भविष्य महा पुराण

दमनकोत्सव, दोलोत्सव तथा रथरात्रोत्सव आदिका वर्णन

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! इस संसारमें बहुत-से सुगन्धित पुष्प हैं, परंतु उनको छोडकर दमनक (दौना) नामक पुष्प देवताओंको क्यों चढ़ाया जाता है तथा दोलोत्सव और रथयागोत्सव मनानेकी क्या विधि है. इसका वर्णन करनेकी आप कृपा करें।

भगवान श्रीकमाने कहा-पार्थ ! मन्दराचल पर्वतपर दमनक नामका एक श्रेष्ठ तथा अत्यन्त सुगश्चित वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके दिव्य गन्धके प्रभावसे देवाङ्गताएँ विमुग्ध हो गया और ऋषि-मुनि भी जप, तप वेदाध्ययन आदिसे च्युत हो गये। इस प्रकार उसके गन्धसे सब लोग उन्मत्त हो गये। सभी शुभ कार्यों एवं मङ्गल कार्याने वित्र उपस्थित हो गया। यह देखकर बहाजोको बहा क्रोध उत्पन्न हुआ और वे दगनकरो बोले-'दमनक पाने तुम्ह संसार (के दोषों) के दान  (शान्त) करनेके लिये उत्पन्न किया है, किंतु तुमने सम्पूर्ण संसारको उद्वेलित कर दिया है, तुम्हारा यह काम ठीक नहीं है। सज्जनोंका कहना है कि अतिशय सर्वत्र वर्ण्य है। इसलिये ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे लोगोंमें उद्वेग न पैदा हो एकका अपकार करनेवाला व्यक्ति अधम कहा जाता है, परंतु जो अनेकोंका अपकार करने में प्रवृत्त हो गया हो, उसके लिये क्या कहा जाय? तुमने तो बहुतसे लोगोंको दुःख दिया है, इसलिये मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि कोई भी व्यक्ति तुम्हारे पुष्पको देवकार्य तथा पितृकार्यमें आजसे ग्रहण नहीं करेगा।' ब्राजीद्वारा दिये गये शापको सुनकर दमनकने कहा-'महाराज ! मैंने द्वेषवश अथवा क्रोधवश किसीका अपकार नहीं किया है। आपने ही मुझे इतना सुगन्ध दिया है कि उसके प्रभावसे सभी लोग स्वयं उन्मत्त हो जाते हैं। इसमें मेरा क्या दोष है। आपने ही मेरा ऐसा स्वभाव बनाया है। जिसकी जो प्रकृति होती है, उसे वह त्याग नहीं सकता, क्योंकि प्रकृति त्यागने में वह असमर्थ होता है। निरपराध होते हुए भी आपने मुझे शाप दिया है।' दमनककी इस तर्कसंगत बातको सुनकर ब्रह्माजीने कहा-'दमनक! तुम्हारा कथन ठीक है। मैंने तुम्हें शाप दिया है। उसका मुझे हादिक दुःख है। उसको गित्तिके लिये मैं तुझे वरदान देता हूं कि वसन्त ऋतुमें तुम सभी देवताओंके मस्तकपर चढ़ोगे। जो व्यक्ति भक्तिभावसे दमनक पुष्प देवताओंपर चढ़ायेगा, उसे सदा सुख प्राप्त होगा। गैत्र मासके शुक्ल पक्षको चतुर्दशो दमनक चतुर्दशोक नामसे विख्यात होगो और उस दिन व्रत-नियमके पालन करनेसे वतीके सभी पाप नष्ट हो जायँगे। इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान

 हो गये और दमनक भी अपने गन्धसे त्रिभुवनको वासित करता हुआ शिवजीके निवास स्थान मन्दराचलपर रहने लगा। उसी दिनसे लोकमें दमनक-पूजा प्रसिद्ध हुई।'

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब मैं दोलोत्सवका वर्णन कर रहा हूँ। किसी समय नन्दनवनमें दोलोत्सव हुआ। वसन्त-ऋतुमें देवाङ्गनाएँ और देवता मिलकर दोला-क्रीड़ा करने लगे। नन्दनवनमें यह मनोहारी उत्सव देखकर भगवती पार्वतीजीने शंकरजीसे कहा-'भगवन्! इस क्रीड़ाको आप देखें। आप मेरे लिये भी एक दोला बनवाइये, जिसपर मैं आपके साथ बैठकर दोला-क्रीड़ा कर सकूँ।' पार्वतीजीके यह कहनेपर शिवजीने देवताओंको अपने पास बुलाकर दोला बनानेको कहा। देवताओंने शिवजीके कथनानुसार सुन्दर उत्तम इष्टापूर्तमय दो स्तम्भ गाड़कर उसपर सत्यस्वरूप एक लकड़ीका पटरा रखा और वासुकि नागकी रस्सी बनाकर उसके फणोंपर बैठनेके लिये रतजटित पीठकी रचना की। उस फणके ऊपर अत्यन्त मृदुल कपास और रेशमी वस्त्र बिछाकर दोलाकी शोभा बढ़ाने के लिये मोतियोंके गुच्छों और फूल-मालाओंसे उसे सजा दिया। इस प्रकार देवताओंने अति उत्तम दोला तैयार कर भगवान् शंकरको आदरपूर्वक प्रदान किया। अनन्तर भगवान् चन्द्रभूषण भगवती पार्वतीके साथ दोलाघर बैठ गये। भगवान् शंकरके पार्षद दोला झुलाने लगे तथा जया और विजया दोनों सखियाँ चँवर डुलाने लगी। उस समय पार्वतीजीने बहुत ही मधुर स्वरमें गीत गाया, जिससे शिवजी आनन्दमन हो गये। गन्धर्व गीत गाने लगे, अप्सराएँ नाचने लगी और चारण विविध प्रकारके बाजे बजाने में संलग्न हो गये।

या यस्य जन्तोः प्रकृतिः शुभा वा यदि वेतरा।

स तस्यामेव रमते दुष्कृते सुकृते तथा।।

(उत्तरपार १३३ । १५)

अग्रि मत्स्य और शिवपुराणमें इसका अधिक विस्तारसे वर्णन हैं।

परंतु शिवजीके दोला-विहारसे सभी पर्वत काँपने लगे, समुद्र में हलचल मच गया, प्रचण्ड पवन चलने लगा, सारा लोक त्रस्त हो गया। इस प्रकार त्रैलोक्यको अति व्याकुल देखकर इन्द्रादि सभी  देवगणोंने सभीके पापोंका नाश करनेवाले शिवजीके  पास आकर प्रणाम किया और प्रार्थना कर कहने लगे-'नाथ अब आप दोला-लीलासे निवृत्त हों, क्योंकि त्रैलोक्यको क्षोभ प्राप्त हो रहा है।' इस प्रकार देवताओंकी प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने दोलासे उतरकर कहा कि 'आजसे वसन्त-ऋतुमें जो व्यक्ति इस दोलोत्सवको करेगा तथा नैवेद्य अर्पित कर तत्तद् देवताओंके मूल मन्त्रोंसे उन्हें दोलापर आरोहण करायेगा, करेगा, आनन्द मनायेगा और स्तुति पाठ करेगा, वह सभी अभीष्टोंको प्राप्त करेगा।'

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले-महाराज ! अब मैं रथयात्राका वर्णन करता हूँ।

एक बार चैत्र मासमें मलयपर देवताओंसे समावृत भगवान् शंकर शान्तभावसे विराजमान थे। इसी समय मृत्युलोकमें इधर-उधर घूमते हुए देवर्षि नारद ब्रह्मलोकसे- भगवान् शंकरके पास आये। उन्होंने भगवान् को प्रणाम किया और आसनपर बैठ गये। सर्वज्ञ भगवान् शंकरने देवर्षि नारदसे पूछा-'मुने! आपका आगमन कहाँसे हो रहा है?' नारद बोले- 'देवदेव! मैं मृत्युलोकसे आ रहा हूँ। वहाँ कामदेवके मित्र वसन्त- -ऋतुने सारा संसार अपने वशमें कर लिया है। वहाँ मन्द-मन्द सुगन्धित मलय पवन बहता है। वसन्त ऋतुके सहयोगी-कोकिल, आसमारो आदि सभी उसके कार्यमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं। नगर-नगर और ग्रास-ग्राममें वसन्त-कन्तु यह घोषणा कर रहा है कि इस संसारका हो नहीं, अपितु तीनों लोकोका स्वामी एकमात्र कामदेव है। भगवन् । उसीके शासनमें सभी लोग उन्मत- से हो रहे हैं। चैत्र मासका यह विचित्र प्रभाव देखकर मैं आपसे निवेदन करने आया हूँ।' नारदजीका वचन सुनकर भगवान् शंकर गन्धर्व, अप्सरा, मुनिगण और सभी देवताओंको साथ लेकर मृत्युलोकमें आये और उन्होंने देखा कि जैसा नारदजीने कहा था, वही स्थिति मृत्युलोकमें व्याप्त है। सब लोग उन्मत्त हो गये हैं। आनन्दमें मग्न हैं। शिवजी वसन्तकी शोभा देख ही रहे थे कि उनके साथ जो देवता आदि आये थे, वे भी आनन्दित हो गाने-बजाने लगे। वसन्तके प्रभावसे देवताओंको भी क्षुब्ध देखकर शंकरने यह विचार किया कि यह तो बड़ा अनर्थ हो रहा है। इसके प्रतीकारका कोई न कोई उपाय करना ही चाहिये जो अनर्थ होता हुआ देखकर भी उसके निवारणका उपाय नहीं करता, वह अवश्य ही विपत्तिमें पड़कर दुःखको प्राप्त करता है। अब मुझे इन सबकी उन्मादसे रक्षा करनी चाहिये और स्वामिभक्त वसन्त-ऋतुका भी सम्मान रखना चाहिये। यह विचारकर शिवजीने वसन्त ऋतुको अपने पास बुलाकर कहा कि 'वसन्त ! तुम केवल चैत्र मासमें अपना प्रभाव प्रकट करो, चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें सभी जीवोंको और विशेष रूपसे देवताओंको सुख देनेवाले हो जाओ।' अनन्तर देवताओंको स्वस्थचित्त किया और यह भी कहा - कि' जो व्यक्ति वसन्त- ऋतुमें रथयात्रोत्सव करेगा, वह इस संसारमें दिव्य भोगोंको भोगनेवाला तथा नीरोग होगा।' इतना कहकर शिवजी सभी देवताओंके साथ अपने लोकको चले गये। वसन्त ऋतु भी शिवजीके आज्ञानुसार वनमें विहार करता हुआ अन्तर्धान हो गया। उसी दिनसे लोकमें रथयात्रोत्सवका प्रचार प्रसार हुआ। जो देवताओंकी रथयात्रा करता है, उसके धन, पशु, पुत्र आदिकी वृद्धि होती है और अन्तमें वह सद्गतिको प्राप्त करता है*।

राजन्! अब आप विशेष तिथिोका वर्णन सुनें। तृतीयाको गौरी, चतुर्थीको गणपति, पञ्चमीको लक्ष्मी अथवा सरस्वती, षष्ठीको स्कन्द, सप्तमीको सूर्य, अष्टमी और चतुर्दशीको शिव, नवमीको चण्डिका, दशमीको वेदव्यास आदि शान्तचित्त ऋषि महर्षि, एकादशी तथा द्वादशीको भगवान् विष्णु, त्रयोदशीको कामदेव और पूर्णिमाको सभी देवताओंका अर्चन-पूजन करना चाहिये। इस प्रकार देवताओंकी निर्दिष्ट तिथियों में ही दमनकोत्सव, दोलोत्सव और रथयात्रा आदि उत्सव करने चाहिये। इस प्रकार वसन्त ऋतु में उत्सव करनेवाला व्यक्ति बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पुन: चक्रवर्ती राजाका पद प्राप्त करता है।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले-राजन्! जब भगवान् शंकरने अपने नेत्रकी ज्वालासे कामदेवको भस्म कर डाला था, उस समय कामदेवकी पत्रियों रति और प्रीति दोनों रो-रोकर विलाप करने लगीं। इसपर पार्वतीजीके हृदयमें दया उत्पन्न हो गयी और वे शिवजीसे प्रार्थना करने लगीं–'महाराज! आप कृपाकर इस कामदेवको जीवनदान दें और शरीर प्रदान कर दें। यह सुनकर प्रसन्न हो शिवजीने कहा-'पार्वती। यद्यपि अब यह मूर्तिमान् रूपमें जीवित नहीं हो सकता, परंतु चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको प्रतिवर्ष एक बार यह मनसे उत्पन्न होकर जीवित होगा। चैत्र मासके शुक्ल पक्षको त्रयोदशीको जो भी फामदेवका पूजन करेगा, वह वर्षभर सुखी रहेगा। इतना कहकर शिवजी कैलासपर चले गये। राजन्! इसकी विधिको सुनें-चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको स्नान कर एक अशोकवृक्ष बनाकर उसके नीचे रति, प्रीति और वसन्तसहित कामदेवकी प्रतिमाको सिंदूर और हल्दीसे बनाना चाहिये अथवा सुवर्णकी मूर्ति स्थापित करनी चाहिये। मूर्ति ऐसी होनी चाहिये, जिसकी सेवामें विद्याधरियाँ हाथ जोड़े हों, अप्सराएँ जिसके चारों तरफ खड़ी हों, गन्धर्व मृत्य कर रहे हों। इस प्रकार मध्याह्नके समय गन्ध, पुष्प, धूप, अक्षत, ताम्बूल, दीप, अनेक प्रकारके फल, नैवेद्य आदि उपचारोंसे कामदेवकी तथा अपने पतिकी भी पूजा करे। जो इस प्रकार प्रतिवर्ष कामोत्सव करता है, वह सुभिक्ष, क्षेम, आरोग्य, लक्ष्मी आदिको प्राप्त करता है। विष्णु, ब्रह्मा तथा सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह, कामदेव, वसन्त और गन्धर्व, असुर, राक्षस, सुपर्ण, नाग, पर्वत आदि उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। उसको कभी शोक नहीं होता। जो स्त्री वसन्त-ऋतुमें रति, प्रीति, वसन्त, मलयानिल आदि परिवारसहित कामदेवका भक्तिपूर्वक पूजन करती है, वह सौभाग्य, रूप, पुत्र और सुखको प्राप्त करती है।'

महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासके प्रतिपद् तिथिसे लेकर पूर्णिमातक भगवती भूतमाताका पूजनोत्सव मनाना चाहिये। अनेक प्रकारके मनोविनोदपूर्ण एवं हास्यपूर्ण गीत, नाटक आदिका आयोजन करना चाहिये। नवमी अथवा एकादशीको दीपक जलाकर अतीव भक्तिपूर्वक भगवतीके समीप ले जाने चाहिये।

इस प्रकार पूर्णिमातक प्रदोषके समय दीपमहोत्सव करना चाहिये और द्वादशीके दिन

*कालक्रमसे इस रथयात्राका प्रचलन कम हो गया, किंतु आषाढ़ शुक्ल द्वितीयाको सर्वत्र जगन्नाथजीकी रथयात्रा निकलती है, विशेषकर पुरी में।

भूतमाताका विशेष उत्सव मनाना चाहिये। इस प्रकार अनेक प्रकारके उत्सवोंसे भूतमाताका पूजन करनेवाले व्यक्ति सपरिवार प्रसन्न रहते हैं और उनके घरमें किसी प्रकारके विघ्न उत्पन्न नहीं होते। ये भूतमाता भगवती पार्वतीके अंशसे समुद्भूत हैं। (अध्याय १३३-१३६)