सूतजीने कहा-ब्राह्मणगण! अब मैं आपलोगोंसे पुराणों में वर्णित मण्डल-निर्माणके विषयमें कहूँगा। बुद्धिमान् व्यक्ति हाथसे नापकर मण्डलका माप निश्चित करे। फिर उसे तत्तत् स्थानों में विधि- विहित लाल आदि रंग भरे। उनमें देवताओंके अस्त्र-विशेष बाहर, मध्य और कोणमें लिखकर प्रदर्शित करे। शम्भु, गौरी, ब्रह्मा, राम और कृष्ण आदिका अनुक्रमसे निर्देश करे। फिर सीमा- रेखाको एक अङ्गुल ऊँचा उन-उन अर्ध-भागोंसे युक्त करे। शिव और विष्णुके महायागमें शम्भुसे प्रारम्भ कर देवताओंकी परिकल्पना-ध्यान करे। प्रतिष्ठामें रामपर्यन्त, जलाशयमें कृष्णपर्यन्त और दुर्गायागमें ब्रहादिको परिकल्पना करे। मण्डलका निर्माण अधम ब्राहाण एवं शूद्र न करे। सूतजीने पुनः कहा- अब मैं क्रौनका स्वरूप बतलाता हूँ। तभी शास्त्रोंमें उसका उल्लेख मिलता है जो गोपनीय है। यह क्रौन ( पक्षी विशेष)-महाकौश, मध्य-क्रौज्ञ और कनिष्ठ क्रौच गोद तीन प्रकारका वर्णित है। इसका दर्शन सैकड़ों जन्मोंमें किये गये पापोंको नष्ट करता है। मयूर, वृषभ, सिंह, क्रौञ्च और कपिको घरमें, खेतमै और वृक्षपर भूलसे भी देख ले तो उसको नमस्कार करे, ऐसा करनेसे दर्शकके सैकड़ों ब्रह्महत्याजनित पाप नष्ट हो जाते हैं। उनके पोषणसे कीर्ति मिलती है और दर्शनसे धन तथा आयु बढ़ती है। मयूर ब्रह्माका, वृषभ सदाशिवका, सिंह दुर्गाका, क्रौञ्च नारायणका, बाघ त्रिपुरसुन्दरी लक्ष्मीका रूप है। स्नानकर यदि प्रतिदिन इनका दर्शन किया जाय तो ग्रहदोष मिट जाता है। इसलिये प्रयत्नपूर्वक इनका पोषण करना चाहिये। सभी यज्ञोंमें सर्वतोभद्रमण्डल सभी प्रकारकी पुष्टि प्रदान करता है। सर्वशक्तिमान ईश्वरने साधकों के हितके लिये उसका प्रकाश किया है। सम्पूर्ण स्मार्त-यागों में सर्वतोभद्रगण्डलका विशेषरूपसे निर्माण किया जाता है और तत्-तत् स्थानों में तत्-तत् रंगोंसे पूरित किया जाता है। (अध्याय १-२)