अरुणने पूछा- भगवन्! आदित्यदेव ! मनुष्य किस पुण्यकर्मका सम्पादन कर स्वर्ग जाते हैं? कर्मयज्ञ, तपोयज्ञ, स्वाध्याययज्ञ, ध्यानयज्ञ और ज्ञानयज्ञ-इन पाँच यज्ञों में सर्वोत्तम यज्ञ कौन है? इन यज्ञोंका क्या फल है और इनसे कौन-सी गति प्राप्त होती है? धर्म और अधर्मके कितने भेद कहे गये हैं? उनके साधन क्या हैं और उनसे कौन-सी गति होती है। नारकी पुरुषों के पुनः पृथ्वीपर आनेपर भोगसे शेष कोंके कौन-कौनसे चिह्न उपलब्ध रहते हैं। इस धर्माधर्मसे व्याप्त भवसागर तथा गर्भमें आगमनरूपी दु:खसे कैसे मुक्ति प्राप्त होती है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् सूर्य बोले- अरुण ! स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) के फलफो देनेवाले तथा नरकरूपो सबसे पार करानेवाले पाहारी एव पुण्यपद को सुनो। धर्मके पूर्व में तथा मध्यमें और उसके अन्त में श्रद्धा आवश्यक है। श्रद्धान्निष्ठ ही धर्म प्रतिष्ठित होता है, अतः धर्म श्रद्धामूलक ही है । वेद-मन्त्रोंके अर्थ अतीव गूढतम हैं। उनमें प्रधान पुरुष परमेश्वर अधिष्ठित है, अतः इन्हें श्रद्धाके आश्वयसे ही ग्रहण किया जा सकता है। ये इस बाह्य चक्षुसे नहीं देखे जाते। श्रद्धारहित देवता भी भाँति-भौतिके शरीरको कष्ट देनेपर तथा अत्यधिक अर्थव्यय करनेपर भी धर्मक सूक्ष्मरूप वेदमय परमात्माको नहीं प्राप्त कर सकते। श्रद्धा परम सूक्ष्म धर्म है, श्रद्धा यज्ञ है, श्रद्धा हवन, श्रद्धा तप, श्रद्धा ही स्वर्ग और मोक्षा है। यह सम्पूर्ण जगत् श्रद्धामय ही है, अबद्धासे सर्वस्व जीवन देनेपर भी कुछ फल नहीं होता। बिना श्रद्धाके किया गया कार्य सफल नहीं होता। अत: मानवको श्रद्धा सम्पन होना चाहिये*।
*श्रद्धापूर्वः सदा धर्मः श्रद्धामध्यान्तसंस्थितः।
श्रद्धानिष्ठप्रतिष्ठश्च धर्मः श्रद्धा प्रकीर्तिता।।
श्रुतिमन्वरसाः सूक्ष्माः प्रधानपुरुषेश्वरः।
श्रद्धामात्रेण गृहन्ते न परेण च चक्षुपा।।
हे खगश्रेष्ठ! अब मेरे मण्डलके विषयमें सुनो। मेरा कल्याणमय मण्डल खखोल्क नामसे विख्यात है। यह तीनों देवों एवं तीनों गुणों से परे एवं सर्वज्ञ है। यह सर्वशक्तिमान् है।'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रमें यह मण्डल अवस्थित है। जैसे घोर संसार-सागर अनादि है वैसे ही खखोल्क भी अनादि और संसार-सागरका शोधक है। जैसे व्याधियोंके लिये ओषधि होती है वैसे ही यह संसार- सागरके लिये ओषधि है। मोक्ष चाहनेवालोंक लिये मुक्तिका साधन और सभी अर्थोंका साधक है। खखोल्क नामका यह मेरा मन्त्र सदा उच्चारण एवं स्मरण करने योग्य है। जिसके हृदयमें यह 'ॐ नमः खखोल्काय' मन्त्र स्थित है, उसीने सब कुछ पढ़ा है, सुना है और सब कुछ अनुष्ठित किया है-ऐसा समझना चाहिये।
मनीषियोंने इस खखोल्कको मार्तण्डके नामसे कहा है। उसके प्रति श्रद्धायुक्त होनेपर पुण्य प्राप्त होता है और अश्रद्धासे अध: पतन होता है। सूर्य- सम्बन्धी वचनको कहनेवाले गुरुकी सूर्यके समान पूजा करनी चाहिये। वह गुरु भवसागरमें निमग्न व्यक्तिका उद्धार कर देता है। सौरधर्मरूपी शीतल जलके द्वारा जो अज्ञानरूपी वहिसे संतप्त मनुष्यको शान्त करता है, उसके समान गुरु कौन होगा? जो भक्तोंको ज्ञानरूपी अमृतसे आप्लावित करतेहैं, भला उनकी कौन पूजा नहीं करेगा। स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष)-की प्रासिके लिये देवाधिदेव सूर्यक द्वारा जो वाक्य कहे गये हैं, वे अतिशय कल्याणकारी हैं। राग, द्वेष, अक्षमा, क्रोध, काम, तृष्णाका अनुसरण करनेवाले व्यक्तिका कहा हुआ वाक्य नरकका साधन होनेसे दुभाषित कहा जाता है। अविद्यात्मक संसारके क्लेश-साधक मुदुल आलापवाले संस्कृत वाक्यसे भी क्या लाभ है? जिस वाक्यके सुननेसे राग-द्वेष आदिका नाश एवं पुण्य प्राप्त होता है, वह कठोर वाक्य भी अतिशय शोभाजनक है। स्मृतियाँ, महाभारत, वेद, महान् शास्त्र यदि धर्म साधक न बन सकें तो इनका अध्ययनमात्र अपनी आयुके व्यतीत करनेके लिये ही है। सहस्रों वर्षकी आयु प्राप्त करनेपर भी शास्त्रका अन्त नहीं मिलता। अतः सभी शास्त्रोंको छोड़कर अक्षर तन्मात्र (परमात्मा)-का ज्ञान कर परलोकके अनुरूप आचरण करना चाहिये। मनुष्योंक समर्थ शरीरसे भी क्या लाभ है जो पारलौकिक पुण्य-भारको वहन करने में असमर्थ है। जो सौर-ज्ञानके माहात्म्यको उच्चारण करने में असमर्थ है, वह शक्तिसम्पन्ना और पण्डित होते हुए भी मूर्ख है। इसलिये जो सौर-ज्ञानके सद्भावकी महिमा तत्पर रहता है, वही पण्डित, समर्थ, तपस्वी और जितेन्द्रिय है। जो नृप गुरुको सम्पूर्ण पृथिवी, धन और सुवर्ण आदि देकर भी यदि अन्यायपूर्वक सौर ज्ञानको जिज्ञासा करता है अर्थात् अन्यायाचरण करते हुए पूछता है तो उसे षडक्षर-मन्त्रका उपदेश गुरुको नहीं देना चाहिये। जो भगवान् सूर्यके धर्मको न्यायपूर्वक विनम्र भावसे सुनता है और कहता है, वह उचित स्थानको प्रास करता है, अन्यथा उसके विपरीत नरकको जाता है।
जो भगवान् सूर्यके घडक्षर-मन्त्र से विधानपूर्वक गोदुग्धद्वारा सूर्यकी पूजा करता है वह मनुष्यों में श्रेष्ठ है। देवासुरोंद्वारा मन्थन करनेपर क्षीरसागरसे सभी लोकोंको मातृस्वरूपा पाँच गौएँ उत्पन्न हुई नन्दा, सुभद्रा, सुरभि, सुमना तथा शोभनापती।
कायक्लेशैर्न यहुभिर्न चैवार्थस्य राशिभिः ।
धर्मः सम्प्राप्यते सूक्ष्मः श्रद्धाहीनैः सुरैरपि ॥
असा धर्मः परः सूक्ष्मः श्रद्धा यज्ञाहुतं तपः ।
श्रद्धा मोक्षश्च स्वर्गच अशा सर्वमिदं जगत् ॥
सर्वस्व जीवितं वापि दद्यादश्रद्धया च यः ।
नाप्नुयात् स फलं किंचित् तस्माच्छ्रद्धापरो भवेत् ॥
(ब्राह्मपर्व १८७।९-१३)
गौएँ तेजमें सूर्यके समान हैं। ये सम्पूर्ण संसारका उपकार करनेके लिये एवं देवताओंकी तृप्तिके लिये और मुझे स्नान करानेके लिये उत्पन्न हुई हैं। ये मेरा ही आधार लेकर स्थित हैं। गौओंके सभी अङ्ग पवित्र हैं। उनमें छहों रस निहित हैं। गायके गोबर, मूत्र, गोरोचन, दूध, दही तथा घृत-ये छ: पदार्थ परम पवित्र हैं तथा सभी सिद्धियोंको देनेवाले हैं। सूर्यका परम प्रिय बिल्ववृक्ष गोमयसे ही उत्पन्न हुआ है, उस वृक्षपर कमलहस्ता लक्ष्मी विराजमान रहती हैं, अत: यह श्रीवृक्ष कहा जाता है। गोमयसे पङ्क उत्पन्न होता है और उससे कमल उत्पन्न हुए हैं। गोरोचन परम मङ्गलमय, पवित्र और सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। गोमूत्रसे सभी देवोंका आहार-स्वरूप विशेषकर भास्करके लिये भोग्य एवं प्रियदर्शन सुगन्धित गुग्गुल उत्पन्न हुआ है। जगत्के सभी बीज क्षीरसे उत्पन्न हुए हैं। कामनाको सिद्धिके लिये सभी माङ्गल्य वस्तु दहीसे उत्पन्न समझें । देवोंका अतिशय प्रिय अमृत तसे उत्पन्न है, अत: घी, दूध, दहीसे भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर उष्ण जल और कषायसे स्नपन कराना चाहिये। फिर शीतल जलसे स्नान कराकर गोरोचनका लेपन एवं बिल्वपत्र, कमल और नीलकमलसे पूजन करना चाहिये। शर्करायुक्त गुग्गुलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करे। दूध, दही, भात, मधुके साथ शर्करा एवं विविध भक्ष्य पदार्थोंको निवेदित करे। इसके बाद भगवान् भास्करकी प्रदक्षिणा कर उनसे क्षमा-याचना करे।
इस विधिसे जो दिनपति भगवान् भानुकी पडङ्ग-पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्तकर अपने कुलकी इक्कीस पीढ़ियोंको स्वर्गमें ले जाता है तथा उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित कर स्वयं ज्योतिष्क नामक स्थानको प्राप्त करता है। भगवान् भास्करकी पूजामें पत्र, पुष्प, फल, जल जो भी अर्पित होता है वह सब तथा सूर्य-सम्बन्धी गोएँ भी सूर्यलोकको प्राप्त करती हैं, इसमें संदेह नहीं है। देश, काल तथा विधिके अनुरूप श्रद्धापूर्वक सुपात्रको दिया गया अल्प भी दान अक्षय होता है। हे वीर ! तिलका अर्धपरिमाणमात्र सत्पात्रको दिया गया श्रद्धापूर्वक दान सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। जिसने ज्ञानरूपी जलसे स्नान कर लिया है और शीलरूपी भस्मसे अपनेको शुद्ध कर लिया है, वह सभी पात्रों में उत्तम सत्पात्र माना गया है। जप, इन्द्रियदमन और संयम मनुष्यको संसार-सागरसे पार उतारनेवाले साधन हैं। (अध्याय १८७)