भविष्य महा पुराण

विविध कर्मों में अग्निके नाम तथा होम-द्रव्योंका वर्णन

सूतजी बोले-ब्राह्मणो! अब मैं शास्त्रसम्मत विधिके अनुसार किये गये विविध यज्ञोंमें अग्निके नामोंका वर्णन करता हूँ। शतार्ध-होममें, पाँच सौ संख्यातककी आहुतिवाले यज्ञोंमें अग्निको काश्यप कहा गया है। इसी प्रकार आज्य-होममें विष्णु, तिल-यागमें वनस्पति, सहस-यागमें ब्राह्मण, अयुत- यागमें हरि, लक्ष-होममें वह्नि, कोटि-होममें हुताशन, शान्तिक कर्मोंमें वरुण, मारण-कर्ममें अरुण, नित्य- होममें अनल, प्रायश्चित्तमें हुताशन तथा अन्न-यज्ञमें लोहित नाम कहा गया है। देवप्रतिष्ठामें लोहित, वास्तुयाग, मण्ड्य तथा पाक-यागमें अमानति, प्रना-यागमें नाग, महादान में हविर्भक, गोदानमें रुद्र, कन्यादान योजक तथा तुला-पुरुष दान्गों धातारूपरे अग्निदेव स्थित रहते हैं। इसी प्रकार वृषोत्सर्गमें अग्निका सूर्य, वैषदेचकर्ममें पावक, दीक्षा ग्रहण जनार्दन, उत्पीडनमें काल, शवदाहमें कव्य, पर्णदाहमें यम, अस्थिदाह में शिखण्डिक, गर्भाधान में मरुत्, सीमन्तमें पिङ्गल, पुंसवनमें इन्द्र, नामकरणमें पार्थिव, निष्क्रमणमें हाटक, प्राशनमें शुचि, चूडाकरणमें षडानन, व्रतोपदेशमें समुद्भव, उपनयनमें बीलिहोत्र, समावर्तनमें धनञ्जय, उदरमें जठर, समुद्रमें वड़वानल, शिखामें विभु तथा स्वरादि शब्दोंमें सरीसृप नाम है। अश्वाग्निका मन्थर, रथाग्निका जातवेदस्, गजाग्निका मन्दर, सूर्याग्निका विन्ध्य, तोयाग्निका वरुण, ब्राह्मणाग्निका हविर्भुक्, पर्वताग्निका नाम क्रतुभुक् है। दावाग्निको सूर्य कहा जाता है। दीपाग्निका नाम पावक, गृह्याग्निका धरणीपति, घृताग्निका नल और सूतिकाग्निका नाम राक्षस है।

जिन द्रव्योंका होममें उपयोग किया जाता है, उनका निश्चित प्रमाण होता है। प्रमाणके बिना किया गया द्रव्योंका होम फलदायक नहीं होता। अतः शास्त्रके अनुसार प्रमाणका परिज्ञान कर लेना चाहिये। घी, दूध, पञ्चगव्य, दधि, मधु, लाजा, गुड़, ईख, पत्र-पुष्प, सुपारी, सनिघू, बीहि, डंठलके साथ जपापुष्प और केसर, कमल, जीवन्ती, मातुलुङ्ग (बिजौरा नींबू), नारियल, कूष्माण्ड, ककड़ी, गुरुच, तिंदुक, तीन पत्तोंवाली दूब आदि अनेक होम द्रव्य कहे गये हैं। भूर्जपत्र, शमी तथा समिधा प्रादेशमात्रके होने चाहिये। बिल्वपत्र तीन पत्रयुक्त, किंतु छिन्न भिन्न नहीं होना चाहिये।

पुष्प मंत्र-

विष्णुस्त्वं हि ब्रह्मा च ज्योतिषां गतिरी पर ।

गृहाण पुष्पं देवेश सानुलेपं जगद् भवेत्॥

है देवेश! आप ही ब्रह्मा, विष्णु तथा ज्योतियोंकी गति है और आप ही ईश्वर है। आप इस पुष्यको ग्रहण करें, जिससे सारा संसार पुष्मान्धसे सुवासित हो जाय।

धूप मन्त्र-

देवतानां पितॄणां च सुखमेकं सनातनम्।

धूपोऽयं देवदेवेश गृह्यतां में धनजन्यः ॥

हे देवदेवेश धनञ्जय! आच देवताओं और पितरोंके सुख प्राप्त करने में एकमात्र सनातन आधार है। आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस धृषको

औप-मन-

त्वमेकः सर्वभूतोषु रमावरेषु चरेषु च ।

पारमाणा पराकारः प्रदीपः प्राग हताम् ।

परमात्मन् । आप सम्पूर्व चराचर प्राणियों में व्या है। आपको आकृति परम उत्कृष्ट है। आप इस दीपकको ग्रहण करें।

नैवेश

अळ-नमोऽस्तु यश्चतये प्रभये जातवेदसे।

सर्वलोकहिता य नैवेद्या प्रतिगृहाता ।।

हे यापति जारवेदा आप शक्तिशाली है तथा समा संसारका कल्याण करनेवाले हैं, आपको मेवा नमस्कार हैं। मेरे द्वारा प्रदत्त इस वेधको आर ग्रहण करें । परम अन्नस्वरूप म५ भी नैवेद्य मार्ग निवेदित करे तचा गाव भी अधित करे। अनमें समस्त कर्म भगवान अग्निदेवको निवेदित कर दे.

हुताशन नमस्तुभ्यं नमस्ते रुकवाहन ।

लोकनाथ नमस्तेऽस्तु नमी जातवेदसे ।।

के हुताहानदेय! आपको नमस्कार है, स्वपनाइन लोकनाथ! उसको नमस्कार है, है अतवेद! मापको नमस्कार है, साल्भार है।

इनमें शास्त्र-निर्दिष्ट प्रमाणसे न्यूनता या अधिकता नहीं होनी चाहिये। अभीष्ट-प्राप्तिके निमित्त किये जानेवाले शान्तिकर्म शास्त्रोक्त रीतिसे सम्पन्न होने चाहिये। (अध्याय १७-१८)