भविष्य महा पुराण

जलधेनु-दानके प्रसंगमें महर्षि मुद्गलका आख्यान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-महाराज! अब मैं जलधेनु-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे देवाधिदेव भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। उत्तम जलसे पूर्ण एक कलश स्थापित करे, उसमें पञ्चरत्न, धान्य, दूर्वा, पञ्चपल्लव, कुष्ठसंज्ञक ओषधि, खश, जटामांसी, मुरा, प्रियंगु और आँवला छोड़े। फिर उसे दो श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीत और पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे । कुशके आसनपर कलशको रखकर उसके आस-पास जूता, छाता आदि तथा चारों दिशाओं में चाँदीके चार पात्रोंमें तिल, दही, घृत और मधु भरकर रखे। कलशमें सवत्सा धेनुकी कल्पना कर उसे गोमयसे उपलिप्त कर दे। पूँछके स्थानपर माला लटका दे। समीपमें दोहनपात्र भी रख ले। इसके बाद सब उपचारोंसे भगवान् विष्णुको यथाशक्ति पूजा कर उस कलशमें जलधेनुकी अभिमन्त्रणा करे और इस प्रकार कहे-

विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः ।

सोमशक्रार्कशक्तियां धेनुरूपेण साऽस्तु मे॥

(उत्तरपर्व १५३।८)

'जो गौमाता भगवान् विष्णुके वक्षःस्थलमें लक्ष्मीके रूपमें निवास करती हैं और अग्निदेवकी पत्नी स्वाहा तथा चन्द्रमा, सूर्य एवं इन्द्रको शक्ति रूपमें प्रतिष्ठित हैं वे मेरे लिये इस जलरूपी कलशमें अधिष्ठित हों।'

इस मन्त्रसे कलशमें धेनुको प्रतिष्ठितकर वत्स- समन्वित उस जलधेनुका तथा जलशायी भगवान् अच्युत गोविन्दका भलीभांति पूजन करे। तदनन्तर वीतराग और शान्तचित्त होकर भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये उस कलशस्थित जलधेनुका ब्राह्मणको दान कर दे और इस प्रकार कहे-

शेषपर्यङ्कशयनः श्रीमाञ्छाविभूषितः ।

जलशायी जगद्योनिः प्रीयतां मम केशवः॥

(उत्तरपर्व १५३ । ११)

'शेषनागरूपी शय्यापर शयन करनेवाले, शाङ्गधनुषसे विभूषित, जलशायी, जगद्योनि, श्रीसम्पन्न भगवान् केशव! आप (इस दानरूपी कर्मसे) मुझपर प्रसन्न हों।'

दान करनेके बाद उस दिन गोव्रत करना चाहिये। इस विधिसे जलधेनुका दान करनेवाला व्यक्ति सभी प्रकारके आनन्दको प्राप्त करता है तथा उसे सार्वकालिक अतुल शान्ति प्राप्त होती है एवं सभी मनोरथोंकी सिद्धि हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं।

राजन् ! इस विषयमें एक आख्यान सुना जाता हैं जो इस प्रकार है-किसी समय जातिस्पर महात्मा मुग़ल-ऋषि भ्रमण करते हुए यमलोकमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि पापी जीव अनेक प्रकारके कुम्भीपाक आदि दारुण नरकमें कष्ट भोग रहे हैं और यमराजके अति भयंकर दूत उन्हें अनेक प्रकारके दुःख दे रहे हैं। मुद्गलमुनिको देखकर नरकके जीवोंकी पीड़ा शान्त हो गयी और उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई तथा वे सुखका अनुभव करने लगे। जीवोंको सुखी देखकर मुनिको बहुत आश्चर्य हुआ, उसपर उन्होंने यमराजसे इसका कारण पूछा। यमराजने कहा-'मुने। आपको देखकर नरकके जीवोंको जो प्रसन्नता हुई है, उसका कारण यह है कि आपने तीन जन्मोंमें विधिवत् | जलधेनुका दान किया है, उसीके प्रभावसे आपका दर्शन सबको आह्लादित कर रहा है। जो आपका दर्शन करेंगे, आपका ध्यान करेंगे, आपकी चर्चा सुनेंगे अथवा आप जिन्हें देखेंगे, स्मरण करेंगे उनको भी सुख-शान्ति और आनन्द होगा। जलधेनुका दान करनेवालेको हजारों जन्मोंतक कोई क्लेश नहीं होता। इससे अधिक प्रसन्नतादायक अन्य कोई कर्म नहीं है। मुने! अब आप मेरे द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि स्वीकार कर अपने धामको जाइये। जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका आश्रय ग्रहण किया है, वे मेरे द्वारा नियमन करने योग्य नहीं हैं। जो भगवान् श्रीकृष्णका पूजन व्रत करता है, नित्य उनका ध्यान करता है, उनके कृष्ण, अच्युत, अनन्त, वासुदेव आदि नामोंका निरन्तर उच्चारण करता है, वह इस लोकमें नहीं आता। जो 'अच्युतः प्रीयताम्' ऐसा कहकर दान देता है, वह मेरे लोकमें नहीं आता। वे भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं और हम सभी उनके आज्ञाकारी हैं। मैं लोकोंका संयमन करता हूँ और मेरा संयमन भगवान् श्रीकृष्ण करते हैं।' यमराजका यह वचन सुनकर अग्नि, शस्त्र आदिसे पीड़ित सब नरकके जीव भगवान्को स्तुति करते हुए उनके पवित्र नामोंका स्मरण करने लगे। भगवान् विष्णुका स्मरण करते ही उस पुण्यकर्मके प्रभावसे नरककी अग्नि शीतल हो गयी। यमराजके सभी अस्त्र शस्त्र प्रभावशून्य हो गये, अधकार दूर हो गया। सर्वत्र प्रकाश छा गया। यमदूत मूच्छित हो गये। शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु बहने लगी। मधुर ध्वनियाँ होने लगीं। पूय और रुधिरकी नदियों में उत्तम गङ्गाजल प्रवाहित होने लगा। सभी जीव दुःखसे छूटकर उत्तम वस्त्र, आभूषण, माला आदिसे विभूषित हो गये तथा तीनों पार्कोसे मुक्त हो गये। यह अद्भुत दृश्य देखकर धर्मराज उन निष्पाप नारकीय जीवोंका पाद्यादिसे अर्चन करने लगे और इसे भगवान् विष्णुकी महिमा समझकर उनको बार-बार प्रणाम करने लगे।

यमराज इस प्रकार स्तुति कर ही रहे थे कि उनके देखते-ही-देखते नरकके सभी जीव दिव्य विमानोंमें बैठकर स्वर्ग चले गये। मुगल ऋषि भी यह सब चरित्र देखकर अपने शानमें चले आये और भगवान् विष्णुका प्रभाव तथा जलधेनु- दानके माहात्म्यका बार बार स्मरण करते हुए कहने लगे-

अहो! भगवान् विष्णुको माया बड़ी विचित्र और काठिन है, जिससे मोहित होकर प्राणी परमेश्वरको नहीं पहचान पाता। इसी कारण जीव कीट, जूँ पतङ्ग, वृक्ष, लता, पशु, पक्षी आदि योनियोंमें भ्रमण करते हैं और अपनी मुक्तिके लिये प्रयत्र नहीं करते। यह आश्चर्य है कि मायासे मोहित व्यक्ति अपना हित नहीं पहचान विष्णु भगवानकी माया यद्यपि बड़ी ही विचित्र है, परंतुलवानका आश्रयण कापर व्यक्ति उस मायाको दूर कर लेता है। जो व्यक्ति मानव-

कृष्णास्तु पूजितो यैस्तु ये कृष्णार्थमुपोधिताः ।

यैश्व नित्यं स्मृत: कृष्टो न ते महिषयोपगाः ॥

नमः कृष्णाच्युतानन्त वासुदेवेत्युदीरितम् ।

पैर्भावभावितर्विप्रन हे मदिषयोपाः ।।

 दानं दहियेस्तमच्युतः प्रीयतामिति ।

श्रद्धापुर: सरैविप्र न है मद्विषयोपगाः ।।

स एव नाथः सर्वल्य तत्रियोगकर। वयम् ।

जनसंयमनचाइमस्मसंयमनो हरिः॥

(उत्तरपर्व १५३/३०-३३)

ऐसे ही हरिगुरुवाशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः, प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः' आदि प्राय: पंद्रह श्लोक विष्णुपुराणके यमगोलाये हैं, प्रायः प्रतिदिन पठनीय है।

जन्म पाकर भी भगवान्की आराधना नहीं करता, उसका मनुष्यके रूपमें जन्म लेना ही व्यर्थ है। ऐसा कौन अभागा व्यक्ति होगा, जो भगवान् की आराधना नहीं करेगा, जबकि भक्तिपूर्वक थोड़ी- सी भी आराधना की जाय तो भगवान् विष्णु इस लोक तथा परलोकमें उसका कल्याण कर देते हैं। भगवान्को धन, वस्त्र, आभूषण आदि कुछ भी नहीं चाहिये। उन्हें तो मात्र हृदयकी भक्ति एवं शुद्ध प्रेम चाहिये । इसलिये जीव! तुम भगवान् से दूर क्यों रहते हो! हजारों जन्मोंके बाद इस कर्मभूमिमें दुर्लभ मानव-रूपमें जन्म लेकर जो व्यक्ति श्रीविष्णुकी आराधना और जलधेनुका दान नहीं करता, उस व्यक्तिका यह जन्म ही व्यर्थ है। वह व्यक्ति मायाके जालमें पड़ा रहता है। मुगल- ऋषिने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर कहा कि 'मनुष्यो! मैं पुकार-पुकारकर कहता हूँ कि आपलोगोको दोनों लोकोंमें कल्याण प्राप्त करनेके लिये श्रीविष्णुभगवान्की आराधना और जलधेनुका दान करना चाहिये। नरककी यातना अति दुःखदायिनी है, इसे मैंने, स्वयं अपनी आँखोंसे देखा है। विचार करनेपर यह सत्य ही मालूम पड़ता है कि उस दुःखसे बचनेके लिये भगवान् विष्णुमें अपने मनको लगाना चाहिये, यही श्रेयस्कर उपाय है।' (अध्याय १५३)