भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीया तिथिको यमुनाने अपने घर अपने भाई यमको भोजन कराया और यमलोकमें बड़ा उत्सव हुआ, इसलिये इस तिथिका नाम यमद्वितीया है। अत: इस दिन भाईको अपने घर भोजन न कर बहिनके घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथका बना हुआ भोजन करना चाहिये। उससे बल और पुष्टिको वृद्धि होती हैं। इसके बदले बहिनको स्वर्णालंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। यदि अपनी सगी बहिन न हो तो पिताके भाईकी कन्या, मामाकी पुत्री, मौसी अथवा बुआकी बेटी-ये भी बहिनके समान हैं, इनके हाथका बना भोजन करे। जो पुरुष यमद्वितीयाको बहिनके हाथका भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुखकी प्राप्ति होती है।
राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! आपने बताया कि सब धर्मोका साधन गृहस्थाश्रम है, वह गृहस्थाश्रम स्त्री और पुरुषसे हो प्रतिक्षित होता है। पत्नीहीन पुरुष और पुरुषहीन चारो धर्म आदि साधन सम्पन्न करने में समर्थ नही होते, इसलिये आप कोई ऐसा व्रत याये जिसके अनुष्ठानसे दाम्पत्यका वियोग न हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! श्रावण मासके कृष्ण पक्षको द्वितीयाको अशून्यशयन नामक व्रत होता है। इसके करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और पुरुष पत्नीसे हीन नहीं होता। इस तिधिको लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका शय्यापर अनेक उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये। इस दिन उपवास, नक्तनत अथवा अयाचित व्रत करना चाहिये। व्रतके दिन दही, अक्षत, कन्द मूल, फल, पुष्प, जल आदि सुवर्णक पान में रखकर निममन्त्रको पढ़ते हुए चन्द्रमाको अर्घ्य देना चाहिये
गगनाङ्गणसम्भूत दुग्धाब्धिमथनोद्भव।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते ।।
(उत्तरपर्व १५ । १८)
इस विधानके साथ जो व्यक्ति चार मासतक व्रत करता है, उसको कभी भी स्त्री-वियोग प्राप्त नहीं होता एवं उसे सभी प्रकारके ऐधर्य प्राप्त होते हैं। जो स्त्री भक्तिपूर्वक इस व्रतको करती है, वह तीन जन्मतक विधवा और दुर्भगा नहीं होती यह अशून्य-द्वितीयाका व्रत सभी कामनाओं और उत्तम भोगोंको देनेवाला है, अत: इसे अवश्य करना चाहिये। (अध्याय १४-१५)