भगवान् श्रीकृष्णने कहा-युधिष्ठिर ! भाद्रपद मासकी एकादशी तिथि यदि श्रवण नक्षत्रसे युक्त हो तो उसे विजया तिथि कहते हैं, वह भक्तोको विजय प्रदान करनेवाली है। एक बार दैत्यराज बलिसे पराजित होकर सभी देवता भगवान् विष्णुको शरणमें पहुँचे और कहने लगे-'प्रभो! सभी देवताओंके एकमात्र आश्रय आप ही हैं। आप महान् कष्टसे हमारा उद्धार कीजिये। इस दैत्य बलिका आप विनाश कीजिये।' इसपर भगवान्ने कहा-'देवगणो में यह जानता हूँ कि विरोचन पुत्र बलि तीनों लोकोका कण्टक बना हुआ है, पर उसने तपस्याद्वारा अपनी आत्माकी अपने में भावना कर ली है, वह शान्त है, जितेन्द्रिय है और मेरा भक्त है, उसके प्राण मुझमें ही लगे हैं। वह सत्यप्रतिज्ञ है। बहुत दिनोंके बाद उसको तपस्याका अन्त होगा। जब मैं इसे अविनयसम्पन्न समझूगा, तब उसका अभीष्ट हरण कर लूंगा और आपको दे दूँगा। पुत्रकी इच्छासे देवमाता अदिति भी मेरे पास आयी थीं। देवताओ ! मैं उनका भी कल्याण करूँगा, अवतार लेकर देवताओं का संरक्षण और असुरोंका विनाश करूँगा। इसलिये आपलोग निश्चिन्त होकर जाये और समयकी प्रतीक्षा करें। देवगण भगवान् विष्णुको स्मरण करते हुए वापस आ गये। इधर अदिति भी भगवान् विष्णुका
ध्यान करती थीं। कुछ कालमें उन्होंने गर्भमें भगवानको धारण किया। न मासमें वामनभगवान् अदितिके गर्भसे प्रादुर्भूत हुए। उनके पैर छोटे, शरीर छोटा, सिर बड़ा और छोटे बच्चेके समान हाथ-पैर, उदर आदि थे। वामनरूपमें जब अदितिने पुत्रको देखा और जब वह कुछ कहनेको उद्यत हुई तो देवमायासे उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी।
हे नरोत्तम! भाद्रपद मासके श्रवण नक्षत्रसे युक्त एकादशी तिथिमें जब त्रिविक्रम वामन- भगवान् का पृथ्वीपर अवतार हुआ तब पृथ्वी डगमगाने लगी। दैत्योंमें, भय छा गया और देवगण प्रसन्न हो गये। महामुनि कश्यपने शिशुके जातकर्मादि संस्कार स्वयं ही किये। वामनभगवान् दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा छत्र धारणकर राजा बलिके यज्ञस्थल में गये। उन्होंने बलिसे कहा-'यज्ञपते! मुझे तीन पग भूमि प्रदान करो।' बलिने कहा-'मैंने दे दिया।' उसी समय भगवान् वामनने अपना शरीर बढ़ाना प्रारम्भ किया। भगवान्ने अपना शरीर इतना विशाल बना लिया कि एक पगसे सम्पूर्ण पृथ्वीलोकको नाप लिया तथा द्वितीय पगसे ब्रह्मलोक नाप लिया। तीसरा पग रखनेके लिये जब कोई स्थान न मिला तो देवगण, सिद्ध, ऋषि-मुनि इस कृत्यको देखकर साधु-साधु कहने लगे और भगवान्को स्तुति करने लगे। तदनन्तर सभी दैत्यगणोंको जीतकर उन्होंने दैत्यराज बलिसे कहा-'तुम अपने परिजनोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ। मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर तुम वहाँ अभीप्सित भोगोंका उपभोग करोगे। वर्तमानमें जो इन्द्र हैं, उनके बाद तुम इन्द्रत्वको प्राप्त करोगे।' बलि भगवान्को प्रणामकर प्रसन्न हो
सुतललोकको चला गया। भगवान्ने देवताओंसे कहा-'आपलोग अपने-अपने स्थानपर निशिन्त होकर रहें।' भगवान् भी संसारका कल्याण करके वहीं अन्तर्षान हो गये।
राजन्! ये सभी कर्म एकादशी तिथिको हुए थे। अतः यह तिथि देवताओंकी विजयतिथि मानी गयी है। यही एकादशी तिथि फाल्गुन मासमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त होनेपर विजया तिथि कही गयी है। एकादशीके दिन उपवासकर रात्रिमें भगवान् वामनकी प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाके समीप ही कुण्डिका, छन्त्र, चरणपादुका, यष्टि, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा मृगचर्म आदि स्थापित करना चाहिये। अनन्तर विधिवत् उनकी पूजा करनी चाहिये। निम्न मन्त्रोंसे उन्हें नमस्कार करे और प्रार्थना करे-
अनेककर्मनिर्बन्धध्वंसिनं जलशायिनम्।
नतोऽस्मि मधुरावासं माधवं मधुसूदनम् ।।
नमो वामनरूपाय नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम ।
नमस्ते मणिबन्धाय वासुदेव नमोऽस्तु ते॥
नमो नमस्ते गोविन्द वामनेश त्रिविक्रम ।
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वकामप्रदो भव।
(उत्तरपर्व ७६ । ४८-५१)
इसके अनन्तर भगवानको शयन कराये। गीत-वाद्य, स्तुति आदिके द्वारा जागरण करे। प्रात:काल उस प्रतिमाकी पूजाकर मन्त्रपूर्वक उसे ब्राहाणको निवेदित कर दे। ब्राहाणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इस व्रतके करनेसे व्रतीका एक मन्वन्तरपर्यन्त विष्णुलोकमें वास होता है, तदनन्तर वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती दानी राजा होता है। वह नीरोग, दीर्घायु एवं पुत्रवान् होता है। (अध्याय ७६)