भविष्य महा पुराण

भी उनके भक्ति-भावसे प्रभावित होना

सूतजीने कहा-मुने ! इस प्रकार देवगुरु बृहस्पति देवताओंके उत्तम माहात्म्यको कहकर अपने मुखसे अपना अंश उत्पनकर बहायोनिमें आविर्भूत ए। इरिका नगरी में वे गुरुदतके पुत्र हुए उनका नाम रोपण हुआ। वे ब्रहामा प्रदर्शक थे। उन्होंने सतसे गूंथी गयी माला धारण करना जल निमित लिक लगाना और वासुदेवके मन्त्रका जप करना आदिका जम प्रचार

*विविध भक्तमालोंमें सदन कसाईकी कथा कुछ अन्तरसे प्राप्त होती है। कल्याणके भक्तचरिताङ्क में भी इनका चरित्र अङ्कित है।

किया। वे कृष्णचैतन्यके पास आये और उनकी आज्ञासे उनका कम्बल ग्रहणकर अपनी नगरीमें आकर कृष्णके ध्यानमें रत हो गये।

हे मुने! अब आप भगवान् विष्णुका चरित्र सुनें, जिस चरित्रके सुननेसे घोर कलियुगमें भी भय नहीं होता, जब यज्ञांश कृष्णचैतन्यकी अवस्था पाँच वर्षकी हुई, उन दिनों बंगाल प्रान्तमें महात्मा ईश्वरपुरीका विशेष प्रभाव था। शारदाकी उपासनासे उनको विशेष सिद्धि प्राप्त थी, जिससे उनके मनमें अहंकार हो गया था। एक बार वे घूमते-फिरते शान्तिपुरमें आये तथा गङ्गाके तटपर रमणीय दिव्य स्तवकी रचना कर उसका पाठ करने लगे। उसी समय उधरसे चैतन्य महाप्रभु आ गये और उन्होंने स्तुति करते हुए महात्मा ईश्वरपुरीसे कहा-'महात्मन् ! आपकी रचना कुछ दोषयुक्त प्रतीत होती है।' यह सुनकर वे विद्वान् ईश्वरपुरी आश्चर्यचकित हो गये। सर्वमङ्गला शारदाने अपने आत्मीयजन ईश्वरपुरीको लज्जित देखकर हँसते हुए कहा-'यह साक्षात् यज्ञांश हरि कृष्णचैतन्य हैं। यह सुनकर ईश्वरपुरी उनके शिष्य होकर कृष्णमन्त्रके उपासक बन गये। वे वैष्णवोंमें श्रेष्ठ हुए और कृष्णचैतन्यके सेवक हो गये।

मुने! श्रीधर नामक एक शिवपूजक ब्राहाण पत्तननगरके राजाने उनसे श्रीमद्भागवत-सप्ताहकी कथा सुनी और उन्हें बहुतं धन दिया। श्रीधर धन लेकर राजाके यहाँसे चलकर अपने ससुराल आये। वहाँ एक गासतक निवास करके स्त्रीके साथ पुन: घरकी और चल पड़े। उनके साथ-साथ सात चोर गैत्री के विधासो लिये भगवान् रामकी शपथ लेकर (किंतु बुरी नीयतसे) चलने लगे। उन चोरोंने रास्ते में एक बन गिलनेपर उसके अन्तिम छोरपर श्रीधरको मार डाला और उनकी पत्नी एवं धनसहित बैलगाडीको लेकर भागने लगे। उनकी पत्नी बार-बार पीछे देखने लगी। चोरोंने कहा कि अब उधर क्या देख रही हो, तुम्हारा पति तो मर गया है। इसपर विप्रपत्नीने कहा कि 'मैं उन भगवान् रामको देख रही हूँ, जिनकी तुम लोगोंने शपथ ली थी।' इसपर सच्चिदानन्दविग्रह भगवान् श्रीराम प्रकट हो गये और उन्होंने उन सातों चोरों को मार डाला तथा उस ब्राह्मणको जीवित कर वृन्दावनमें भेज दिया। उस दिनसे वे ब्राह्मण श्रीधर वैष्णव हो गये। यज्ञांश श्रीकृष्णचैतन्यके सातवें वर्षमें उन्होंने शान्तिपुरीमें चैतन्यदेवके पास जाकर ब्रह्मज्ञानको प्राप्त किया और उनके शिष्य हो गये। फिर उन्होंने श्रीमद्भागवतकी टीका की।

सूतजीने पुनः कहा- शौनक ! काशी में शंकरकी पूजामें तत्पर रामशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण  रहते थे। शिवरात्रिके समय उन्होंने अविमुक्तेश्वर स्थानमें एकाकी जागते हुए ध्यानपूर्वक शिवपशाक्षरका जप किया । लोककल्याणकारी भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर ठस द्विज श्रेष्ठसे वर मांगनेको कहा। रामशर्माने भगवान् शिवको प्रणामकर कहा--'प्रभो! आप जिसके ध्यान में समाधिस्थ रहते हैं, वे देवता मेरे हृदयमें निवास करें।' यह कहने पर भगवान् महेश्वरने हँसते हुए कहा-'मैं भगवान् ग्रम-लक्ष्मणका तथा बलभद्रजीका सदा ही ध्यान पूजन करता रहता हूँ, उनको प्राप्त कर तुम भी सुखी होओ।' यह कहकर भगवान शिव अन्तर्हित हो गये। अनन्तर रामशर्मा भगवान रामके उपासक बन गये और जब कृष्णा चैतन्य बारह वर्ष हो गये, तब उनके पास आकर शिष्या होकर उनके पूजक हो गये। इन्होंने कृष्णवेतन्यके आदेशपर अध्यात्मरामायणकी* रचना की।

*यद्यपि यहाँ अध्यात्मरामयणका रचयिता कोई रामशर्ममा नामका व्यक्ति बताया गया हैं किंतु प्रायः सभी विद्वान् इस ग्रन्थको व्यासदेवकी रचना मानते हैं। आनन्दरामायणमें भी इस ग्रन्थकी प्रशंसा उपलब्ध है।

मुने! जीवानन्द रूपानन्द के साथ चैतन्यमहाप्रभुके चरित्रको सुनकर शान्तिपुरीमें आया। सोलह वर्षवाले कृष्ण-चैतन्यको उन दोनोंने नमस्कार कर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। जीवानन्द (जीवगोस्वामी)-ने षट्सदर्भ ग्रन्धकी रचना की। भक्तिमार्गमें अधिक निष्ठा होनेसे वे दोनों सर्वपूज्य हो गये। उनकी आज्ञासे कृष्णचैतन्यकी पूजा करते हुए उन्होंने वहाँ निवास किया। महामुनि रूपानन्दने (रूपगोस्वामी) गुरु चैतन्यमहाप्रभुकी आज्ञा मानकर दस हजार श्लोकवाले पुराणाङ्गभूत कृष्णखण्डकी रचना की। गुरुसेवामें तत्पर राधाकृष्णका पूजक होकर उन्होंने भी वहीं निवास किया।

कुछ समय बाद विष्णुस्वामी भी रमणीय शान्तिपुरीमें आये। उन्नीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यको नमस्कारकर उस ब्राह्मणने कहा- 'इस ब्रह्माण्ड में सभी देवताओंके पूज्य कौन देवता हैं?' यह सुनकर महाप्रभुने कहा-'भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव सभीके पूज्य हैं। विष्णु, रुद, ब्रह्मा आदि देवता भी सदा उनकी पूजा करते हैं। जो विष्णुभक्त शंकरार्चनमें तत्पर रहते हैं, वे शिवके प्रसादसे उत्तम वैष्णवी भक्ति प्राप्त करते हैं। वैष्णव पुरुष होकर जो लोककल्याणकारी शंकरकी पूजा नहीं करता वह सच्चा वैष्णव नहीं है।

यह सुनकर विष्णुस्वामी भी उनके गुणोंसे आकृष्ट हो उनके शिष्य हो गये और कृष्णमन्त्रकी उपासना करते हुए वे शिवको आराधनामें तत्पर हो गये एवं उनकी आज्ञासे उन्होंने वैष्णवीसहिताका वर्णन किया।

सूतजीने पुनः कहा-मुने! कृष्णपरायण मध्वाचार्य भी महाप्रभुकी विशेषताओंको जानकर रमणीय शान्तिपुरीमें आये और उन्हें नमस्कारकर शिष्य होकर उनकी आराधनामें तत्पर हो गये। (अध्याय १९)