साम्बने पूछा-भगवन् ! भगवान् सूर्यक चक्रका और उसमें स्थित पाका कितने विस्तारमें किस प्रकार निर्माण करना चाहिये तथा नेमि, अर और नाभिका विभाग किस प्रकार करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-साम्ब! चक्र चौंसठ अङ्गुलका और नेमि आठ अङ्गुलकी बनानी चाहिये। नाभिका विस्तार भी आठ अङ्गुलका होना चाहिये और पद्म नाभिका तीन गुना अर्थात् चौबीस अङ्गुलका होना चाहिये। कमलमें नाभि, कर्णिका और केसर भी बनाने चाहिये। नाभिसे कमलकी ऊँचाई अधिक होनी चाहिये। वहींपर द्वारके कोणमें कमल पुष्पके मुखकी कल्पना करनी चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र के लिये चार द्वारोंकी कल्पना करनी चाहिये। द्वारों को बनानेके पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओंका उनके नाम-मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक आवाहन कर पूजन करना चाहिये।
अर्क-मण्डलकी पूजाके लिये इस यज्ञ-क्रियाके अनुरूप दीक्षित होना चाहिये, भगवान् सूर्यने इसे मुझसे पूर्वकालमें कहा था।
साम्बने पूछा-भगवन् ! सूर्यचक्र यज्ञके लिये देवताओंने किन मन्त्रोंको कहा है? तथा यज्ञके स्वरूप और क्रमको भी आप बतानेको कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-सौम्य! सूर्यनारायणके चक्र में कमल बनाकर पूर्वकी भाँति हृदयमें स्थित भगवान् सूर्यका 'खखोल्क' नामसे कमलको कर्णिका-दलोंमें नाममन्त्रपूर्वक चतुर्थ्यन्त विभक्ति और क्रिया लगाते हुए 'नमः' लगाकर अङ्गन्यास एवं हृदयादि न्यास तथा पूजन करना चाहिये। हवन करते समय नामके अन्त में 'स्वाहा' शब्दका प्रयोग करना चाहिये। यथा-ॐ खखोल्काय स्वाहा।"ॐखखोल्काय विद्महे दिवाकराय धीमहि ।तत्रः सूर्यः प्रचोदयात् ॥' इन चौबीस अक्षरोंवाली सूर्यगायत्रीका जप सभी कोंमें करना चाहिये, अन्यथा कोका फल प्राप्त नहीं होता। यह सूर्यगायत्री ब्रह्मगोत्रवाली सर्वतत्त्वमयी तथा परम पवित्र है एवं भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है, इसलिये प्रयत्नपूर्वक मन्त्रके ज्ञान और कर्मकी विधिको जानना चाहिये। इससे अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है।
साम्बने पूछा-भगवन्! आदित्य-मण्डलमें किसकी, किस कार्यके लिये और कैसी दीक्षा होनी चाहिये? इसे बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुलीन शूद्र, पुरुष अथवा स्त्री भी सूर्य-मण्डलमें दीक्षाके अधिकारी हैं । सूर्यशास्त्रके जाननेवाले सत्यवादी, शुचि, वेदवेत्ता ब्राह्मणको गुरु बनाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम करना चाहिये। षष्ठी तिथिमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार अग्रि-स्थापन कर विधिपूर्वक सूर्य तथा अग्निकी पूजा करके हवन करना चाहिये। तदनन्तर गुरु पवित्र शिष्यको कुशों और अक्षतोंके द्वारा उसके प्रत्येक अङ्ग, सूर्यकी भावना कर उसका स्पर्श करे। शिध्य वस्त्रादिसे अलंकृत होकर पुष्प, अक्षत, गन्ध आदिसे भगवान् सूर्यकी पूजा करे तथा बलि भी दे। आदित्य, वरुण, अग्नि आदिका अपने हृदयमें ध्यान करे। घी, गुड़, दधि, दूध, चावल आदि रखकर तीन बार जलसे अग्निको सिंचितकर अग्निमें पुनः हवन करे। उसके बाद गुरु शिष्टाचारस्वरूप शिष्यको दातून दे। वह दातून दूधवाले वृक्षका हो और उसकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। दातून करनेके पश्चात् उसे पूर्व दिशामें फेंक देना चाहिये, उस दिशामें देखें नहीं। पूर्व, पश्चिम और ईशान कोणकी ओर मुख
करके दातून करना शुभ होता है और अन्य दिशाओंमें दातून करना अशुभ माना गया है।
निन्दित दिशामें दन्तधावनसे जो दोष लगता है, उसकी शान्तिके लिये पूजन-अर्चन करना चाहिये। पुनः गुरु शिष्यके अङ्गोंका स्पर्श करे। सूर्यगायत्रीका जपपूर्वक उसके आँखोंका स्पर्श करे। इन्द्रियसंयमके लिये शिष्यसे संकल्प कराये। तदनन्तर आशीर्वाद देकर उसे शयन करनेकी आज्ञा दे। दूसरे दिन आचमनकर सूर्यको प्रात:काल नमस्कारकर अग्नि-स्थापन करे और हवन करे। स्वप्नमें कोई शुभ संवाद सुने अथवा दिनमें यदि कोई अशुभ लक्षण दिखायी पड़े तो सूर्यनारायणको एक सौ आहुति दे। स्वप्नमें यदि देवमन्दिर, अग्नि, नदी, सुन्दर उद्यान, उपचन, पत्र, पुण्य, फल, कमल, चौदी आदि और वेदवेत्ता ब्राह्मण, शौर्यसम्पन्न राजा, धनाढ्य क्षत्रिय, सेवामें संलग्न कुलीन शूद्र, तत्त्वको जाननेवाला, सुन्दर भाषण देनेवाला अथवा उत्तम वाहनपर सवार, वस्त्र, रन आदिको प्राप्ति, वाहन, गाय, धान्य आदि उपकरण अथवा समृद्धिको प्राप्ति आदि स्वप्न में दिखायी दे तो उस स्वप्नको शुभ मानना चाहिये। शुभ कर्म दिखायी पड़े तो सब कार्य शुभ ही होते हैं। अनिष्टकारक स्वप्न दिखायी पड़नेपर ससमीको सूर्यचक्र लिखकर सूर्यदेवकी पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणों तथा गुरुको संतुष्ट करना चाहिये। आदित्यमण्डल पवित्र और सभीको मुक्ति प्रदान करनेवाला है। इसलिये अपने मनमें ही आदित्यमण्डलका ध्यान कर एक सौ आहुति देनी चाहिये। इस क्रमसे दीक्षा-विधि और मन्त्रका अनुसरण करते हुए आदित्यमण्डलपर पुष्पाञ्जलि प्रदान करे। इससे व्यक्तिके कुलका उद्धार हो जाता है। सूर्यप्रोक्त पुराणादिका श्रवण करना चाहिये। पूजनके बाद विसर्जन करे। सूर्यका दर्शन करनेके पश्चात् ही भोजन करना चाहिये । प्रतिमाकी छायाका और न ही ग्रह-नक्षत्र-योग और तिथिका लखन करना चाहिये । सूर्य अयन, ऋतु, पक्ष, दिन, काल, संवत्सर आदि सभीके अधिपति हैं और वे सभीके पूज्य तथा नमस्कार करने योग्य हैं। सूर्यको स्तुति, वन्दना और पूजा सदा करनी चाहिये। मन, वाणी और कर्मसे देवताओंकी निन्दाका परित्याग करना चाहिये। हाथ-पाँव धोकर, सभी प्रकारके शोकको त्यागकर शुद्ध अन्त:करणसे सूर्यको नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार संक्षेपसे मैंने सूर्य दीक्षाकी विधिको कहा है, जो सुखभोग और मुक्तिको प्रदान करनेवाली है। (अध्याय १४९)