भविष्य महा पुराण

अबाधक-व्रत एवं दौर्भाग्य-दौर्गन्ध्यनाशक-व्रतका माहात्म्य

राजा युधिष्ठिरने पूछा-भगवन् जनशून्य घोर वनमें, समुद्रतरणमें, संग्राममें, चोर आदिके भयमें व्याकुल मनुष्य किस देवताका स्मरण करे, जिससे उस संकटके समय उसकी रक्षा हो सके, यह आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! सर्वमङ्गला भगवती श्रीदुर्गादेवीका स्मरण करनेपर पुरुष कभी भी दुःख और भयको प्राप्त नहीं होता। भारत ! जब मैं और बलदेवजी अपने गुरु संदीपनिमुनिके यहाँ सब विद्या पढ़ चुके तो उस समय हमने गुरुदक्षिणाके लिये गुरुजीसे प्रार्थना की। तब गुरुजीने हमारा दिव्य प्रभाव जानकर यही कहा-'प्रभो! मेरा पुत्र प्रभासक्षेत्रमें गया था, वहाँ उसे समुद्र में किसी प्राणीने मार दिया, उसी पुत्रको गुरुदक्षिणाके रूपमें मुझे प्राप्त कराओ।' तब हम यमलोकमें गये और वहाँसे गुरुपुत्रको लेकर गुरुजोके समीप आये तथा गुरुदक्षिणाने रूपमें उनका पुत्र उन्हें समर्पित कर दिया। तदनन्तर गुरुको प्रणामकर जब हम चलने लगे, तब गुरुजोने कहा-'पुत्रो! इस स्थानमें तुम अपने चरणोंका चिह्न बना दो', हमने गुरुकी आज्ञाके अनुसार वैसा ही किया, फिर हम वापस घर आ गये। उसी दिनसे बलरामजीके दक्षिण पादका, मध्यमें सर्वगङ्गालाका और मेरे वाम चरणचिह्नका पुत्र प्राप्तिको कामनासे अथवा अपनी इच्छाओकी पूर्तिके लिये सभी वहाँ पूजन करते हैं। प्रत्येक मासको शुक्ल पक्षको त्रयोदशीको एकभुक्त, नक्तव्रत अथवा उपवास रहकर मृत्तिका या सुवर्णकी इनकी प्रतिमा बना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मधु आदिसे जो स्त्री अथवा पुरुष पूजन करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता है।

राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा- यदुशार्दूल! ऐसा कौन व्रत है, जिसके आचरणसे शरीरका दुर्गन्ध नष्ट हो जाय और दौर्भाग्य भी दूर हो जाय ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! इसी प्रश्नको रानी विष्णुभक्तिने जातूकार्यमुनिसे पूछा था, तब उन्होंने उनसे कहा- देवि ! ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षको त्रयोदशी में पवित्र जलाशयमें स्नान करे और शुद्ध स्थानमें उत्पन्न वेत आक, रक्त करवीर तथा निम्ब वृक्षकी पूजा करे। ये तीनों वृक्ष भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हैं। प्रात: काल सूर्योदय हो जानेपर भगवान् सूर्सका दर्शनकर उनका अपने हृदय में ध्यान करे। अनन्तर पुष्प, नैवेद्य, धूप आदि उपचारोंसे उन वृक्षोंकी पूजा करे और पूजनके अनन्तर उन्हें नमस्कार करे।

राजन् ! इस विधिसे जो स्त्री पुरुष इस व्रतको करते हैं, उनके शरीरकी दुर्गन्धि तथा उनका दौर्भाग्य दोनों हो जाते हैं और वे सौभाग्यशाली हो जाते हैं। (अध्याय ८७-८८)