भगवान् आदित्यने कहा-अरुण! रात्रि में श्राद्ध नहीं करना चाहिये। रात्रि में किया गया त्राद्ध राक्षसी श्राद्ध कहा जाता है। दोनों संध्याओंमें और सूर्यके अस्त होनेपर भी बाद्ध करना निषिद्ध है।
अरुणने पूछा-भगवन्! माताका श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिये और माता किन्हें माना गया है? मादीमुख पितरोका पूजन किस प्रकार करना चाहिये, इन्हें मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् आदित्यने कहा-खगशार्दूल ! मैं मातृ- श्राद्धकी विधि बतला रहा है, उसे सुनिये। मातृ-श्राद्धमें पूर्वाह्न कालमें आठ विद्वान् ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये तथा एक और अन्य नवम सर्वदेवत्य ब्राहाणको भी भोजन देना चाहिये। इस प्रकार जो ब्राहाणोंको भोजन कराना चाहिये। यव, तिल, दधि, गन्ध-पुष्पादिसे युक्त अर्घ्यद्वारा सबकी पूजा करनी चाहिये तथा सभी ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको मधुर मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये। भोजनमें कटु पदार्थ नहीं होने चाहिये। इस प्रकार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पिण्डदान देना चाहिये। दही-अक्षतका पिण्ड बनाये। एक चौरस मण्डप बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करे। सव्य होकर हाथसे पूर्वाग्र कुशों तथा पुष्पोंको चढ़ाना चाहिये। माता, प्रमाता, वृद्धप्रमाता, पितामही, प्रपितामही, वृद्धप्रपितामही तथा अन्य अपने कुलमें जो भी माताएँ हों, उन्हें आदरपूर्वक निमन्त्रित करना चाहिये। इस प्रकार माताओंको उद्दिष्ट कर छः पिण्ड बनाकर पूजन करना चाहिये। नान्दीमुखको उद्दिष्ट कर पाँच उत्तम ब्राह्मणोंको पाँच पितरोंके रूपमें भोजन कराना चाहिये। नान्दीमुख-श्राद्ध में ब्राह्मणोंको विधिवत् भोजन कराकर उनकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये।
खगपते! श्राद्धमें दौहित्र अर्थात् नाती, कुतुप वेला (एक बजे दिनका समय) और तिल-ये तीन पवित्र माने गये हैं तथा तीन प्रशंसायोग्य कहे गये हैं-शुद्धि, अक्रोध और शीघ्रता न करना। एक वस्त्र धारण कर देव-पूजन और पितरोंके कर्म नहीं करने चाहिये। बिना उत्तरीय वस्त्र धारण किये पितर, देवता और मनुष्योंका पूजन, अर्चन तथा भोजन आदि सब कार्य निफल होता है।(अध्याय १८५)