भविष्य महा पुराण

मासिक कृष्णाष्टमी*-व्रतोंकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-पार्थ! अब आप समस्त पापों तथा भयोंके नाशक, धर्मप्रद और भगवान् शंकरके प्रीतिकारक मासिक कृष्णाष्टमी- व्रतोंके विधानका श्रवण करें। मार्गशीर्ष मासकी कृष्णाष्टमीको उपवासके नियम ग्रहणकर जितेन्द्रिय और क्रोधरहित हो गुरु के आज्ञानुसार उपवास

' यह श्रीकृष्णजन्माष्टमोसे भिन्न शियोपासनाका एक मुख्य अङ्गभूत व्रत है। इसकी महिमा तथा अनुष्ठान-विधिका वर्णन मत्स्यपुराण, अध्याय ५६, नारदपुराण, सौरपुराण १४॥ १-३६, व्रत-कल्यदुन आदिमें बहुत विस्तारसे है। विशेष जानकारी के लिये उन्हें भी देखना चाहिये। ज्योतिषग्रों और पुराणों के अनुसार अष्टमी तिथिके स्वामी शिव ही हैं। अतः अष्टमी तथा चतुर्दशीको उनकी उपासना विशेष कल्याणकारिणी होती है।

करे। मध्याह्नके अनन्तर नदी आदिमें स्नानकर गन्ध, उत्तम पुष्प, गुग्गुल, धूप, दीप, अनेक प्रकारके नैवेद्य तथा ताम्बूल आदि उपचारोंसे शिवलिङ्गका पूजनकर काले तिलोंसे हवन करे। इस मासमें शंकरजीका पूजन करे और गोमूत्र-पानकर रात्रिमें भूमिपर शयन करे, इससे अतिरात्र- यज्ञका फल प्रास होता है । पौष मासको कृष्णाष्टमीको शम्भु नामसे महेश्वरका पूजनकर घृत प्राशन करनेसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। माघ मासकी कृष्णाष्टमीको महेश्वर नामसे भगवान् शंकरका पूजनकर गोदुग्ध-प्राशन करनेसे अनेक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। फाल्गुन मासकी कृष्णाष्टमीमें महादेव नामसे उनका पूजनकर तिल भक्षण करनेसे आठ राजसूय यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। चैत्र मासकी कृष्णाष्टमीमें स्थाणु नामसे शिवका पूजनकर यवका भोजन करनेसे अश्वमेध- यज्ञका फल मिलता है। वैशाख मासकी कृष्णाष्टमी में शिव नामसे इनका पूजनकर रात्रि में कुशोदक-पान करनेसे दस पुरुषमेध यज्ञोंका फल मिलता है। ज्येष्ठ मासकी कृष्णाष्टमीमें पशुपति नामसे भगवान् शंकरका पूजनकर गोशृंगजलका पान करनेसे लाख गोदानका फल मिलता है। आषाढ़ मासको कृष्णाष्टमीमें उग्न नामसे शंकरका पूजनकर गोमय-प्राशन करनेवाला दस लाख वर्षसे भी अधिक सायतक रुद्रलोकमें निवास करता है। श्रावण मासको कृष्णाष्टमी में शर्व नामसे भगवान् शंकरको पूजाकर रात्रिमें अर्क-प्राशन करनेसे बहुत सा सुवर्ण-दान किये जानेवाले यज्ञका फल मिलता है।भाद्रपद मासकी कृष्णाष्टमीमें त्र्यम्बक नामसे इनकी पूजाकर एवं बिल्वपत्रका भक्षण करनेसे अन्न-दानका फल मिलता है। आश्विन मासकी कृष्णामीमें भव नामसे भगवान् शंकरका यजनकर तण्डुलोदकका पान करनेसे सौ पुण्डरीक यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। इसी प्रकार कार्तिक मासकी कृष्णाष्टमीमें रूद्र नामसे भगवान् शंकरकी भक्तिसे पूजाकर रात्रिमें दहीका प्राशन करनेसे अग्निष्टोम- यज्ञका फल प्राप्त होता है।

इस प्रकार बारह महीने शिवजीका पूजन कर अन्तमें शिवभक्त ब्राहाणोंको घृत, शर्करायुक्त पायस भोजन कराये तथा यथाशक्ति सुवर्ण, वस्त्र आदि उनको देकर प्रसन्न करे। काले तिलसे पूर्ण बारह कलश, छाता, जूता तथा वस्त्र आदि ब्राहाणोंको देकर दूध देनेवाली सवत्सा एक कृष्णवर्णको गौ भी महादेवजीको निवेदित करे। इस मासिक कृष्णाष्टमी व्रतको जो एक वर्षतक निरन्तर करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करता है और सौ वर्षपर्यन्त संसारके आनन्दोंका उपभोग करता है। इसी व्रतका अनुष्ठान कर इन्द्र, चन्द्र, ब्रह्मा तथा विष्णु आदि देवताओंने उत्तम- उत्तम पदों को प्राप्त किया है। जो स्त्री पुरुष इस व्रतको भक्तिपूर्वक करते हैं, वे उत्तम विमानमें बैठकर देवताओंद्वारा स्तुत होते हुए शिवलोकमें जाते हैं और भगवान् शंकरके ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो जाते हैं। वहाँ आठ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं और जो इस व्रतके माहात्म्यको सुनता है. यह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। (अध्याय ५७)