भविष्य महा पुराण

निम्ब सप्तमी तथा फलसप्तमी-व्रतका वर्णन

सुमन्तुजीने कहा-हे वीर! अब मैं तृतीय निम्ब-सप्तमी (वैशाख शुक्ला सप्तमी)-को विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें। इसमें निम्ब पत्रका सेवन किया जाता है। यह सप्तमी सभी तरहके च्याधियोंको हरनेवाली है। इस दिन हाथमें शाधिनुष, शत, च और गदा धारण किये हुए

भगवान् सूर्यका ध्यान कर उनकी पूजा करनी चाहिये। भगवान् सूर्यका मूल मन्त्र है-'ॐ खरखोल्काय नमः । ॐ आदित्याय विद्महे विश्वभागाय धीमहि। तन्नः सूर्यः प्रचोदयात्।' यह सूर्यका गायत्री मन्त्र है।

पूजामें सर्वप्रथम समाहित चित्त होकर प्रयत्रपूर्वक

मन्त्रपूत जलसे पूजाके उपचारोंका प्रोक्षण करे। अपनेमें भगवान् सूर्यकी भावना करके उनका ध्यान करते हुए मन्त्रवित् हृदय आदि अङ्गोंमें मन्त्रका विन्यास करे। सम्मार्जनी मुद्रासे दिशाओंका प्रतिबोधन करे। भूशोधन करना चाहिये। पूजाको यह विधि सभीके लिये अभीष्ट फल देनेवाली है।

पवित्र स्थानमें कर्णिकायुक्त एक अष्टदल- कमल बनाये, उसमें आवाहिनी मुद्राके द्वारा भगवान् सूर्यका आवाहन करे। वहाँपर मनोहर- स्वरूप खखोल्क भगवान् सूर्यको स्नान कराये। मन्त्रमूर्ति भगवान् सूर्यकी स्थापना और स्नान आदि कर्म मन्त्रोंद्वारा करने चाहिये। आग्नेय दिशामें भगवान् सूर्यके हृदयकी, ईशानकोणमें सिरको, नैर्ऋत्यकोणमें शिखाकी एवं पूर्वदिशा में दोनों नेत्रोंकी भावना करे। इसके अनन्तर ईशानकोणमें सोम, पूर्व दिशामें मंगल, आग्नेयमें बुध, दक्षिणमें बृहस्पति, नैर्ऋत्य दिशामें शुक्ल, पश्चिममें शनि, वायव्यमें केतु और उत्तरमें राहुकी स्थापना करे। कमलकी द्वितीय कक्षामें भगवान् सूर्यके तेजसे उत्पन्न द्वादश आदित्यों-भग, सूर्य, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, चन्द्र तथा विष्णुको स्थापित करे। पूर्वमें इन्द्र, दक्षिणमें यश, पश्चिममें वरुण, उत्तरमें कुबेर, ईशानमें ईश्वर, अग्रिकोण, अग्निदेवता, नैत्यमें पितृदेव, वायव्यमें वायु तथा जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, शेष, वासुकि, रेवती, विनायक महाधेता, राजी, सुवर्चला आदि तथा अन्य देखताकि समूहको यथास्थान स्थापित करना चाहिये। सिद्धि वृद्धि, स्मृति, उत्पलमालिनी तथा को को अपने दक्षिण पाधी स्थापित करना पाहिये प्रजानी, विभा हारीता, बुद्धि, ऋद्धि विसापांनासो तथा विभावरी आदि देव शक्तियोंको अपने उत्तर भगवान् सूर्यके समीप स्थापित करना चाहिये।

इस प्रकार भगवान् सूर्य तथा उनके परिकरों एवं देव-शक्तियोंकी स्थापना करनेके अनन्तर मन्त्रपूर्वक धूप, दीप, नैवेद्य, अलंकार, वस्त्र, पुष्प आदि उपचारोंको भगवान् सूर्य तथा उनके अनुगामी देवौंको प्रदान करे। इस विधिसे जो भास्करकी सदा अर्चना करता है, वह सभी कामनाओंको पूर्ण कर सूर्यलोकको प्राप्त करता है। निम्नलिखित मन्त्रद्वारा निम्बकी प्रार्थना कर उसे भगवान्को निवेदित करके प्राशन करे-

त्वं निम्ब कटुकात्मासि आदित्यनिलयस्तथा।

सर्वरोगहरः शान्तो भव मे प्राशनं सदा॥

'हे निम्ब ! तुम भगवान् सूर्यके आश्रयस्थान हो। तुम कटु स्वभाववाले हो, तुम्हारे भक्षण करनेसे मेरे सभी रोग सदाके लिये नष्ट हो जायें और तुम मेरे लिये शान्तस्वरूप हो जाओ।' इस मन्त्रसे निम्बका प्राशन कर भगवान् सूर्यके समक्ष पृथ्वीपर बैठकर सूर्यमन्त्रका जप करे। इसके बाद यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। अनन्तर संयत- -वाक् हो लवणवर्जित मधुर भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक इस निम्ब-सप्तमीका व्रत करनेवाला व्यक्ति सभी रोगोंसे मुक्त हो सूर्यलोकको जाता है।

सुमन्तुजीने कहा- राजन् ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमी तिथिको उपवास कर भगवान् सूर्यकी सौर-विधानसे पूजा करनी चाहिये। पुनः आग्मीको स्नानकर दिवाकरकी पूजा कर ब्राह्मणों को खजूर नारियल, मातुलन (बिजौरा) तथा आपके फलोको भगवान्के सम्मुख रखना चाहिये और मार्तण्डः प्रीयताम्' ऐसा कहकर इन्हें बाहाणोंको निवेदित कर दे। यह फल ससमी कहलाती है। सर्वे भवन्तु

सफला मम कामाः समन्ततः।' ऐसा कहकर स्वयं भी उन्हीं फलोंका भक्षण करे। इस फल-सप्तमीका एक वर्षतक श्रद्धा-भक्तिपूर्वक व्रत करनेसे पुत्र- पौत्रों की प्राप्ति होती है। (अध्याय २१५)