देवगुरु बृहस्पतिजी बोले-देवेन्द्र ! पूर्वकालमें दितिके पुत्र हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्षका भगवान् विष्णुने क्रमश: नृसिंह एवं वराहरूप धारणकर वध किया था।दुःखी हो दितिने गहर्षि कश्यपको आराधना की। बारह वर्ष बाद कश्यपजीने उससे कहा-'बरामने। वर मांगो। हर्षित होकर दितिने कहा- 'प्रभो ! मेरो सपनो अदिति बारह पुगे युक्त है। मेरे दो ही पुत्र थे। वे भी अदितिपुत्र देवरक्षक विष्णुके द्वारा विनष्ट कर दिये गये। इस कारण मैं बहुत दुःखी हूँ। अत: मुझे द्वादशादित्य-विनाशक पुत्र प्रदान करें।' यह भयंकर वाणी सुनकर कश्यपने कहा-'ब्रह्माने संसारमें दो मार्ग बनाये-धर्ममार्ग और अधर्ममार्ग। जिन्हें क्रमश: परमार्ग और अपरमार्ग भी कहा गया है। धर्मका पक्ष लेनेवाले मनुष्य ब्रह्माके
* कल्याणके 'भक्त चरितार' में यह कथा कुछ अन्तरसे आयी है। धन सम्पत्ति साधना और भक्तिभावना कितनों बाधक है. यह इनके चरित्रसे स्सा हो जाता है।
प्रिय है और अधर्मका पक्ष लेनेवाले उस धीमान्के वैरी है। अत: अधर्मक पक्षपाती होनेके कारण ही तुम्हारे पुत्रोंकी मृत्यु हुई। इसलिये धर्मप्रिये। तुम अपने विचारको शुद्ध करो। तुम्हें महाबलशाली, चिरञ्जीवी, बुद्धिमान पुत्र होगा।' यह सुनकर दितिदेवी कश्यपके द्वारा उत्तम गर्भ धारण कर व्रत-आचारपूर्वक जीवन-यापन करने लगी। उसके गर्भ धारण करनेके कारण भयभीत देवराज इन्द्र देवगुरुकी आज्ञासे दितिकी व्रत-परिचर्या में लग गये। गर्भके सात मास बीत जानेपर शक्रकी मायासे विमोहित वह दितिदेवी अपने घरमें अपवित्ररूपसे सो गयी। उसी समय अङ्गुष्ठमात्रका रूप बनाकर वज्रके साथ भगवान् महेन्द्रने दितिके उदर में प्रविष्ट हो उस गर्भके पहले सात और फिर एक-एकके सात-सात खण्ड-खण्ड कर डाले। महेन्द्रने उन लोगोंको नम्रीभूत देखकर उनके साथ गर्भसे बाहर आकर दितिको प्रणाम किया। दितिने प्रसन्न होकर महेन्द्रको उन देवताओंको दे दिया। इस प्रकार ने उनचास मरुद्रण शक्रके सेवक हो गये।
वे मरुत् पूर्व भवमें लोकविश्रुत अनिल नामक वेदज्ञ ब्राह्मण हुए।
उस विप्रने पावकको स्तुतियोंद्वारा संतुष्ट किया। वह अपने सिरको काट-काटकर अग्निको चढ़ाता था और पुन: उसका सिर उत्पन्न हो जाता था। इस प्रकार आराधना करनेपर धनञ्जयदेव प्रसन्न हुए और बोले कि तुम उनचास मरुद्रणोंके रूपमें हो जाओगे, तब मैं तुम्हारा मित्र होकर तुम्हारी कामनाको पूर्ण करूँगा। जैसे भगवान् कुबेर छब्बीस वरुणदेवोंके प्रिय हैं, वैसे उनचास रूपधारो तुम्हारा मैं मित्र होऊँगा। इस प्रकार दितिके उदरमें पावकके प्रिय मित्रके रूपमें वायु नामसे उत्पन्न हुए।
सूतजीने कहा- मुने ! देवगुरु बृहस्पतिसे इतनी कथा सुनने के बाद वही वायु वैश्यजातीय धान्यपालके घरमें मूलगण्डान्तमें उत्पन्न हुआ। पिता और माताने काशीके विन्ध्यवनमें उसे छोड़ दिया। वहाँपर एक नि:संतान अलिक नामका वस्त्रनिर्माता (जुलाहा) व्यक्ति आया और उस बालकको लेकर अपने घर आ गया। वह सुन्दर मुखवाला बालक 'कबीर' नामसे प्रसिद्ध हुआ। गोदुग्ध-पान करनेवाले उस बालकने सात वर्षकी अवस्थामें रामानन्दको गुरु माना और वह भगवान् श्रीरामके ध्यानमें परायण हो गया। वह अपने हाथसे भोजन निर्माणकर भगवान् विष्णुको समर्पित करता था। उसका प्रिय करनेके लिये भगवान् साक्षात् उसकी इच्छाएँ पूरी करने लगे।
देवगुरु बृहस्पतिजी बोले- देवेन्द्र ! प्राचीन कालमें उत्तानपाद नामके एक क्षत्रिय राजा थे। उनका पुत्र ध्रुव नामसे विख्यात हुआ। पिता-माताले परित्यक्त उस पाँच वर्षके बालक ध्रुवने देवर्षि नारदजीके उपदेशसे गोवर्धन पर्वतपर आकर महान् व्रत धारणकर छः महीनेतक भगवान्का ध्यान किया। भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर आकाशमण्डलों उसे नभोमय स्थान दिया।
यह ध्रुव पूर्व भवमें माधव नामक एक ब्राह्मण था, साठ वर्षातक उसने प्रातःकाल लीमें स्नान किया था। तीर्थ सेवनके पुण्य प्रतापसे वह भगवान् माधवका प्रिय पात्र बन गया। वह माधव भगवान्की भक्ति एवं तपस्याके फलसे अगले जन्ममें सुनीतिके गर्भसे वरूपमें उत्पन्न हुआ। छत्तीस वर्षतक राज्यकर ध्रुव नभोमण्डलमें स्थित हो गया।
मृतजीने कहा-मुने ! बृहस्पतिकी बात सुनकर पाँचवाँ चसु वह ध्रुव अपने अंशसे गुजरात प्रान्तमें भत्त, नाथी (नरसी मेहता) के रूपमें उत्पन्न हुआ। भगवान् शंकरके अनुग्रह से इन्होंने वृन्दावन में भगवान् को दिव्य रामलीलागोका दर्शन किया था। इनके पुत्री पुत्रके विवाधक समय तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण
यादवोंके साथ आये और उनकी इच्छाओंको पूरा किया। परम वैष्णव भक्तराट् नरश्री काशीपुरीमें आकर रामानन्दके शिष्य हो गये।
बृहस्पतिजी बोले-देवेन्द्र ! किसी समय गङ्गाके तटपर पतिव्रता अनसूयाके साथ भगवान् अत्रि आकर ध्यानमें समाधिस्थ हो गये। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशने आकर कहा-'वर माँगो।' अत्रिमुनि परमात्माके ध्यानमें लीन थे। अत: कुछ भी नहीं बोले। वे तीनों उनके भावको समझकर उनकी पत्नी अनसूयादेवीके पास गये। पतिव्रताने देवोंके अन्यथा भावको समझकर पुत्ररूप होनेका शाप दे दिया। फलतः अत्रिके पुत्ररूपमें ब्रह्मा चन्द्रमा, शंकर दुर्वासा और विष्णु दत्तात्रेयके रूपमें बालक हो गये। बादमें ये ही क्रमशः अर्थात् चन्द्रमा सोम नामक छठे वसु, रुद्रांश दुर्वासा सात प्रत्यूष नामक वसु और विष्णु-अंश दत्तात्रेय प्रभास नामक आठवें वसु हुए।
सूतजीने कहा-मुने ! बृहस्पतिकी यह बात सुनकर वे तीनों वसु कलिकी शुद्धिके लिये अपने अंशसे पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। छठे वसु अर्थात् भगवान् अत्रिपुत्र सोम दक्षिण में वैश्यवंशमें राजा सुदेवके घर पीपा नामक पुत्र हुए। जैसे राजाने उस नगरमें राज्य किया था, वैसे ही इन्होंने भी राज्य किया और वे रामानन्दके शिष्य हो द्वारकामें चले आये। भगवान् कृष्णद्वारा प्रेततत्त्वविनाशिनी स्वर्णमग्री हरिकी मुद्राको प्राप्तकर उसे उसने वैष्णवोंको प्रदान कर दिया। अत्रिपुत्र रुद्रके अंश सप्तम वसु अर्थात् प्रत्यूष पाञ्चाल देशमें वैश्यजातिमें मार्गपालके पुत्र हो नानक नामसे प्रसिद्ध हुए। रामानन्दके पास आकर नानक उनके शिष्य हो गये। उन्होंने म्लेच्छोंको वशमें करके सूक्ष्ममार्ग दिखाया अष्टम वसु प्रभास शान्तिपुरमें ब्राह्मणजातिमें उत्पन्न हुए। वे शुक्लदत्तके पुत्र नित्यानन्दके नामसे प्रसिद्ध हुए। शौनक ! इस प्रकार मैंने आपको वसुदेवताओंका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय १७)