भविष्य महा पुराण

पौर्णमासी-व्रत-विधान एवं अमावास्यामें श्राद्ध-तर्पणकी महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन्! पूर्णिमा चन्द्रमाकी प्रिय तिथि है. क्योंकि इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओंसे परिपूर्ण होते हैं। इसीलिये यह पौर्णमासी कही जाती है। इसी तिथिको चन्द्रमा तारासे बुध नामक पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। यह पौर्णमासी तिथि सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली है। चन्द्रमाने स्वयं कहा है कि 'जो इस पूर्णिमा-तिथिमें भक्तिपूर्वक विधिवत् मेरी पूजा करेगा, मैं प्रसन्न होकर उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर दूंगा।' व्रतीको चाहिये कि पूर्णिमाके दिन प्रातः नदी आदिमें स्नान कर देवता और पितरोंका तर्पण करे। तदनन्तर घर आकर एक मण्डल बनाये और उसमें नक्षत्रोंसहित चन्द्रमाको अङ्कित कर श्वेत गन्ध, अक्षत, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, घृतपक्व नैवेद्य तथा श्वेत वस्त्र आदि उपचारोंसे चन्द्रमाका पूजन कर उनसे क्षमा प्रार्थना करे एवं सार्यकाल इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे-

वसन्तबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति नः कुरू।

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।

(उत्तरपर्व ९९.५४)

अनन्तर रात्रिमें मौन होकर शाक एवं तित्रीके चावलका भोजन करे। प्रत्येक मासकी पौर्णमासोको इसी प्रकार उपवासपूर्वक चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। यदि कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें कोई श्रद्धावान् व्यक्ति चन्द्रमाकी पूजा करना चाहे तो उसके लिये भी यही विधि बतलायी गयी है। इससे सभी अभीष्ट सुख प्राप्त होते हैं। अमावास्या तिथि पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। इस दिन दान एवं तर्पण आदि करनेसे पितरोंको तृप्ति प्राप्त होती है। जो अमावास्याको उपवास करता है, उसे अक्षय वटके नीचे श्राद्ध करनेका फल प्राप्त होता है। यह अक्षय-वर पितरों के लिये उत्तम तीर्थ है। जो अमावास्याको अक्षय-वटमें पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्धादि क्रिया करता है, वह पुण्यात्मा अपने इक्कीस कुलोंका, उद्धार कर देता है। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त पूर्णिमा व्रत करके नक्षत्रसहित चन्द्रमाकी सुवर्णकी प्रतिमा बना करके वस्त्राभूषण आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दान कर दे। व्रती यदि इस व्रतको निरन्तर न कर सके तो एक पक्षके व्रतको ही करके उद्यापन कर ले। पार्थ! पौर्णमासी-व्रत करनेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो चन्द्रमाकी तरह सुशोभित होता है और पुत्र पौत्र, धन, आरोग्य आदि प्राप्तकर बहुत कालतक सुख भोगकर अन्तरामयमें प्रयागमें प्राण त्यागकर

*मास शब्दका अर्थ चन्द्रमा होता है, हिन्दुओंके महीने अमावास्याको पूर्ण होते हैं।

विष्णुलोकको जाता है। जो पुरुष पूर्णिमाको चन्द्रमाका पूजन और अमावास्याको पितृ-तर्पण, पिण्डदान आदि करते हैं, वे कभी धन-धान्य-संतान आदिसे ज्युत नहीं होते। (अध्याय ९९)