कश्यपजी बोले-गौतम! यदि यह ज्ञात हो जाय कि सपने अपने यमदूती नामक दाढ़से काटा है तो उसकी चिकित्सा न करे। उस व्यक्तिको मरा हुआ ही समझो । दिनमें और रातमें दूसरा और सोलहवाँ प्रहरार्थ साँपोसे सम्बन्धित नागोदय नामक बेला कही गयी है। उसमें साँप काटे तो कालके द्वारा काटा गया समझना चाहिये और उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। पानी में बाल डुलोनेपर और उसे जलानेपर बालके अग्रभागसे जितना जल गिरता है, उतनी ही मात्रामें विष सर्प
प्रविष्ट कराता है। वह विष सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। जितनी देरमें हाथ पसारना और समेटना होता है, उतने ही सूक्ष्म समयमें काटनेके बाद विष मस्तकमें पहुंच जाता है। हवासे आगकी लपट फैलनेके समान रक्तमें पहुँचमेपर विषको बहुत वृद्धि हो जाती है। जैसे जलमें तेलकी बूंद फैल जाती है, वैसे ही त्वचा पहुँचकार विष दूला हो जाता है। रको चौगुना, पित्तों आठ गुना, कफी सोलह गुना, बातमें तीस गुणा, मज्जामें साठ गुना और प्राणामे पहुंचकर वही विष अनन्त
*गारुडोपनिषद् एवं तार्क्ष्योपनिषद्में यमदूतौके नामसे भी मन्त्र पड़े गये हैं, यहाँ मध्यम नियमका वर्णन है। वैसे भगवत्कृपासे कुछ भी असाध्य नहीं हैं।
गुना हो जाता है। इस प्रकार सारे शरीरमें विषके व्याप्त हो जाने तथा श्रवणशक्ति बंद हो जानेपर वह जीव श्वास नहीं ले पाता और उसका प्राणान्त हो जाता है। यह शरीर पृथ्वी आदि पञ्चभूतोंसे बना है, मृत्युके बाद भूत-पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं और अपने-अपने में लीन हो जाते हैं। अतः विषकी चिकित्सा बहुत शीघ्र करनी चाहिये, विलम्ब होनेसे रोग असाध्य हो जाता है। सर्पादि जीवोंका विष जिस प्रकार प्राण हरण करनेवाला होता है, वैसे ही शंखिया आदि विष भी प्राणको हरण करनेवाले होते हैं।
विषके पहले वेगमें रोमाञ्च तथा दूसरे वेगमें पसीना आता है। तीसरे वेगमें शरीर काँपता है तथा चौथेमें श्रवणशक्ति अवरुद्ध होने लगती है, पाँचवेंमें हिचकी आने लगती है और छठेमें ग्रीवा लटक जाती है तथा सातवें वेगमें प्राण निकल जाते हैं। इन सात वेगोंमें शरीरके सातों धातुओंमें विष व्याप्त हो जाता है। इन धातुओं में पहुंचे हुए विषका अलग-अलग लक्षण तथा उपचार इस प्रकार है-
आँखोंके आगे अंधेरा छा जाय और शरीरमें बार-बार जलन होने लगे तो यह जानना चाहिये कि विष त्वचामें है। इस अवस्थामें आककी जड़, अपामार्ग, तगर और प्रियंगु-इनको जलमें घोटकर पिलानेसे विषकी बाधा शान्त हो सकती है। त्वचासे रक्त में विष पहुँचनेपर शरीरमें दाह और मूळ होने लगती है। शीतल पदार्थ अच्छा लगता है। उशीर (खस), चन्दन, कूट, तगर, नीलोत्पल, सिंदुवारकी जड़, धतूरेकी जड़, हींग और गिरच-इनको पीसकर देना चाहिये। इससे बाधा शान्त न हो तो भटकटैया, इन्द्रायणकी जड़ और सर्पगन्धाको घोमें पीसकर देना चाहिये। यदि इससे भी शान्त न हो तो सिंदुवार और
हींगका नस्य देना चाहिये और पिलाना चाहिये। इसीका अञ्जन और लेप भी करना चाहिये, इससे रक्तमें प्राप्त विषकी बाधा शान्त हो जाती है।
रक्तसे पित्तमें विष पहुँच जानेपर पुरुष उठ- उठकर गिरने लगता है, शरीर पीला हो जाता है, सभी दिशाएँ पीले वर्णकी दिखायी देती हैं, शरीरमें दाह और प्रबल मूर्छा होने लगती है। इस अवस्थामें पीपल, शहद, महुआ, बी, तुम्बेकी जड़, इन्द्रायणको जड़-इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य, लेपन तथा अञ्जन करनेसे विषका वेग हट जाता है।
पित्तसे विषके कफमें प्रवेश कर जानेपर शरीर जकड़ जाता है। श्वास भलीभाँति नहीं आती, कस्टमें घर्घर शब्द होने लगता है और मुखसे लार गिरने लगती है। यह लक्षण देखकर पीपल, मिरच, सोंठ, श्लेष्मातक (बहुवार वृक्ष), लोध एवं मधुसारको समान भाग करके गोमूत्रमें घीसकर लेपन और अञ्जन लगाना चाहिये और उसे पिलाना भी चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग शान्त हो जाता है।
कफसे वातमें विष प्रवेश करने पर पेट फूल जाता है, कोई भी पदार्थ दिखायी नहीं पड़ता, दृष्टि भंग हो जाता है। ऐसा लक्षण होनेपर शोणा (सोनागाछ)-की जड़, प्रियाल, गजपीपल, भारंगी, वचा, पीपल, देवदारु, महुआ, मधुसार, सिंदुवार और हींग-इन सबको पीसकर गोली बना ले और रोगीको खिलाये एवं अञ्जन तथा लेपन करे। यह ओषधि सभी विषोंका हरण करती है।
वातसे मज्जामें विष पहुँच जानेपर दृष्टि नष्ट हो जाती है, सभी अङ्ग बेसुध हो शिथिल हो जाते हैं, ऐसा लक्षण होनेपर घी, शहद, शर्करायुक्त खस और चन्दनको घोटकर पिलाना चाहिये और नस्य आदि भी देना चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग हर जाता।
मज्जासे मार्गस्थानाम सिप पहुँच जानेपर सभी इन्द्रियाँ निश्चेष्ट हो जाती हैं और वह जमीनपर गिर जाता है। काटनेसे रक्त नहीं निकलता, केशके उखाड़नेपर भी कष्ट नहीं होता, उसे मृत्युके ही अधीन समझना चाहिये। ऐसे लक्षणोंसे युक्त रोगीको साधारण वैद्य चिकित्सा नहीं कर सकते। जिनके पास सिद्ध मन्त्र और ओषधि होगी वे ही ऐसे रोगियोंके रोगको हटाने में समर्थ होते हैं। इसके लिये साक्षात् रुद्रने एक ओषधि कही है। मोरका पित्त तथा मार्जारका पिच और गन्धनाडीको जड़, कुंकुम, तगर, कूट, कासमर्दकी छाल तथा उत्पल, कुमुद और कमल-इन तीनोंके केसर- सभीका समान भाग लेकर उसे गोमूत्रमें पीसकर नस्य दे, अञ्जन लगाये। ऐसा करनेसे कालसर्पसे डंसा हुआ भी व्यक्ति शीघ्र विषरहित हो जाता है यह मृतसंजीवनी ओषधि है अर्थात् मरेको भी जिला देती है। (अध्याय ३५)
Summary of chapter 25 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Brahma Parva is brought to its close with the phala-śruti. The merit of hearing, reading, preserving, or having this Parva recited is declared in full. The vast scope of the Brahma Parva — its saṃskāra teachings, the comprehensive Saptamī-Sūrya vrata cycle, the Sāmba-Sūrya temple narrative, the Sauradharma, and the Bhīṣma-Vyāsa discourse — is gathered and its eternal spiritual value affirmed. The Purāṇa declares itself: *"This is the supreme Purāṇa for svasti, for the growth of wisdom, for fame, and for the highest liberation."* ---