भविष्य महा पुराण

गजरथ-अश्वरथदान-विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! अपनी शक्तिके द्वारा प्राप्त सम्पत्तिसे राजाओंको तथा अधर्मसे डरे हुए, ग्रहपीड़ासे संतप्त एवं दुःस्वप्र आदिसे दुःखित पुरुषोंको कौन-सा दान देना चाहिये, जो ऐहिक तथा पारलौकिक कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो, ऐसे किसी विशिष्ट दानका आप वर्णन करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! ऐसे कल्याणकारी श्रेष दानको आप सुनें जो विशेषरूपसे राजाओंका हितसाधक है। शास्त्रोंमें गोदान आदि अनेक श्रेष्ठ दान बतलाये गये हैं, किंतु उनमें राजाओके लिये जो प्रधान दान है, उसे मैं

आपको बतला रहा हूँ, जिसे शुक्राचार्यने दैत्यराज बलिको बतलाया था, वह दान गजरथाश्वरथदान है। शुक्राचार्यजीने बलिसे कहा था- -'दैत्यपते! जिस गजरथाश्वरथदानसे सभी पाप, भयंकर आधि- व्याधियाँ एवं ग्रहपीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं और श्रेष्ठ पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे आप सुनें।' कार्तिककी पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, चन्द्र-सूर्य- ग्रहण, विषुवयोग और सूर्यकी संक्रान्तिमें अथवा किसी पुण्य दिनमें यह दान करना चाहिये। काष्ठका एक दिव्य रथ बनाकर उसे स्वर्णसे मण्डित करे। वह रथ सुन्दर चक्के, धुरे, नेमि, जूआ आदिसे

*मत्यपुराण अ0 में कनककल्पलता दानकी स्पष्ट विधि निर्दिष्ट है। यहाँ स्वर्णनिर्मित इन्द्वानी, आग्रेयो, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, काँचरी आदि दस दिशा-देवियाँ तथा कल्पलताओंके निर्माणकी विधि भी दी गयी है।

समन्वित हो। उसे स्वर्णध्वज तथा सफेद एवं कृष्ण पताकाओं और पुष्पमालाओंसे मण्डित करना चाहिये। ऐसा रथ बनाकर किसी शुभ दिनमें जलमय स्थान अथवा नदीके किनारे, गोशाला या घरके आँगनमें एक श्रेष्ठ वेदीपर पुराण और वेदविद्याके ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मण उसे स्थापित करे। रथके मध्य में ब्रह्माकी स्थापना करे और प्रणवद्वारा उनकी पूजा करे। उत्तरमें विष्णुको स्थापना कर पुरुषसूक्तसे उनकी पूजा करे। दक्षिणमें भगवान् रूद्रकी स्थापना कर रुद्रसूक्तद्वारा उनका पूजन करे। सूर्यादिग्रहोंकी पुष्प, गन्ध, फल, नैवेद्य, दीप, वस्त्र और मालाओंद्वारा पूजा करे। शङ्ख, भेरी और मृदंगोंके शब्द एवं ब्रह्मघोषके द्वारा महान् उत्सव कराये।

अग्निकोणमें एक हाथ प्रमाणवाला एक कुण्ड बनाकर विभिन्न वैदिक शाखाओंके अध्येता ब्राह्मणोंकी पूजा करे। चार या आठ ब्राह्मणों तथा एक आचार्यका वरण करे। तिल एवं घृतके द्वारा हवन करे। इस प्रकार द्विजोंके साथ यजमान यज्ञविधि सम्पन्न कर शुभ लक्षणोंसे समन्वित दो श्रेष्ठ हाथियोंको रथमें नियोजित करे । वे हाथी घण्टा, हेमपट्ट, सुन्दर तिलक, शङ्ख, चामरसे सुशोभित हों, दिव्य मुक्ता-मालाओंसे परिव्याप्त हों, दिव्य अंकुशसे समन्वित दो महावत भी रहें। इस प्रकार दिव्य रथ बनवाकर सभी श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण एवं माला आदिसे सत्कृत तथा धनुष- बाण, कवच आदि आयुधोंसे सुसज्जितकर ब्राह्मणको रथपर बिठलायें। अनन्तर श्वेत वस्त्रधारी यजमान रथकी परिक्रमा कर पुष्पाञ्जलि लेकर सभी पापोंका नाश करनेवाले इस मन्त्रसे प्रार्थना करे-

कुमुदैरावणौ पद्मः पुष्पदन्तोऽथ वामनः।

सुप्रतीकोऽञ्जनः सार्वभौमोऽष्टौ देवयोनयः॥

तेषां वंशप्रसूतौ तु बलरूषसमन्वितौ।

तद्युक्तरथदानेन मम स्यार्ता वरप्रदी॥

रथाऽयं यज्ञपुरुषो ब्राह्मणोऽत्र शिवः स्वयम्।

ममेभरथदानेन प्रीवेता शिषकेशवी॥

(उत्तरपर्व १८०।२९-३९)

'कुमुद, ऐरावण (ऐरावत), पा, पुष्पदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन तथा सार्वभौम-ये आठ गज देवयोनिमें उत्पन्न हैं। इनके वंशमें उत्पन्न ये दो गज अत्यन्त बलवान् और रूपवान् रथमें इनको नियोजित कर देनेसे और गजयुक्त रथका दान करनेसे ये गज मेरे लिये वर प्रदान करनेवाले हों। यह रथ यज्ञपुरुष साक्षात् विष्णुरूप है और इसपर बैठे ब्राह्मण शिवस्वरूप हैं। इसलिये इन गजोंसे युक्त रथके दान करनेसे भगवान् विष्णु तथा शंकर मुझपर प्रसन्न हों।' ऐसा कहकर उस रथपर बैठे ब्राह्मणको रथसहित पुनः प्रदक्षिणा कर वह रथ उन ब्राह्मणको दान कर दे। रथको ब्राह्मणदेवताके द्वारतक पहुँचाकर पुनः अपने घर वापस आ जाय। इस प्रकार दान-कार्यके पूर्ण होनेपर अंधे, दीन, मूक, बधिर, अनाथोंको वस्त्र और भोजन आदिसे संतुष्ट करे, गोदान करे।

राजन् ! इसी प्रकार एक दूसरा रथ बनाकर उसमें जीन, लगाम आदिसे संयुक्त दो शुभ लक्षणोंवाले घोड़ोंको अलंकृत कर जोतना चाहिये। पूर्वरीतिसे हवन आदि कार्य करने चाहिये। उस उत्तम रथपर ब्राह्मणको बिठाकर उसकी भी पूजा करनी चाहिये और रथकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक उस अश्वरथका दान करना चाहिये-

नमोऽस्तु ते वेदतुरङ्गमाय

त्रयीमयाय त्रिगुणात्मकाय।

सुदुर्गमार्गे सुखयानपात्रे

नमोऽस्तु ते वाजिधराय नित्यम् ।।

रथोऽयं सविता साक्षाद् वेदावामी तुरङ्गमाः ।

अरुणो ब्राह्मण शायं प्रयच्छन्तु सुखं मम ।।

(उत्तरपर्व १८०। ४०-४१)

'वेदरूपी अश्वोंसे युक्त, वेदत्रयीस्वरूप, त्रिगुणात्मक, कठिन-से-कठिन मागौमें सुखपूर्वक बहन कर ले जानेवाले अवरथ! आपको नित्य नमस्कार है। यह रथ साक्षात् भगवान् सूर्यका रूप है और ये घोड़े साक्षात् वेदरूप हैं तथा इसमें हुए ब्राह्मण अरुणरूप हैं। ये सभी मुझे सुख प्रदान करें।

तदनन्तर उसके साथ ब्राह्मणके घरतक जाय। इस विषिसे जो बुद्धिमान् व्यक्ति अरथका दान करता है, वह सभी पापों तथा रोगोंसे रहित होकर सौ मन्वन्तरपर्यन्त दिव्य भोगोंसे समन्वित सूर्यके समान देदीप्यमान विमानपर आरूढ़ होकर श्रीसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें निवास करता है। पुनः पुण्यक्षीण होनेपर पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रसमन्वित, चिरजीवी, अतिथिसेषक एवं धार्मिक राजा होता है। (अध्याय १८०)