भविष्य महा पुराण

काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभर के विशेष पर्वों तथा तिथियोंके पुण्यप्रद कृत्य

सूतजी बोले- ब्राह्मणो! देव-कर्म या पैतृक- कर्म कालके आधारपर ही सम्पन्न होते हैं और कर्म भी नियत समयपर किये जानेपर पूर्णरूपेण फलप्रद होते हैं। समयके बिना की गयी क्रियाओंका फल तीनों कालों तथा लोकों में भी प्रास नहीं होता। अतः मैं फालके विभागोंका वर्णन करता हूँ।

यद्यपि काल अमूर्तरूपमें एक तथा भगवान् का ही अन्यतम स्वरूप है तथापि उपाधियोंके भेदसे वह दोर्म, लमु आदि अनेक रूपोंमें विभक्त है। तिथि, नक्षत्र, वार तथा रात्रिका सम्बना आदि जो कुछ है, ये सभी कारतके ही अङ्ग हैं और पक्ष, मास आदि रूपसे वर्मान्तरोंमें भी आते-जाते रहते हैं तथा वे ही सब कोक साधन हैं। समयके बिना कोई भी स्वतत्ररूपसे कर्म करने में समर्थ नहीं। धर्म या अधर्मका मुख्य द्वार काल ही है। तिथि आदि काल- -विशेषों में निषिद्ध और विहित कर्म बताये गये हैं। विहित कमौका पालन करनेवाला स्वर्ग प्राप्त करता है और विहितका त्याग कर निषिद्ध कर्म करनेसे अधोगति प्राप्त करता है। पूर्वाहव्यापिनी तिथिमें वैदिक क्रियाएँ करनी चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्ध मध्याह्वव्यापिनी तिथिमें और पार्वण-श्राद्ध अपराह-व्यापिनी तिथिमें करना चाहिये। वृद्धि श्राद्ध आदि प्रात:कालमें करने चाहिये। ब्रह्माजीने देवताओंके लिये तिथियोंके साथ पूर्वाहकाल दिया है और पितरोंको अपराह्न। पूर्वाहमें देवताओंका अर्चन करना चाहिये।

तिथियाँ तीन प्रकारकी होती हैं-खवा, दर्पा और हिंसा। लङ्कित होनेवाली खर्वा, तिथिवृद्धि दर्पा तथा तिथिहानि हिंला कही जाती है। इनमें खर्वा और दर्पा आगेकी लेनी चाहिये और हिंसा (क्षय-तिथि) पूर्वमें लेनी चाहिये। शुक्ल पक्षों परा लेनी चाहिये और कृष्ण पक्षमें पूर्वा । भगवान् सूर्य जिस तिथिको प्राप्त कर उदित होते हैं, वह तिथि स्नान-दान आदि कृत्योंमें उचित है। यदि अस्त-समयमें भगवान सूर्य दस पटीपर्यन्त रहते हैं तो वह तिथि रात दिन समझनी चाहिये।

शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्षमें खर्वा या दर्पा तिथिके अस्तपर्यन्त सूर्य रहे तो पितृकार्यमें वही तिथि ग्राहा है। दो दिनमें मध्याहकालव्यापिनी तिथि होनेपर अस्तपर्यन्त रहनेवाली प्रथम तिथि श्राद्ध आदिमें विहित है। द्वितीया तृतीयासे तथा चतुर्थी पञ्चमीसे युक्त हों तो ये तिथियाँ पुण्यप्रद मानी गयी हैं और उसके विपरीत होनेपर पुण्यका हास करती हैं। षष्ठी पञ्चमीसे एवं अष्टमी सप्तमीसे विद्ध हो तथा दशमीसे एकादशी, त्रयोदशीसे चतुर्दशी और चतुर्दशीसे अमावास्या विद्ध हो तो उनमें उपवास नहीं करना चाहिये, अन्यथा पुत्र, कलत्र और धनका ह्रास होता है। पुत्र भार्यादिसे रहित व्यक्तिका यज्ञमें अधिकार नहीं है। जिस तिथिको लेकर सूर्य उदित होते हैं, वह तिथि स्नान, अध्ययन और दानके लिये श्रेष्ठ समझनी चाहिये । कृष्णा पक्षमें जिस तिथिमें सूर्य अस्त होते हैं, वह स्नान, दान आदि कौमें पितरों के लिये उत्तम मानी जाती है।

सूतजी कहते हैं- ब्राह्मणो ! अब मैं ब्रह्माजीद्वारा बतलायी गयी श्रेष्ठ तिथियोंका वर्णन करता हूँ। आश्विन, कार्तिक, माघ और चैत्र इन महीनों में स्नान, दान और भगवान् शिव तथा विष्णुका पूजन दस गुना फलप्रद होता है। प्रतिपदा तिथिमें अग्निदेवका यजन और हवन करनेसे सभी तरह के धान्य और ईप्सित धन प्राप्त होते हैं। यदि शुक्ल पक्षमें द्वितीया तिथि बृहस्पतिवारसे युक्त हो तो उस तिथिमें विधिपूर्वक भगवान् अग्निदेवका पूजन और नक्तव्रत करनेसे इच्छित ऐश्वर्य प्राप्त होता है। मिथुन (आषाद) और कर्क (श्रावण) राशिके सूर्यमें जो द्वितीया आये, उसमें उपवास करके भगवान् विष्णुका पूजन करनेवाली स्त्री कभी विधवा नहीं होती। अशून्य-शयन द्वितीया

(श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीया तिथि)-को गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्योंसे भगवान् लक्ष्मीनारायणकी पूजा करनी चाहिये। (इस व्रतसे पति-पत्नीका परस्पर वियोग नहीं होता।) वैशाख शुक्ल पक्षको तृतीयामें गङ्गाजीमें स्नान करनेवाला सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वैशाख मासकी तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघकी तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन-तृतीया वृषराशिसे युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। विशेषरूपसे इनमें हविष्यान एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कपूरसे युक्त जलदान करनेवालेकी विद्वान् पुरुष अधिक प्रशंसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। यदि बुधवार और श्रवणसे युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनन्त फल प्राप्त में होता है। भरणी नक्षत्रयुक्त चतुर्थीमें यमदेवताकी उपासना करनेसे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति मिलती है। भाद्रपदकी शुक्ला चतुर्थी शिवलोकमें पूजित है। कार्तिक और माघ मासके ग्रहणोंमें स्नान, जप, तप, दान, उपवास और श्राद्ध करनेसे अनन्त फल में मिलता है। चतुर्थीमें सम्पूर्ण विनोंके नाश तथा इच्छापूर्तिके लिये भगवान् गणेशकी पूजा मोदक आदिसे भक्तिपूर्वक करनी चाहिये।

श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी पशमीमें द्वार-देशके दोनों ओर गोमयसे नागोंको रचना कर दूध, दही, सिन्दूर, चन्दन, गङ्गाजल एवं सुगन्धित द्रव्योंसे नागोंका पूजन करना चाहिये। नागोंका पूजन करनेवालोंके कुलमें निर्भयता रहती है एवं प्राणों की रक्षा भी होती हैं। श्रावण कृष्ण पञ्चमीको घरके आँगनमें नीमके पत्तोंसे मनसादेवीकी पूजा करनेसे कभी सर्पभय नहीं होता। भाद्रपदकी षष्ठीमें स्नान, दान आदि करनेसे अनन्त पुण्य होता है। विप्रगणो! माष और कार्तिककी षाडीमें व्रत करनेसे इहलोक और परलोकमें असीम कीर्ति प्राप्त होती है। शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें यदि संक्रान्ति पड़े तो उसका नाम महाजया या सूर्यप्रिया होती है। भाद्रपदकी सप्तमी अपराजिता है। शुक्ल या कृष्ण पक्षकी षष्ठी या सप्तमी रविवारसे युक्त हो तो वह ललिता नामकी तिथि पुत्र-पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाली और महान् पुण्यदायिनी है

आश्विन एवं कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अष्टादशभुजाका पूजन करना चाहिये। आषाढ़ और श्रावण मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी में चण्डिकादेवीका प्रात:काल स्नान करके अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजन कर रात्रिमें अभिषेक करना चाहिये। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें अशोक-पुष्पसे मृण्मयी भगवती देवीका अर्चन करनेसे सम्पूर्ण शोक निवृत्त हो जाते हैं। श्रावण मासमें अथवा सिंह-संक्रान्तिमें रोहिणीयुक्त अष्टमी हो तो उसकी अत्यन्त प्रशंसा को गयी है। प्रतिमासको नवमीमें देवीकी पूजा करनी चाहिये। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षको दशमीको शुद्ध आहारपूर्वक रहनेवाले ब्रह्मलोकमें जाते हैं। ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षको दशमी गङ्गादशहरा कहलाती है। आश्विनको दशमी विजया और कार्तिककी दशमी महापुण्या कहलाती है।

एकादशीव्रत करनेसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रतमें दशमीको जितेन्द्रिय होकर एक ही चार भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन एकादशीमें उपवास कर द्वादशीमें पारणा करनी चाहिये। द्वादशी तिथि द्वादश पापोंका हरण करती है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें अनेक पुष्पादि सामगियोंसे कामदेवकी पूजा करे। इसे अनङ्ग त्रयोदशी कहा जाता है। चैत्र मासके कृष्ण

पक्षकी अष्टमी शनिवार या शतभिषा नक्षत्रसे युक्त हो तो गङ्गामें स्नान करनेसे सैकड़ों सूर्यग्रहणका फल प्राप्त होता है। इसी मासके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी यदि शनिवार या शतभिषासे युक्त हो तो वह महावारुणी-पर्व कहलाता है। इसमें किया गया स्नान, दान एवं श्राद्ध अक्षय होता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षको चतुर्दशी दम्भभंजिनी कही जाती है। इस दिन धतूरेकी जड़में कामदेवका अर्चन करना चाहिये, इससे उत्तम स्थान प्राप्त होता है। अनन्त चतुर्दशीका व्रत सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। इसे भक्तिपूर्वक करनेसे मनुष्य अनन्त सुख प्राप्त करता है। प्रेत चतुर्दशी (यम-चतुर्दशी) को तपस्वी ब्राहाणोंको भोजन और दान देनेसे मनुष्य यमलोकमें नहीं जाता। फाल्गुन मासके कृष्ण पक्षको चतुर्दशी शिवरात्रिके नामसे प्रसिद्ध है और वह सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाली है। इस दिन चारों पहरोंमें स्नान करके भक्तिपूर्वक शिवजीकी आराधना करनी चाहिये। चैत्रमासकी पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र तथा गुरुवारसे युक्त हो तो वह महाचैत्री कही जाती है। वह अनन्त पुण्य प्रदान करनेवाली है। इसी प्रकार विशाखादि नक्षत्रसे युक्त वैशाखी, महाज्येष्ठी आदि बारह पूर्णिमाएँ होती हैं। इनमें किये गये स्नान, दान, जप, नियम आदि सत्कर्म अक्षय होते हैं और व्रतीके पितर संतृप्त होकर अक्षय विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। हरिद्वारमें महावैशाखीका पर्व विशेष पुण्य प्रदान करता है। इसी प्रकार शालग्राम-क्षेत्रमें महाचैत्री, 'पुरुषोत्तम क्षेत्रमें महाज्येष्टी, शृद्धल-क्षेत्रमें महापाढ़ी, केदारमें महाश्रावणी, बदरिकाक्षेत्रमें महाभाद्री, पुष्कर तथा कान्यकुब्जमें महाकार्तिकी, अयोध्या महामार्गशीर्षी तथा महापौषी, प्रयागमें महामाधी तथा नैमिमारण्यमें महाफाल्गुनी

पूर्णिमा विशेष फल देनेवाली है। इन पोंमें जो भी शुभाशुभ कर्म किये जाते हैं, वे अक्षय हो जाते हैं। आश्विनकी पूर्णिमा कौमुदी कही गयी है, इसमें चन्द्रोदय-कालमें विधिपूर्वक लक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये। प्रत्येक अमावास्याको तर्पण और श्राद्धकर्म अवश्य करना चाहिये। कार्तिक मासके कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें प्रदोषके समय लक्ष्मीका सविधि पूजन कर उनकी प्रीतिके लिये दीपोंको प्रज्वलित करना चाहिये एवं नदीतीर, पर्वत, गोष्ठ, श्मशान, वृक्षमूल, चौराहा, अपने घरमें और चत्वरमें दीपोंको सजाना चाहिये। (अध्याय ७-८)