राजा युधिष्ठिरने कहा- भगवन् ! जिस व्रतके करनेसे पत्नी पतिसे वियुक्त न हो और अन्तमें शिवलोकमें निवास करे तथा जन्मान्तरमें भी विधवा न हो ऐसे व्रतका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! इसी विषयको भगवती पार्वतीजीने भगवान् शिवसे और अरुन्धतीने महर्षि वसिष्ठजोसे पूछा था। उन लोगोंने जो कहा, वही आपको सुनाता हूँ।
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षको द्वितीयाको पवित्र चरित्रवाली स्त्री रात्रि में पायस भक्षण कर शिव और पार्वतीको दण्डवत् प्रणाम करे। तृतीया तिथिमें प्रात: गूलरकी दातौनसे दन्तधावन कर स्रान करे। शालि चावला चूर्णसे शिव और पार्वतीको प्रतिमा बनाये। उन्हें एक उत्तम पात्रमें स्थापित कर विधिपूर्वक उनका पूजन करे। रात्रिमें जागरण कर शिव-पार्वतीका कीर्तन करती हुई भूमिपर शयन करे। चतुर्थीको प्रात: उठकर दक्षिणाके साथ उस प्रतिमाको आचार्यको समर्पित कर शिवभक्त ब्राह्मोको उत्तम भोजम कराकर संतुष्ट करे। ब्राह्मण दम्पतिकी भी यथाशक्ति पूजा करे।
इस प्रकार प्रतिमास व्रत एवं पूजन करना चाहिये। बारह महीनों में क्रमश: शिव-पार्वतीकी इन नार्मोसे पूजा करनी चाहिये—मार्गशीर्ष में शिव- पार्वतीके नामसे, पौषम गिरीश और पार्वती नामसे, माघमें भव और भवानी नामसे, फाल्गुनमें महादेव और उमा नामसे, चैत्रमें शंकर और ललिता नामसे, वैशाखमें स्थाणु और लोलनेत्रा नामसे, ज्येष्टमें वीरेश्वर और एकवीरा नामसे, आषाढ़में त्रिलोचन
पशुपति और शक्ति नामसे, श्रावणमें श्रीकण्ठ और सुता नामसे, भाद्रपदमें भीम और कालरात्रि नामसे, आश्विनमें शिव और दुर्गा नामसे तथा कार्तिकमें ईशान और शिवा नामसे पूजा करनी चाहिये। बारह महीनोंमें भगवान् शिव एवं पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये क्रमश:-नील कमल, कनेर, बिल्वपत्र, पलास, कुब्ज, मल्लिका, पाढर, श्वेत कमल, कदम्ब, तगर, द्रोण तथा मालती-इन पुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार मार्गशीर्षसे व्रत प्रारम्भकर कार्तिकमें व्रतका उद्यापन करना चाहिये। उद्यापनमें सुवर्ण, कमल, दो वस्त्र, ध्वजा, दीपक और विविध नैवेद्य शिवकी अर्पित कर आरती करनी चाहिये और बारह ब्राह्मणयुगलका यथाशक्ति पूजन कर सुवर्णमय शिव-पार्वतीकी मूर्ति बनवाकर उन्हें ताम्रपात्र में स्थापित कर उसी पात्रमें चौसठ मोती, चौंसठ मूंगा, चौंसठ पुखराज रखकर उस पात्रको वस्त्रसे ढककर आचार्यको समर्पित करना चाहिये। अड़तालीस जलपूर्ण कलश, छाता, जूता और सुवर्ण ब्राह्मणोंको दानमें देना चाहिये। दीन, अन्ध और कृपणको अन्न बाँटना चाहिये। किसीको भी उस दिन निराश नहीं जाने देना चाहिये। यदि इतनी शक्ति न हो तो कुछ कम करे, किंतु वित्तशाठ्य न करे। इस व्रतके करनेसे रूप, सौभाग्य, धन, आयु, पुत्र और शिवलोककी प्राप्ति होती है तथा इष्टजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। इस व्रतके करनेपर पतिव्रता स्त्री कभी भी पति-पुत्र, सौभाग्य और धनसे वियुक्त नहीं होती और शिवलोकमें निवास करती है। (अध्याय २२)