राजा युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! अब आप सभी पापोंको दूर करनेवाले अगस्त्यमुनिके चरित्र, अध्य-दानको विधि और अगस्त्योदय-कालका वर्णन कीजिये।
भंगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज ! एक बार देवश्रेष्ठ मित्र और वरुण दोनों मन्दराचलपर कठिन तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या में बाधा डालनेके लिये इन्द्रने उर्वशी अप्सराको भेजा। उसे देखकर दोनों शुम हो उचे। अपने मनके विकारको जानकर उन्होंने अपना तेज एक कुम्भमें स्थापित कर दिया। राजा निमिके शापसे उसो कुम्भसे प्रथम महर्षि बसिहका अनन्तर दिव्य तपोधन महात्मा अगस्यका प्रादुर्भाव हुआ।
अगस्त्यमुनिका विवाह लोपामुदासे हुआ। अनन्तर विनों से घिरे हुए आगत्यमान अपनी पत्नी के साथ रहकर मलयपर्वतके एक प्रदेश में वैखानस-विधिके अनुसार अत्यन्त कठोर तप करने लगे। वे बहुत कालतक तपस्या करते रहे, उसी समय बड़े ही दुराचारी और ब्राहाणोंद्वारा किये जा रहे यज्ञोंका विध्नंस करनेवाले दो दैत्य जिनका नाम इल्वल और वातापि था, वहाँ उपस्थित हुए। ये दोनों बड़े ही मायावी थे इन दोनों का प्रतिदिनका कार्य यह था कि एक भाई मेष बनकर विविध प्रकारके भोजनोंका रूप धारणा कर लेता और दूसरा भाई श्राद्ध भोजन करने हेतु ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देकर बुलाता और भोजन कराता। भोजन कर लेनेके तुरंत बाद ही इवल अपने भाईका नाम लेकर पुकारता । दैत्यकी पुकार सुनते ही उसका दूसरा भाई ब्राह्मणोंके पेटको चीरता हुआ बाहर निकल
*भद्राके शिपय ज्योतिष-धन्धों में विस्तारसे वर्णन मिलता है, विशेषकर मुहूर्त-चिन्तामणिको पीयूषधारा व्याख्यातं । पञ्चाङ्गोकी यह ध्यापक वस्तु है। यह प्रायः प्रत्येक द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, द्वादशी और अयोदशीको लगी रहती है। इसका पूरा समय प्रायः हटेका होता है। इस अध्याय में उसके रहस्यको ठोकसे समझाने का प्रयत्न किया गया है और उसकी शान्तिका भी उपाय बतलाया है।
जाता था। इस प्रकार उन दोनों दैत्योंने अनेक ब्राह्मणों तथा मुनियोंको मार डाला।
एक दिनकी बात है, इल्वलने भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणों के साथ अगस्त्यमुनिको भोजनके लिये आमन्त्रित किया। भोजनके समय अगस्त्यमुनिने इल्वलके द्वारा बनाया गया भोजन सारा-का-सारा खा डाला, पर मुनि निर्विकार, होकर शुद्ध हो गये थे। इल्वलने पूर्वरीतिसे अपने भाई वातापिको पुकारकर कहा-'भाई! अब क्यों विलम्ब कर रहे हो, मुनिके शरीरको चीरकर बाहर आ जाओ।' इसपर अगस्त्यमुनिने कहा-'अरे दुष्ट दैत्य ! तुम्हारा भाई वातापि तो उदरमें ही भस्म होकर समाप्त हो गया, अब वह बाहर कहाँसे आयेगा। यह सुनकर इल्वल बहुत ही क्रुद्ध हो उठा, परंतु अगस्त्यमुनिने उसको भी अपनी क्रुद्ध दृष्टि से जलाकर भस्म कर डाला। उन दोनों दैत्योंके मारे जानेघर शेष दैत्य भी मुनिके वैरको स्मरण करते हुए भयभीत होकर समुद्र में जाकर छिप गये। वे रात्रिके समय समुद्रसे बाहर निकलकर मुनियोंका भक्षण करते, यज्ञपात्र फोड़, डालते और पुनः समुद्र में जाकर छिप जाते। दैत्योंके इस प्रकारके उत्पातको देखकर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि सभी देवता आपसमें विचारकर महर्षि अगस्त्यजीके पास आकर बोले-'ब्रह्मर्षे ! आप समुद्रके जलको सोख लीजिये।' यह सुनकर अगस्त्यजीने अपने आग्रेयी धारणाका अवधान कर समुद्र के जलका पान कर लिया। समुद्रके सूख जाने पर देवताओंने उन सभी दैत्योंका संहार कर डाला।
इस प्रकार महषि अगस्त्यने इस संसारको निष्कण्टक कर दिया। उसके बाद गङ्गाजीके जलसे समुद्र पुनः भर गया। तब देवता और दैत्योंने मिलकर मन्दराचल पर्वतको मथानी तथा नागराज वासुकिको रस्सी बनाकर समुद्रका मन्थन किया। उस समय समुद्रसे चन्द्रमा, लक्ष्मी, अमृत, कौस्तुभमणि, ऐरावत हाथी आदि उत्तम-उत्तम रत्न निकले। समुद्रसे ही अति भयंकर कालकूट विष भी निकला, जिसके गन्धमात्रसे ही देवता और दैत्य सभी मूछित होने लगे। इस कालकूट विषका कुछ भाग भगवान् शंकरने पान कर लिया। जिससे वे नीलकण्ठ कहलाये, तब ब्रह्माजीने कहा कि 'भगवान् शंकरके अतिरिक्त संसारमें ऐसा किसीमें सामर्थ्य नहीं है, जो इस शेष विषका पान करे, अत: देवगणो! आप सब दक्षिण दिशामें लङ्काके समीप निवास करनेवाले अगस्त्यमुनिके पास जायँ, वे हमलोगोंके शरणदाता हैं। ब्राजीकी आज्ञा पाकर सभी देवता अगस्त्यमुनिके पास गये। मुनि श्रेष्ठ अगस्त्यने सबको भयभीत पाकर उन्हें यह आश्वासन दिया कि मैं उस विषको अपने तपोबलके प्रभावसे हिमालय पर्वतमें प्रविष्ट कर दूंगा। तब महर्षि अगस्त्यजीके तपोबलके प्रभावसे वही विष हिमालयके शिखरों, निकुञ्जों तथा वृक्षों में बिखर गया और शेष बचे हुए विषको धतूर, अर्क आदि वृक्षों में उन्होंने बाँट दिया। उसी हिमालय पर्वतके विषसे युक्त वायुके प्रभावसे प्राणियोंमें अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होते हैं, जिससे प्राणियोंको कट सहन करना पड़ता है। उस विषयुक्त वायुका प्रभाव वृषको संक्रान्तिसे लेकर सिंह-संक्रान्सितक बना रहता है। बादमें उसका वेग शान्त हो जाता है। इस प्रकार कालकूट विषके विनाशकारी प्रभावसे अगस्त्यमुनिने समस्त प्राणियोंकी रक्षा की।
पूर्वकालमें प्रजाकी बहुत वृद्धि हुई। उस समय ब्राजीने अपने शरीरसे मृत्युको उत्पन्न किया और मृत्युने प्रजाका भयंकर विनाश किया। एक दिन वह मृत्यु अगस्त्यमुनिके समीप भी आयो। अगस्त्यजीन क्रोधभरी दृष्टिसे मृत्युको तत्काल भस्म कर दिया। पुनः ब्रह्माजीको दूसरी व्याधिरूप मृत्युकी उत्पत्ति करनी पड़ी।
दण्डकारण्यमें श्वेत नामक एक राजा रहता था, स्वार्ग जानेपर भी वह प्रतिदिन क्षुधाके कारण अपने मांसको ही खाकर कष्ट भोग रहा था। एक दिन दुःखी हो राजाने अगस्त्यमुनिसे कहा- 'महाराज! सभी वस्तुओका दान तो मैंने किया है, परंतु अन्न और जलका दान मैं नहीं कर सका और न मैंने श्राद्ध ही किया। इसलिये मुझे इस रूपमें प्रतिदिन अपना ही मांस खाना पड़ रहा है प्रभो! आप दया करके कोई उपाय कीजिये, जिससे कि मुझे इस विपत्तिसे छुटकारा प्राप्त हो।' राजाद्वारा इस प्रकार दीन वचन सुनकर अगस्त्यमुनि दयार्द्र हो उठे और उन्होंने रजोंद्वारा श्राद्ध कराया। श्राद्धके फलस्वरूप सहसा वह दिव्य देह धारणकर स्वर्गलोकमें दिव्य भोग भोगने लगा।
एक बार विन्ध्याचल पर्वतके हृदय में यह प्रश्र उठा कि सूर्यनारायण मेरुपर्वतकी परिक्रमा तो करते हैं, पर मेरी नहीं करते। क्यों न मैं उनका मान रोक दूँ। मनमें यह निश्चय कर विन्ध्यगिरि प्रतिदिन बढ़ने लगा। विन्ध्याचलको बढ़ते हुए देखकर सभी देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने अगस्त्यमुनिके पास जाकर निवेदन किया-'प्रभो! आप कृपाकर सूर्यके मार्गको अवरुद्ध करनेवाले उस विन्ध्यगिरिको रोकें और उसे स्थिर कर दें।' देवताओंका विनययुक्त वचन सुनकर अगस्त्यजीने विन्ध्याचल पर्वतके पास पहुँचकर कहा-'पर्वतोत्तम ! मैं तीर्थयात्रा करने जा रहा हूँ, तुम थोड़ा नीचे हो जाओ तो उस पार चला जाऊँ।' मुनिकी आज्ञासे विम्याचल नीचा हो गया। अगस्त्यमुनिने पर्वतको लाँधकर कहा- 'जबतक मैं तीर्थयात्रासे वापस नहीं आ जाता, तबतक तुम इसी स्थिति में रहना। इतना कहकर अगस्त्यमुनि दक्षिण दिशाको चले गये और फिर वापस नहीं लौटे। आज भी आकाशमें दक्षिण दिशामें देदीप्यमान हो रहे हैं और लोपामुद्राके साथ महर्षि अगस्त्यकी यह त्रिलोकी वन्दना करता है।
एक समयकी बात है, अपनी पत्नी लोपामुद्राको इच्छापर अगस्त्यजीने कुबेरको बुलाकर आनन्दके सभी ऐश्वर्य महल, शय्या, वस्त्राभूषण आदि उन्हें उपलब्ध करा दिये और लोपामुद्राके साथ अगस्त्यज्जी बहुत समयतक आनन्दित होते रहे।
राजन् ! इस प्रकार अगस्त्यमुनिके अनेक अद्भुत दिव्य चरित्र हैं। आप भी भगवान् अगस्त्यके लिये अर्ध्य प्रदान करें, इससे आपको महान् पुण्य प्राप्त होगा। उनके अर्ध्य-दानकी विधि इस प्रकार है- जब कन्या राशि में सूर्य के सात अंश (५।२२)
शेष रहते हैं, उसी दिन महर्षि अगस्त्यका पूर्वमें उदय होता है, उसी समय उनके निमित अर्घ्य देना चाहिये। ब्रताको चाहिये कि प्रात: खेत तिर्लोसे स्नानकर श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्योंकी माला आदिसे विभूषित होकर पञ्चररसहित एक सुवर्ण कलश स्थापित करे। उसके ऊपर अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ और सप्तधान्यसहित घीका पात्र रखे। उसके ऊपर जटाधारी, हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए शिष्यों के साथ अगस्त्यमुनिको स्वर्ण-प्रतिभा बनाकर स्थापित करना चाहिये तत्पश्चात् मधेत चन्दन, चमेलीके पुष्प, उत्तम धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनकी करनेके बाद अर्घ्य देना चाहिये। खजूर, नारियल, कूष्माण्ड, खीरा, ककड़ी, कोटक, आरवेल्ल, बीजपूर (बिजौरा), बैंगन, अनार, नारंगी, केला, कुशा, काश, दूलकि अंकुर, नीलकमल तथा अंकुरित अत्र-यह सभी सामग्री एक बाँसके पात्र में रखकर सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबेका अर्घ्यपात्र ना ही सिरसे लगाकर प्रसन्न चित्तसे जानु ओंको पथ्वीपर
टेककर दक्षिणाभिमुख हो इन मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक भगवान् अगस्त्यको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये-
काशपुष्पप्रतीकाश अग्रिमारुतसम्भव।
मित्रावरुणयोः पुत्र कुम्भयोने नमोऽस्तु ते॥
विन्ध्यवृद्धिक्षयकर मैघतोयविषापह।
रत्नवल्लभ देवर्षे लङ्कावास नमोऽस्तु ते॥
वातापिर्भक्षितो येन समुद्राः शोषिताः पुरा।
लोपामुद्रापतिः श्रीमान् योऽसौ तस्मै नमो नमः ॥
येनोदितेन पापानि प्रलयं यान्ति व्याधयः ।
तस्मै नमोऽस्त्वगस्त्याय सशिष्याय सुपुत्रिणे ॥
(उत्तरपर्व ११८॥ ६९-१२)
'देवर्षे ! आपका वर्ण काश-पुष्पके समान है, आप अग्नि और मरुत्से उद्भूत हैं। मित्रावरुणके पुत्र कुम्भयोने! आपको नमस्कार है। आप वृष्टिमें अमृतका संचार करनेवाले हैं, आपने बढ़ते हुए विन्ध्यगिरिको निवृत्त किया था और आप दक्षिण दिशामें निवास करते हैं, आपको नमस्कार है। आपने वातापि राक्षसको भस्म कर दिया तथा समुद्रको सोख लिया, लोपामुद्राके पति भगवान् अगस्त्य! आपको बार-बार नमस्कार है। आपके उदय होनेपर सारी व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं, शिष्यों और पुत्रोंके साथ भगवन् ! आपको नमस्कार है।'
इस प्रकार अर्घ्य प्रदान कर वह प्रतिमा विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मणको दानमें दे दे।
किसी एक फल अथवा धान्य आदिका एक वर्षतक त्याग करे। इस विधिसे यदि ब्राह्मण सात वर्षतक अर्घ्य दे तो चारों वेदोंका ज्ञाता और सभी शास्त्रोंका मर्मज्ञ हो जाता है । क्षत्रिय समस्त पृथ्वीको जीतकर राजा बनता है। वैश्य धन-धान्य तथा पशुओं एवं समृद्धिको प्राप्त करता है तथा शूद्र धन, सम्मान, आरोग्य प्राप्त करता है और स्त्रियों को सौभाग्य, ऋद्धि वृद्धि तथा पुत्रको प्राप्ति होती है। विधवाको अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है, कन्याको श्रेष्ठ पति प्रास होता है तथा रोगी अगस्त्यमुनिको अर्घ्य देकर रोगसे छुटकारा पा जाता है। जिस देशमें भगवान् अगस्त्यका इस विधिसे पूजन होता हैं और अर्घ्य दिया जाता है, वहाँ कभी दुर्भिक्ष, अकाल आदिका भय नहीं होता। अगस्त्य-ऋषिके आख्यानको सुननेवाले सम्पूर्ण पापोंसे नुक्त हो स्वर्गलोकको प्राप्त करते हैं। (अध्याय ११८)