भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! प्राचीन कालमें प्रतिष्ठान (पैठण) नामक नगरमें संवरण नामके एक महान् भाग्यशाली राजा थे। वे सभी शास्त्रोंमें निपुण, ब्रह्मतत्त्वके ज्ञाता, पितृभक्त तथा देव-ब्राह्मणके उपासक थे।
एक समयकी बात है, ब्रह्माजीके पुत्र महायोगी सनक राजा संवरणके पास आये। उन्हें देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिको आसन देकर प्रणाम किया तथा अर्घ्य, पाद्य आदिसे उनका सत्कार कर अपना राज्य और स्वयंको भी उनके लिये समर्पित किया। मुनिने भी राजाद्वारा किये गये अभिवादन और सत्कारको स्वीकार किया। उसके बाद ब्रह्मर्षि सनकने अनेक राजाओं, महाराजाओंके चरित और इतिहास-पुराण आदिको कथाएँ उन्हें सुनायो । राजा कथा सुनकर आत्मविभोर हो उठे। इसी अवसरपर राजा संवरणने जगत् के प्राणियोंके हितको दृष्टि से सनकजीसे प्रार्थना करते हुए कहा-'देवर्षे ! भूकम्प, उपलवृष्टि, ग्रहयुद्ध, अनावृष्टि, राज्योपद्रत आदि उत्पातोंकी शान्तिके लिये कोई उपाय बतानेको कृपा करें, जिससे कि धन-धान्यकी वृद्धि, आरोग्य, सुख और स्वर्गको प्राप्ति हो।' राजा संवरणकी प्रार्थनाको सुनकर समकजीने कहा-'राजन् ! सभी कार्योको सिद्धि करनेवाले शान्तिप्रद कोटिहोमको विधि बता रहा हैं, जिसके करनेसे बाहत्यादि पालक दूर जाते हैं। सभी उत्पात शान्त हो जाते हैं। साथ हो आरोग्य एवं सुखकी भी प्राप्ति होती है। इसका विधान इस प्रकार है-
सबसे पहले शुद्ध गहरा देखकर देवालय, नदीके तटपर, वनमें अथवा घरमें कोटिहोम करना चाहिये। सर्वप्रथम वेदवेत्ता ब्राह्मणका वरण कर गन्ध, अक्षत, पुष्प, माला, वस्त्र, आभूषण आदिसे उनका पूजन कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-
त्वं नो गतिः पिता माता त्वं गतिस्त्वं परायणः ।
त्वत्प्रसादेन विप्रर्षे सर्व मे स्यान्मनोगतम् ।।
आपद्विमोक्षाय च मे कुरु यज्ञमनुत्तमम्।
कोटिहोमाख्यमतुलं शान्त्यर्थं सार्वकामिकम्।
(उत्तरपर्व १४२॥ १७-१८)
'विप्र श्रेष्ठ! आप ही हमलोगोंके माता-पिता हैं, आप ही हमारे आश्रय हैं और आप ही गति हैं। आपके अनुग्रहसे हमारे सभी मनोरथ परिपूर्ण हो जायें। आपत्तिसे छुटकारा ग्रास करनेके लिये तथा सार्वकामिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आप कोटिहोम नामक उत्तम यज्ञ करा दें।'
आचार्यको भी शेत वस्त्र आदिसे अलंकृत होकर विद्वान् ब्राह्मणों के साथ पुण्याहवाचन करना चाहिये। पूर्व और उत्तरकी और डालयुक्त समतल भूमिपर बने हुए मण्डपको ब्राह्मण सूत्रद्वारा बेर दे। मण्डपका प्रमाण इस प्रकार है-एक सौ हाथ विस्तारका मण्डप उत्तम, पचास हाथका मध्यम तथा पच्चीस हाथका मण्डप निकृष्ट है, किंतु शक्ति और सामयंक अनुसार ही मण्डप बनाकर उसके बीच में आठ हाथ लम्बा-चौड़ा, तीन मेखलासे युक्त, बारह अंगुलके विस्तारयुक्त योनिसहित एक चौरस कुण्ड बनाना चाहिये। कुण्डके पूर्व दिशामें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये, जो एक हाथ ऊँची हो। उसमें सभी देवताओको स्थापित करे। मण्डपको भूमिको गोबर मिट्टीसे अच्छी तरह लीपकर
पञ्चपल्लवोंसे सुसज्जित जलपूर्ण चौदह कलशोंको स्थापित करना चाहिये। मण्डपके ऊपर वितान और तोरण लगाने चाहिये। सब सामग्री एकत्रित कर पुण्याहवाचन, स्वस्तिवाचन, जयशब्दपूर्वक शुद्ध दिनसे पुरोहितको हवन प्रारम्भ करना चाहिये। मण्डपके पूर्वमें ब्रह्मा, मध्यमें विष्णु, पश्चिममें रुद्र, उत्तरमें वसु, ईशानमें ग्रह, अग्रिकोणमें मरुत् और शेष दिशाओं में लोकपालोंकी (वेदियोंपर) स्थापना करे । गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे वैदिक और पौराणिक मन्त्रोंद्वारा सबका अलग- अलग पूजन और प्रार्थना करे।
इसके पश्चात् वेदपाठी ब्राह्मणोंसहित विधानपूर्वक कुण्डका संस्कार करे। कुण्डमें अग्नि प्रज्वलितकर उस अग्निका नाम घृतार्चिष रखे। विद्यावृद्ध, वयोवृद्ध, गृहस्थ, जितेन्द्रिय, स्वकर्मनिष्ठ शुद्ध और ज्ञानशक्तिसम्पन्न एक सौ ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे अथवा जिस संख्या में उत्तम ब्राह्मण उपलब्ध हों, उनका ही वरण करना चाहिये। इसके बाद पञ्चमुख अग्निका ध्यान करना चाहिये। नामसहित उनकी सात निहाओंकी पूजा करनी चाहिये। धुआँयुक्त अग्निमें हवन करना व्यर्थ होता है। इसलिये प्रचलित अग्रिमें ही हवन करना चाहिये।
ऋग्वेदी ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख, यजुर्वेदीको उत्तराभिमुख, सामवेदीको पश्चिमाभिमुख और अथर्वणवेदी ब्राह्मणको दक्षिणाभिमुख बैठकर आधार और आयभागकी आहुतियाँ देनी चाहिये। पहले ब्रह्माकर स्थापन कर इस कर्मको आरम्भ करना चाहिये। आदिमें प्रणव' लगाकर अन्त में 'स्वाहा' शब्दका उच्चारण कर व्याहृतियोंसे हवन करना चाहिये वो काला तिल तथा जी मिलाकर पलाशको लांमधाति कोटिहोम करना चाहिये। एक हजार आति पूर्ण होने पर पूर्णाहुति करनी चाहिये । पुनः उसी प्रकार वा करना चाहिये। इस विधिसे कोटिहोम करना चाहिये। इसमें दस हजार बार पूर्णाहुतियाँ दी जाती हैं। इसमें सभी ब्राह्मणों और यजमानको काम, क्रोध आदि दोषोंसे दूर रहना चाहिये। कोटिहोमकी विधिको सुनकर राजा संवरणने कहा कि महर्षे ! इस कोटिहोममें बहुत अधिक समय लगेगा, इतने दिनतक संयमसे रहना बहुत ही कठिन कार्य है। इसलिये कृपाकर आप कोटिहोमकी संक्षिप्त विधि बतानेका कष्ट करें, जिससे कम समयमें यह निर्विघ्न पूर्ण हो जाय।
राजाके इस प्रकारके वचनको सुनकर सनक मुनिने कहा-'राजन् ! कोटिहोम चार प्रकारका होता है-शतमुख, दशमुख, द्विमुख और एकमुख। समयानुसार इन चारों से जो भी होम हो सके वही करना चाहिये। एक हाथ प्रमाणवाले उत्तम एक सौ कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डुपर एक-एक ब्राह्मणको अथवा समय कम रहनेपर प्रत्येक कुण्डपर दस-दस ब्राह्मणोंको हवनके लिये नियुक्त करे। एक कुण्डमें अग्निका संस्कार कर उसी अग्निको अन्य कुण्डों में भी प्रज्वलित करना चाहिये। इस विधिद्वारा जो हवन किया जाता है, उससे एक ही कोटिहोम होता है, जो शतमुख होम कहलाता है। यदि समयका अभाव न हो तो दस कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर बीस-बीस ब्राहाण हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। यह दशमुख नामक कोटिहोम है। यदि महीने-दो-महीनेका समय हो तो दो कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर पचास-पचास ब्राह्मणोंको हवनके लिये आमन्त्रित करना चाहिये। यह द्विमुख कोटिहोम है। अधिक-से-अधिक समय हो तो एक कुण्डमें अग्रि स्थापन कर उत्तम कुलोत्पन्न वेदवेत्ता सदाचारी ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। इस हवनमें ब्राह्मणों की संख्याका कोई नियम नहीं और समयकी सीमा भी निश्चित नहीं है। यह एकमुख कोटिहोम स्वेच्छायज्ञ कहलाता है। इस
स्वेच्छायज्ञमें बहुत समय लगता है और बीचमें | अनेक प्रकारके विघ्र भी उत्पत्र हो जाते हैं। धन और शरीरकी स्थिरताका कुछ भी भरोसा नहीं है। इसलिये संक्षेपसे ही यज्ञ करना चाहिये।'
यज्ञ सम्पन्न कर अच्छी प्रकारसे महोत्सव मनाना चाहिये। सभी ब्राह्मणोंको कटक, कुण्डल, वस्त्र, दक्षिणा, एक सौ गाय, एक सौ घोड़े और स्वर्ण आदि प्रदान करना चाहिये तथा पुरोहितकी पूजा करनी चाहिये। दीनों, अन्धों तथा कृपणों आदिको भोजन देकर अन्तमें कलशोंके जलसे अवभृथ स्नान करे और ब्राह्मण यजमानका अभिषेक करे। इस विधिसे जो राजा या व्यक्ति कोटिहोम करता है, वह आरोग्य, पुत्र, राज्यवृद्धि, ऐश्वर्य, धन-धान्य प्राप्तकर सभी प्रकारसे संतुष्ट रहता है तथा उसको ग्रहपीड़ा भी नहीं भोगनी पड़ती। राज्यमें अनावृष्टि, उत्पात, महामारी, दुर्भिक्ष आदि कभी नहीं होते। सभी तरहके पाप और ग्रहोंकी पीडाको दूर करनेवाला शान्तिदायकं यह कोटिहोम है, इसको करनेवाला व्यक्ति इन्द्रलोकको प्राप्त कर लेता है । (अध्याय १४२)