महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन्! धन, सौख्य तथा समस्त मनोवाञ्ति कामनाओंको प्रदान करनेवाली किसी सप्तमीव्रतका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! उत्तरायणके व्यतीत हो जानेपर शुक्ल पक्षमें पुरुषवाची नक्षत्रमें आदित्यवारको सप्तमी-तिथि-व्रत ग्रहण करे। धान, तिल, जौ, उड़द, मूंग, गेहूँ, मधु, निन्ध भोजन, मैथुन, कांस्यपात्र में भोजन, तैलाभ्यङ्ग, अंजन और शिलापर पीसी हुई वस्तु-इन सबका षष्ठी तिथिको प्रयोग न करे । इन पदार्थोका षष्ठीके दिन परित्याग कर केवल चनाका भोग करे और देवता, मुनि तथा पितर-इन सबका तर्पण कर भगवान् सूर्यका पूजन करे। घृतयुक्त तिल और जोका हवन कर भगवान सूर्यका ध्यान करता हुआ भूमिपर शयन करे। इस विधिसे जो एक वर्षतक द्रत करता है, वह अपने सभी मनोवाजित फलको प्राश कर लेता है।