राजा युधिष्ठिरने कहा- भगवन् ! आप इस प्रकारके दानकी विधिका वर्णन करें. जिसे करनेसे सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाय एवं सभी पापोंका नाश हो जाय और सभी मनोरथ सिद्ध हो जायँ तथा व्यक्ति शुद्ध हो जाय ।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! सभी दानोंमें लवणधेनुका दान उत्तम है। इससे ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुयत्रीगमन, विश्वासघात, कूरता आदि अनेक प्रकारके पापोंका आचरण करनेवाला व्यक्ति मुक्त हो जाता है। वह धन, धान्य, पुत्र, पौत्र एवं सुख प्राप्त कर दीर्घायु होकर इस संसारके सुखको भोगकर अन्त में शिवलोकको प्राप्त कर लेता है। अब मैं इस लवणधेनुदानको विधिको बता रहा हूँ-
भूमिको गोबरसे लीपकर उसके ऊपर कुश बिछा दे तथा उसके ऊपर मेषक चर्म बिछा दे उसपर पूर्व दिशाको ओर मुंह करके बैठे। चाहे कोई मनुष्य धनी हो या गरीब प्रापः एक आड़क अर्थात् चार सेर लवण रखकर उसमें धेनुको कल्पना करनी चाहिये। सुवर्णमण्डित चन्दनकाष्ठके सींग, चाँदीके खुर, ईखके पैर, फलोंके स्तन, शकरको जिहा, चन्दनकी नासिका सीपके कान, मोतियोको आँखोंकी कल्पना कर उसके कपोलमे सपिण्ड, मुखमै जी, दोनों पाचोक तिल और मोई-इस प्रकार सप्तधान्य उस लवणधेनुके अङ्गों में स्थापित करे। इसी प्रकार ताम्रसे पीठ, गुडपिण्डसे अपान देश, कम्बलसे पूँछका, अंगूरसे चार स्तनोंका, मधुर फलों एवं मधुसे योनिदेशकी रचना करनी चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त सामग्रियों से लवणधेनुकी रचनाकर सेरभर नमकके मानसे उसके वत्सकी कल्पना करे। धेनु तथा बछड़ेको वस्त्र आभूषण आदिसे अलंकृत करे। तदनन्तर स्वयं स्नान कर देवताओं और ब्राह्मणकी पूजा करे स्त्री-पुत्रके साथ गायकी पूजा एवं प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करें-
लवणे व रसाः सर्वे नवणे सर्वदेवताः।
सर्वदेवमये देवि लवणाख्ये नमोऽस्तु ते ।।
(उत्तरपर्व १५५ ।)
'लवणमें सभी रस निहित हैं। सभी देवताओं निवास लवणमें रहता है, इसलिये सर्वदेवमयी लवणधेनु। आपको मेरा नमस्कार है।'
अनन्तर दक्षिणा के साथ वह धेनु ब्राह्मणको समर्पित कर दे। राजन् ! लवणधेनुका दान करनेसे सम्पूर्ण पृथ्वीको परिक्रमा और सभी यजों तथा दानोंका भी फल प्राप्त हो जाता है। इस विधिसे जो व्यक्ति रसमयी लवणधेनुका दान करता है, उसे सौभाग्य, सुख, आरोग्य सम्पत्ति या धान्यकी प्राप्ति होती है तथा वह प्रालयायत स्वामी निवास करता है। (अध्याय155)