भविष्य महा पुराण

महाकार्तिकी-व्रतके प्रसंगमें रानी कलिगभद्राका आख्यान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! पूर्वकालमें मध्य देशके वृषस्थल नामक स्थान में महाराज दिलीपकी कलिंगभद्रा नामकी एक सर्वगुणसम्पन्ना महारानी थीं। वह सदा ब्राह्मणोंको दान देती तथा देवार्चन करती रहती। एक समय उसने कार्तिक मासमें छ: महीनेका कृत्तिका-व्रतका संकल्प लिया। वह प्रत्येक पारणामें नित्य पूजन, दान, ब्राह्मण-भोजन, हवन आदिमें तत्पर रहती। एक बार व्रतमें जब किंचित् कालावशेष था, तब वह रात्रिमें अपने पतिके साथ विश्राम कर रही थी। उसी समय अचानक एक भयंकर सर्पने उसे डंस लिया। फलस्वरूप उसके प्राण निकल गये और वह जन्मान्तरमें बकरी बनी, परंतु व्रतके प्रभाव से उसे अपने पूर्वजन्मको स्मृति बनी हुई थी। उसने अपना वृत्तिका व्रत फिर सहमा किया। वह अपने अषसे अलग होकर उपवास करने लगी।

एक बार कार्तिक मास किसी दूसरे के खेतों जब वह चर रही थी, तब उस खेतका स्वामी उसे पकड़कर अपने घर ले आया। जातिस्पर अत्रि ऋषिने उस बकरी को देखा और यह जान लिया कि यह रानी कलिंगभद्रा है । दयाकर उन्होंने उसे बन्धनसे मुक्त करा दिया। वहाँसे छूटकर उसने बेरके पत्ते खाकर शीतल जल पिया और कृत्तिका-व्रतका पारण किया। ऋषि अत्रि उसे योगज्ञानका उपदेश देकर अपने आ श्रनको चले गये और वह योगेश्वरी अपने व्रतमें पुन: तत्पर हो गयी तथा कुछ कालके अनन्तर उसने योगबलसे अपने प्राण त्याग दिये। तदनन्तर वह गौतम ऋषिकी पन्नी अहल्याके गर्भसे उत्पन्न हुई। उस समय उसका नाम योगलक्ष्मी हुआ। गौतममुनिने महर्षि शाण्डिल्यमुनिसे योगलक्ष्मीका विवाह कर दिया। वह भी शाण्डिल्यके घरमें सरस्वती, स्वाहा, शची, अरुन्धती, गौरी, राजी, गायत्री, महालक्ष्मी तथा महासतीको भौति सुशोभित हुई। वह देवता, पितर और अतिथियोंके सत्कारमें नित्य लगी रहती। ब्राह्मणोंको भोजन कराती।

एक दिन महर्षि वहाँ आये और उन्होंने योगबलसे सारा वृत्तान्त जान लिया और पूछा-'महाभागे योगलक्ष्मि! कृत्तिकाएँ कितनी हैं?' यह सुनकर महासती योगलक्ष्मीको भी पूर्ववृत्त स्मरण हो आया और उसने कहा-'महायोगिन्! कृत्तिकाएँ छ: हैं।' यह सुनकर दयालु अत्रिमुनिने पुनः उसे मन्त्र और कृत्तिका-व्रतका उपदेश दिया, जिसके करनेसे उसने चिरकालतक संसारका सुख भोगकर मोक्ष प्राप्त कर लिया।

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! कृत्तिका-व्रतकी क्या विधि है? इसे आप बतायें।

भगवान् कहने लगे-महाराज! कार्तिकको पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्र में बृहस्पति या सोमवार होनेपर महाकार्तिकीका योग होता है। महाकार्तिकी तो बहुत वर्षों में और बड़े पुण्यसे प्राप्त होती है इसलिये साधारण कार्तिकी पूर्णिमाको भी उपवास करे। कार्तिकी पूर्णिमाको प्रात: ही दन्तधावन आदि कर नक्तव्रतका अथवा उपवासका नियम ग्रहण करे। पुष्कर, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिष, शालग्राम, कुशावर्त, मूलस्थान, सकुन्तल, गोकर्ण, अर्बुद. अमरकण्टक आदि किसी पवित्र तीर्थमें अथवा अपने घरमें ही स्नान करे। फिर देवता, ऋषि, पितर और अतिथिका पूजन कर हवन करे।

सायंकालके समय घृत और दुग्धसे पूर्ण छ: पात्रोंमें सुवर्ण, चाँदी, रत्न, नवनीत, अन्नकण तथा पिष्टसे छः कृत्तिकाओंकी मूर्ति बनाकर स्थापित करे। फिर उन्हें रक्तसूत्रसे आवेष्टित कर सिंदूर, कुंकुम, चन्दन, चमेलीके पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनका पूजन कर कृत्तिकाओंकी मूर्तियोंको ब्राह्मणको दान कर दे। दान करते समय यह मन्त्र पढ़े-

ॐ सप्तर्षिदारा हानलस्य वल्लभा

या ब्रह्मणा रक्षितयेति युक्ताः ।

तुष्टाः कुमारस्य यथार्थमातरो

ममापि सुप्रीततरा भवन्तु।।

(उत्तरपर्व १०३ । ३७)

ब्राह्मण भी मूर्ति ग्रहण करते समय इस प्रकार मन्त्रोच्चारण करे-

धर्मदाः कामदाः सन्तु इमा नक्षत्रमातरः ।

कृत्तिका दुर्गसंसारात् तारयन्त्वावयोः कुलम् ।।

(उत्तरपर्व १०३।३९)

तदनन्तर ब्राहाण सब सामग्री लेकर घर जाय और छ: कदमतक यजमान उसके पीछे चले। इस प्रकार जो पुरुष कृत्तिका-व्रत करता है, वह सूर्यके समान प्रकाशमान विमानमें बैठकर नक्षत्रलोकमें जाता है। जो स्त्री इस व्रतको करती है, वह भी अपने पतिसहित नक्षत्रलोकमें जाकर बहुत कालतक दिव्य भोगोंका उपभोग करती है। (अध्याय १०३)