना चाहता हूँ।
भगवान् श्रीकृष्या बोले-महाराज ! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिसे जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आप मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्र मासके शुक्ल पक्षको द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपुर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्र के दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और गन्नेके टुकड़े रखे जायें। वह विविध प्रकारको खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करे। उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वामभागमें शक्करसमन्चित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य तथा भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करे। प्रात:काल वह घट ब्राहाणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस प्रकार उचारण करे-'जो सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित रहकर
*हरिवंश एवं अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति-ये दो कामदेवीकी पन्नियाँ कही गयी है। किंतु उसकी दूसरी पन्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यही है।
आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों।'
इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन आमलक-फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनु- सहित एवं समस्त सामग्रियों से सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्णनिर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ ब्राह्मणको समर्पित करे। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये-आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए गोदुग्धसे बनी हुई हवि और श्वेत तिलोंसे हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना तथा पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये। जो इस 'विधिके अनुसार इस मदनदादशी व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रों को प्रासकर सौभाग्य फलका उपभोग करता है।
दितिके इस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर, महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने उसे पुन: रूप- यौवनसे सम्पन्न तरुण बना दिया तथा वर माँगनेके लिये कहा। दितिने कहा-'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती है, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी और महान् आत्मबलसे सम्पन हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे कहा 'ऐसा ही होगा।'
कश्यपने पुनः उससे कहा-'वरानने। एक सौ वर्षातक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और अपने गर्भकी रक्षाके लिये प्रया करना है। वरवर्णिनि ! गर्भिणी स्त्रीको संध्या-कालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। यह घरकी सामग्री-मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खोलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर रहे, न उद्विग्रचित्त रहे, न कभी भीगे चरणोंसे शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्यों में तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और ( आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयो) सम्पूर्ण ओषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान न करे। बुरी स्त्रियोंसे बातचीत न करे, कपड़ेसे हवा न न ले। मृतवत्सा स्त्रीके साथ न बैठे, दूसरेके घर में न जाय, जल्दी-जल्दी न चले, महानदियोंको पार न करे। भयंकर और बीभत्स दृश्य न देखें अजीर्ण भोजन न करे। कठिन व्यायामादि न करे। ओषधियोंद्वारा गर्भकी रक्षा करती रहे, हृदयमें मात्सर्यभाव न रखे। जो गभिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये । इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके अपने गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आजा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहीं अन्तर्धान हो गये। तब दिति नियमोंका पालन करती हुई समय ख्यतीत करने लगी। कालान्तरमें दितिको उनचास पुत्र (मरुद्गण) प्राप्त हुए। राजन्! इस प्रकारसे जो भी नारी इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करेगी, वह पुत्र प्राप्त कर पतिके सुखको प्राप्त करेगी। (अध्याय ८६)