भविष्य महा पुराण

भद्राका चरित्र एवं उसके व्रतकी विधि

राजा युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! लोकमें भद्रा विष्टि नागसे प्रसिद्ध है, वह कैसी है, कौन है, वह किसकी पुत्री है, उसका पूजन किस विधिसे किया जाता है ? कृपया आप बतानेका कार करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! भदा गया। सूर्यनारायण की कया है। यह भगवान् सर्पको पली छायारो पाला है और शोभरकी सगी बहिन है। वह काले वण लोकेशब बड़े दाँत और बहुत ही भयंकर रूपवाली है। जन्मते ही वह संसारका ग्रास करनेके लिये दौड़ी, यज्ञों में विघ्र-बाधा पहुँचाने लगी और उत्सवों तथा मङ्गल यात्रा आदिमें उपद्रव करने लगी और पूरे जगत् को पीड़ा पहुँचाने लगी। उसके उचखल स्वभावको देखकर भगवान सूर्य अत्यन्त चिन्तित हो उसे और उन्होंने शीनामाका विचार किया। जब जब जिला असुर,

किन्रर आदिसे सूर्यनारायणने विवाहका प्रस्ताव रखा, तब उस भयंकर कन्यासे कोई भी विवाह करनेको तैयार न हुआ। दुःखित हो सूर्यनारायणने अपनी कन्याके विवाहके लिये मण्डप बनवाया, पर उसने मण्डप-तोरण आदि सबको उखाड़कर फेंक दिया और सभी लोगोंको कष्ट देने लगी। सूर्यनारायणने सोचा कि इस दुष्टा, कुरूपा, स्वेच्छाचारिणी कन्याका विवाह किसके साथ किया जाय । इसी समय प्रजाके दुःखको देखकर ब्रह्माजीने भी सूर्यके पास आकर उनको कन्याद्वारा किये गये दुष्कर्मोंको बतलाया। यह सुनकर सूर्यनारायणने कहा-'ब्रह्मन् ! आप हो तो इस संसारके कर्ता तथा भर्ता हैं, फिर आप मुझसे ऐसा क्यों कह रहे हैं। जो भी आप उदित समझें वही करें।' सूर्यनारायणका ऐसा वनन सुनकर ब्राजीने विष्टिको बुलाकर कहा भद्रे! वन, बालव, कौलव आदि करणों के अन्त में तुम निवास करो और जो व्यक्ति यात्रा, प्रवेश, माङ्गल्य कल्प, खेती, व्यापार, उद्योग आदि कार्य तुम्हारे समयमें करे, उन्होंमें तुम विघ्न 'करो। तीन दिन तक किसी प्रकारको बाधा न डालो। चौथे दिनके आधे भागने देवता और असुर तुम्हारी पूजा करेंगे। जो तुम्हारा आदर न करें उनका कार्य तुम ध्वस्त कर देना।' इस प्रकार विधिको उपदेश देकर ब्रह्माजी अपने धामको चले गये, इधर विधि भी देवता, दैत्य मनुष्य सब प्राणियोंको कर देती हई धूमने लगी। महाराज ! इस तरहसे पदाको उत्पत्ति हई और वह अति दुष्ट प्रकृतिको है, इसलिये माङ्गलिक कार्योंमें उसका अवश्य त्याग करना चाहिये।

भद्रा पाँच घड़ी मुखमें, दो घड़ी कण्ठमें, ग्यारह घड़ी हृदयमें, चार घड़ी नाभिमें, पाँच घड़ी कटिमें और तीन घड़ी पुच्छमें स्थित रहती है। जब भद्रा मुखमें रहती है तब कार्यका नाश होता है, कण्ठमें धनका नाश, हृदयमें प्राणका नाश, नाभिमें कलह, कटिमें अर्थभ्रंश होता है, सर पुच्छमें निश्चितरूपसे विजय एवं कार्य सिद्धि हो जाती है।

भट्टाके बारह नाम है-(१) धन्या, (२) दधिमुखी, (३) भद्रा, (४) महामारी, (५) खरानना, (६) कालरात्रि, (७) महारुद्रा, (८) विष्टि, (९) कुलपुत्रिका, (१०) भैरवी, (११) महाकाली तथा (१२) असुरक्षयकरी।

इन बारह नामोंका प्रात:काल उठकर जो स्मरण करता है, उसे किसी भी व्याधिका भय नहीं होता। रोगी रोगसे मुक्त हो जाता है और सभी ग्रह अनुकूल हो जाते हैं। उसके कार्यों में कोई विघ्न नहीं होता। युद्धमें तथा राजकुलमें वह विजय प्राप्त करता है। जो विधिपूर्वक नित्य विष्टिका पूजन करता है, नि:संदेह उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। अब मैं भद्राके व्रतकी विधि बता रहा हूँ-

राजन् ! जिस दिन भद्रा हो उस दिन उपवास करना चाहिये। यदि रात्रिके समय भद्रा हो तो दो दिनतक एकभुक्त व्रत करना चाहिये। एक प्रहरके बाद बहा ही तो तीन प्रहरतक उपवास करना चाहिये अथवा एकभुक्क रहना चाहिये। स्त्री अथवा

१-मुखे तु घटिका: पश हे कण्ठे तु सदा स्थिते।

हदि चैकादश प्रोक्ताधतसो नाभिमण्डले॥

कठ्यां परीव विज्ञेयास्तित: पुच्छे जयावहाः ।

मुखे कार्यविनाशाय ग्रीवायर्या धननाशिनी ॥

हदि प्राणहरा ज्ञेया नाभ्यां तु कलहावहा ।

कल्यामर्थपरिधशो विष्टिपच्छे धुवो जयः ।।

(उत्तरपर्य ११७ ॥ २३-२५)

२-धन्या दधिमुखी भद्रा महामारीखरानना।

कालरात्रिर्महारुदा विष्टि कुलपुत्रिका ।

भैरवी च महाकाली असुराणां क्षयंकरी ।

द्वादशैव तु नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥

न च व्याधिर्भवेत् तस्य रोगी रोगात्प्रमुच्यते ।

ग्रहा; सर्वेऽनुकूताः स्युन च विघ्रादि जायते ॥

रणे राजकुले जूते सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ (उत्तरपर्व ११७ । २७-३०)

पुरुष व्रतके दिन सुगन्ध आमलक लगाकर सर्वोषधि- युक्त जलसे स्नान करे अथवा नदी आदिपर जाकर विधिपूर्वक नान करे। देवता एवं पितरोंका तर्पण तथा पूजन कर कुशाकी भद्राकी मूर्ति बनाये और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसकी पूजा करे। भद्राके बारह नामोंसे एक सौ आठ बार हवन करनेके बाद तिल और पायस ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर तिलमिश्रित कृशरानका भोजन करना चाहिये। फिर पूजनके अन्तमें इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-

छायासूर्यसुते देवि विष्टिरिष्टार्थदायिनि ।

पूजितासि यथावित्या भने भद्रप्रदा भव ।।

(उत्तरपर्व ११५ । ३९)

इस प्रकार सत्रह भद्राव्रत कर अन्तमें उद्यापन करे। लोहेकी पीठपर भद्राकी मूर्तिको स्थापित कर काला वस्त्र पहनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे पूजन कर प्रार्थना करे। लोहा, तैल, तिल, बछड़ासहित काली गाय, काला कम्बल और यथाशक्ति दक्षिणाके साथ वह मूर्ति ब्राह्मणको दान कर देना चाहिये और विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो भी व्यक्ति भद्रावत और व्रतका उद्यापन करता है, उसके किसी भी कार्य में विघ्न नहीं पड़ता। भद्रावत करनेवाले व्यक्तिको प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा ग्रह आदि कष्ट नहीं देते। उसका इटसे वियोग नहीं होता और अन्तमें उसे सूर्यलोकको प्राप्ति होती है । ( अध्याय ११७)