भविष्य महा पुराण

विविध प्रकारके पापों एवं पुण्य-कर्मोंका फल

भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज! अधम कर्म करनेसे जीव मोर नरकमें गिरते हैं और अनेक प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं। उस अधम कर्मको ही पाप और अधर्म कहते हैं। चित्तवृत्तिके भेदसे अधर्मका भेद जानना चाहिये। स्थूल, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म आदि भेदोंके द्वारा करोड़ों प्रकारके पाप है। परंतु यहाँ मैं केवल बड़े-बड़े पापोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ-परस्त्रीका चिन्तन, दूसरेका अनिष्ट-चिन्तन और अकार्य (कुकर्म)-में अभिनिवेश-ये तीन प्रकारके मानस पाप है। अनियन्त्रित प्रलाप, अप्रिय, असत्य, परनिन्दा और पिशुनता अर्थात् चुगली- ये पाँच वाचिक पाप हैं। अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या कामसेवन (असंयमित जीवन व्यतीत करना) और परधन हराण-ये चार कायिक पाप हैं।

*अर्थस्योपार्जने दुःखमजिसमाधि रक्षणे ।

आये दुःखं व्यये दुःखमर्थेभ्यश्च कुतः सुखम् ।

चौरेभ्यः सतिलादग्रेः स्वस्तात् पार्थिवादपि ।

भषमर्थक्तां नित्यं मृत्योः प्रानभृतामिव ।।

से यातं पक्षिभिमांस भक्ष्यो मापदै नि ।

जले च भक्ष्यते मत्स्यैस्तथा सर्वत्र वित्तवान्।

विमोहयन्ति सम्पत्ता तापयन्ति वित्तिषु ।

खेदयत्वर्जनाकाले कदा डार्धाः सुखावहाः ॥

यथार्थपतिरुहिनो सर्वार्थानःस्पृहः ।

यतधार्थपतिद्-खी सुखी सार्थनिःस्पृहः ।।

(उत्तरपर्व ४।११-१२)

इन बारह काँक करनेसे नरककी प्राशि होती  है। इन कमौके भी अनेक भेद होते हैं। जो पुरुष संसाररूपी सागरसे उद्धार करनेवाले महादेव अथवा भगवान् विष्णुसे द्वेष रखते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी और गुरु-पत्नीगमन-ये चार महापातक हैं। इन पातोंको करनेवालोंके सम्पर्क में रहनेवाला मनुष्य पाँचवाँ महापातकी गिना जाता है। ये सभी नरकमें जाते हैं।

अब मैं उपपातौंका वर्णन करता हूँ। ब्राह्मणको कोई पदार्थ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर नहीं देना, ब्राह्मणका धन हरण करना, अत्यन्त अहंकार, अतिक्रोध, दाम्भिकत्व, कृतघ्रता, कृपणता, विषयों में अतिशय आसक्ति, अच्छे पुरुषोंसे द्वेष, परस्त्रीहरण, कुमारीगमन, स्त्री, पुत्र आदिको बेचना, स्त्री- धनसे निर्वाह करना, स्त्रीकी रक्षा न करना, ऋण लेकर न चुकाना; देवता, अग्नि, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजा और पतिव्रताकी निन्दा करना आदि उपपातक हैं। इन पापोंको करनेवाले पुरुषोंका जो संसर्ग करते हैं, वे भी पातकी होते हैं। इस प्रकार पाप करनेवाले मनुष्योंको मृत्युके बाद यमराज नरकमें ले जाते हैं। जो भूलसे पाप करते हैं, उनको गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार प्रायशित्त करना चाहिये। जो मन, वचन, कर्मसे पाप करते हैं एवं दूसरोंसे कराते हैं अथवा पाप करते हुए पुरुषोंका अनुमोदन करते हैं, वे सभी नरकमें जाते हैं और जो उत्तम कर्म करते हैं, वे स्वर्ग में सुखसे आनन्द भोगते हैं। अशुभ कर्मोका अशुभ फल और शुभ कर्मोंका शुभ फल होता है।

महाराज ! यमराजको सभामें सबके शुभ-अशुभ कर्मोका विचार चिरगुप्त आदि करते हैं। जोचको अपने कर्मानुसार फल भोगना पड़ता है। इसलिये शुभ कर्म ही करना चाहिये। किये गये कर्मका फल बिना भोगे किसी प्रकार नष्ट नहीं होता। धर्म करनेवाले सुखपूर्वक परलोक जाते हैं और पापी अनेक प्रकारके दु:खका भोग करते हुए यमलोक जाते हैं। इसलिये सदा धर्म ही करना चाहिये। जीव छियासी हजार योजन चलकर वैवस्वतपुरमें पहुंचता है। पुण्यात्माओंको इतना बड़ा मार्ग निकट ही जान पड़ता है और पापियोंके लिये बहुत लम्बा हो जाता है। पापी जिस मार्गसे चलते हैं, उसमें तीखे काँटे, कंकड़, पत्थर, कीचड़ गड्ढे और तलवारकी धारके समान तीक्ष्ण पत्थर पड़े रहते हैं तथा लोहेकी सुइयाँ बिखरी रहती हैं। उस मार्गमें कहीं अग्नि, कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र और कहीं-कहीं मक्षिका, सर्प, वृश्चिक आदि दुष्ट जन्तु घूमते रहते हैं। कहींपर डाकिनी, शाकिनी, रोग और बड़े क्रूर राक्षस दुःख देते रहते हैं। उस मार्गमें न कहीं छाया है और न जल । इस प्रकारके भयंकर मार्गसे यमदूत पापियोंको लोहेकी शृङ्खलासे बाँधकर घसीटते हुए ले जाते हैं। उस समय अपने बन्धु आदिसे रहित वे प्राणी अपने कर्मोंको सोचते हुए रोते रहते हैं। भूख और प्यासके मारे उनके कण्ठ, तालु और ओष्ठ सूख जाते हैं। भयंकर यमदूत उन्हें बार-बार ताडित करते हैं और पैरों में अथवा चोटीमें साँकलसे बाँधकर खींचते हुए ले जाते हैं। इस प्रकार दुःख भोगते भोगते वे यमलोकमें पहुँचते हैं और वहाँ अनेक यातनाएँ भोगते हैं।

पुण्य करनेवाले उत्तम मार्गसे सुखपूर्वक पहुँचकर सौम्यस्वरूप धर्मराजका दर्शन करते हैं और वे उनका बहुत आदर करते हैं, वे कहते हैं कि महात्माओ! आपलोग धन्य हैं, दूसरोंका उपकार करनेवाले हैं। आपने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये बहुत पुण्य किया है। इसलिये इस उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गको जाय। पुण्यात्मा यमराजको प्रसन्नचित्त अपने पिताकी भाँति देखते हैं, परंतु पापी लोग उन्हें भयानक रूपमें देखते हैं। यमराजके समीप ही कालाग्निके समान क्रूर कृष्णवर्ण मृत्युदेव विराजमान रहते हैं और कालकी भयंकर शक्तियाँ तथा अनेक प्रकारके रूप धारण किये सम्पूर्ण रोग वहाँ बैठे दिखायी देते हैं। कृष्णवर्णक असंख्य यमदूत अपने हाथोंमें शक्ति, शूल, अङ्कुश, पाश, चक्र, खड्ग, वज्र, दण्ड आदि शस्त्र धारण किये वहाँ स्थित रहते हैं। पापी जीव यमराजको इस रूपमें स्थित देखते हैं और यमराजके समीप बैठे हुए चित्रगुप्त उनकी भर्ती करके कहते हैं कि पापियो ! तुमने ऐसे बुरे कर्म क्यों किये? तुमने पराया धन अपहरण किया है, रूपके गर्वसे पर- स्त्रियोंका सम्पर्क किया है और भी अनेक प्रकारके पातक-उपपातक तुमने किये हैं। अब उन कर्मोका फल भोगो। अब कोई तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार पापी राजाओंका तर्जन कर चित्रगुप्त यमदूतको आज्ञा देते हैं कि इनको ले जाकर नरकोंकी अग्निमें डाल दो।

सातवें पातालमें घोर अन्धकारके बीच अति दारुण अट्ठाईस करोड़ नरक हैं, जिनमें पापी जीव यातना भोगते हैं। यमदूत वहाँ उनको ऊँचे वृक्षोंको शाखाओंमें टाँग देते हैं और सैकड़ों मन लोहा उनके पैरोंमें बाँध देते हैं। उस बोझसे उनका शरीर टूटने लगता है और वे अपने अशुभ कर्मोको यादकर रोते तथा चिल्लाते हैं। तपाये हुए काँटोसे युक्त लौह-दण्डसे और चाबुकोंसे यमदूत उन्हें बार बार ताडित करते हैं और सांपोसे कटवाते हैं। जब उनके देहोंगे घाव हो जाता है तब उनमें नमक लगाते हैं। कभी उनको उतारकर बोलते हुए तेलमें डालते हैं, वहाँसे निकालकर विष्ठाके कूपमें उनको हुबोते हैं, जिनमें कीड़े काट-काटकर खाते हैं, फिर मेद, रुधिर, पूष आदिके कुण्डोंमें उनको सकेल देते हैं। जहाँ लोहेकी चोंचवाले काक और श्वान आदि जीव उनका मांस नोच-नोच कर खाने हैं। कभी उनको तीक्ष्ण शूलोंमें पिरोते हैं। अभक्ष्य-भक्षण और मिथ्या भाषण करनेवाली जिह्वाको बहुत दण्ड मिलता है। जो पुरुष माता, पिता और गुरुको कठोर वचन बोलते हैं, उनके मुखमें जलते हुए अंगारे भर दिये जाते हैं और घावोंमें नमक भरकर खौलता हुआ तेल डाल दिया जाता है। जो अतिथिको अन्न-जल दिये बिना उसके सम्मुख ही स्वयं भोजन करते हैं, वे इक्षुकी तरह कोल्हमें पेरे जाते हैं तथा वे असितालवन नामक नरकमें जाते हैं। इस प्रकार अनेक क्लेश भोगते रहनेपर भी उनके प्राण नहीं निकलते। जिसने परनारीके साथ संग किया हो, यमदूत उसे तप्त लोहेकी नारीसे आलिङ्गन कराते हैं और पर-पुरुषगामिनी स्त्रीको तप्त लौह पुरुषसे लिपटाते हैं और कहते हैं कि 'दुष्टे! जिस प्रकार तुमने अपने पतिका परित्याग कर पर-पुरुषका आलिङ्गन किया, उसी प्रकारसे इस लौह-पुरुषका भी आलिङ्गन करो।' जो पुरुष देवालय, बाग, वापी, कूप, मठ आदिको नष्ट करते हैं और वहाँ रहकर मैथुन आदि अनेक प्रकारके पाप करते हैं, यमदूत उनको अनेक प्रकारके यन्त्रोंसे पीडित करते हैं और वे जबतक चन्द्र सूर्य हैं, तबतक नरकको अग्रिमें पड़े जलते रहते हैं। जो गुरुको निन्दा श्रवण करते हैं, उनके कानोंको दाह मिलता है। इस प्रकार जिन जिन इन्द्रियोंसे मनुष्य पाप करते हैं, वे इन्द्रियाँ कार पाता। इस प्रकारको अनेक घोर यातना पापी पुरुष सभी काम भोगते हैं, इनका सौ वर्षों में भी वर्णन नहीं हो सकता। जीव नरकोंमें अनेक प्रकारकी दारुण व्यथा भोगते रहते हैं, परंतु उनके प्राण नहीं निकलते।

इससे भी अधिक दारुण यातनाएँ हैं, मृदुचित्त पुरुष उनको सुनकर ही दहलने लगते हैं। पुत्र, मित्र, स्त्री आदिके लिये प्राणी अनेक प्रकारका पाप करता है, परंतु उस समय कोई सहायता नहीं करता। केवल एकाकी ही वह दुःख भोगता है और प्रलयपर्यन्त नरकमें पड़ा रहता है। यह ध्रुव सिद्धान्त है कि अपना किया पाप स्वयं भोगना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य शरीरको नश्वर जानकर लेशमात्र भी पाप न करे, पापसे अवश्य ही नरक भोगना पड़ता है। पापका फल दुःख है और नरकसे बढ़कर अधिक दुःख कहीं नहीं है। पापी मनुष्य नरकवासके अनन्तर फिर पृथ्वीपर जन्म लेते हैं । वृक्ष आदि अनेक प्रकारको स्थावर योनियों में वे जन्म ग्रहण करते हैं और अनेक कष्ट भोगते हैं। अनन्तर कीट, पतंग, पक्षी, 'पशु आदि अनेक योनियों में जन्म लेते हुए अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाते हैं। स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाले मनुष्य-जन्मको पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे नरक न देखना पड़े। यह मनुष्य योनि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। धर्मसे ही मनुष्यका जन्म मिलता है। मनुष्य-जन्म पाकर उसे धर्मकी वृद्धि करनी चाहिये। जो अपने कल्याणके लिये धर्मका पालन नहीं करता है, उसके समान मूर्ख कौन होगा?

यह देश सब देशोंमें उत्तम है। बहुत पुण्यसे प्राणीका जन्म भारतवर्षमें होता है। इस देश में जन्म पाकर जो अपने कल्याणके लिये पुण्य करता है, वही बुद्धिमान् है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्माके साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके वह कर लेना चाहिये। बादमें कुछ भी नहीं हो सकता। दिन-रातके बहामे नित्य आयुके ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्योंको बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी । यह तो किसीको भी निश्चय नहीं है कि किसकी मृत्यु किस समयमें होगी, फिर मनुष्यको क्योंकर धैर्य और सुख मिलता है? यह जानते हुए कि एक दिन इन सभी सामग्रियोंको छोड़कर अकेले चले जायगे, फिर अपने हाथसे ही अपनी सम्पत्ति सत्पात्रों को क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्यके लिये दान ही पाथेय अर्थात् रास्तेके लिये भोजन है। जो दान करते हैं, वे सुखपूर्वक जाते हैं। दानहीन मार्गमें अनेक दुःख पाते हैं, भूखे मरते जाते हैं। इन सब बातोंको विचारकर पुण्य ही करना चाहिये, पापसे सदा बचना चाहिये । पुण्य कर्मोसे देवत्व प्राप्त होता है और पाप करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। जो सत्पुरुष सर्वात्मभावसे श्रीसदाशिवकी शरण में जाते हैं, वे पद्मपत्रपर स्थित जलकी तरह पापोंसे लिप्त नहीं होते। इसलिये द्वन्द्वसे छूटकर भक्तिपूर्वक ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकार के पापोंसे निरन्तर बचना चाहिये। (अध्याय ५)

*आयुषः खण्डखण्डानि निपतन्ति तवाग्रस्तः।

अहोरात्रापदेशेन किमर्थं नावयुध्यसे।।