गौतम मुनिने कश्यपंजीसे पूछा- महात्मन् ! सर्प, सर्पिणी, बालसर्प, सूतिका, नपुंसक और व्यन्तर नामक सोंके काटने में क्या भेद होता है, इनके लक्षण आप अलग-अलग बतायें।
कश्यपजी बोले- मैं इन सबको तथा सर्पोंके रूप-लक्षणोंको संक्षेपमें बतलाता हूँ, सुनिये-
यदि सर्प काटे तो दृष्टि ऊपरको हो जाती है, सर्पिणीके काटनेसे दृष्टि नीचे, बालसर्पके काटनेसे दाहिनी ओर और बालसर्पिणीके काटनेसे दृष्टि बायीं ओर झुक जाती है। कमिणीके काटनेसे पसीना आता है, प्रसूती काटे तो रोमाश और कम्पन होता है, तथा नपुंसकके काटनेसे शरीर टूटने लगता है। सर्प दिनमें, सर्पिणी रात्रिमें और नपुंसक संध्याके समय अधिक विषयुक्त होता है। यदि अँधेरेमें, जलमें, वनमें सर्प काटे या सोते हुए या प्रमत्तको काटे, सर्प न दिखायी पड़े अथवा दिखायी पड़े, उसकी जाति न पहचानी जाय और पूर्वोक्त लक्षणोंकी जानकारी न हो तो वैद्य उसकी कैरो चिकित्सा कर सकता है।
सर्प चार प्रकारके होते हैं-दीकर, मण्डली, राजिल और व्यन्तर। इनमें दर्वाकरका विष वास- स्वभाव, मण्डलीका पित्त स्वभाव, राजिलका कफ-स्वभाव और व्यन्तर सर्पका संनिपात-स्वभावका होता है अर्थात् उसमें वात, पित्त और कफ-इन तीनोंकी अधिकता होती है। इन सर्पोके रक्तकी परीक्षा इस प्रकार करनी चाहिये। दीकर सर्पमें रक्त कृष्णवर्ण और स्वल्प होता है, मण्डलीमें बहुत गाढ़ा और लाल रंगका रक्त निकलता है, राजिल तथा व्यन्तरमें स्निग्ध और थोड़ा-सा रुधिर निकलता है। इन चार जातियोंके अतिरिक्त सर्पोकी अन्य कोई पाँची जाति नहीं मिलती। सर्प ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र-इन चार वर्णो के होते हैं। ब्राह्मण सर्प काटे तो शरीरमें दाह होता है, प्रबल मूर्छा आ जाती है, मुख काला पड़ जाता है, मज्जा स्तम्भित हो जाती है और चेतना जाती रहती है। ऐसे लक्षणों के दिखायी देनेपर अश्वगन्धा, अपामार्ग, सिंदुवारको घीमें पीसकर नस्य दे और पिलाये तो विषकी निवृत्ति हो जाती है। क्षत्रिय वर्णक सर्पके काटनेपर शरीरमें मूर्छा छा जाती है, दृष्टि ऊपरको हो जाती है, अत्यधिक पीड़ा होने लगती है और व्यक्ति अपनेको पहचान नहीं पाता। ऐसे लक्षणोंके होनेपर आककी जड़, अपामार्ग, इन्द्रायण और प्रियंगुको धीमें पीसकर मिला ले तथा इसीका नस्य देनेसे एवं पिलानेसे बाधा मिट
जाती है। वैश्य सर्प डैसे तो कफ बहुत आता है, मुखसे लार बहती है, मूर्छा आ जाती है और वह चेतनाशून्य हो जाता है। ऐसा होनेपर अश्वगन्धा, गृहधूम, गुग्गुल, शिरीष, अर्क, पलाश और श्वेत गिरिकर्णिका (अपराजिता)-इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य देने तथा पिलानेसे वैश्य सर्पकी बाधा तत्क्षण दूर हो जाती है। जिस व्यक्तिको शूद्र सर्प काटता है, उसे शीत लगकर ज्वर होता है, सभी अङ्ग चुलचुलाने लगते हैं, इसकी निवृत्तिके लिये कमल, कमलका केसर, लोध्र, क्षौद्र, शहद, मधुसार और श्वेतगिरिकर्णी-इन सबको समान भागमें लेकर शीतल जलके साथ पीसकर नस्य आदि दे और पान कराये। इससे विषका वेग शान्त हो जाता है।
ब्राह्मण सर्प मध्याहके पहले, क्षत्रिय सर्प मध्याह्नमें, वैश्य सर्प मध्याहके बाद और शूद्र सर्प संध्याके समय विचरण करता है। ब्राह्मण सर्प वायु एवं पुष्य, क्षत्रिय मूषक, वैश्य मेद्धक और शूद्र सर्प सभी पदार्थोंका भक्षण करता है। ब्राह्मण सर्प आगे, क्षत्रिय दाहिने, वैश्य बायें और शूद्र सर्प पीछेसे काटता है। मैथुनकी इच्छासे पीड़ित सर्प विषके वेगके बढ़नेसे व्याकुल होकर बिना समय भी काटता है। ब्राह्मण सपैमें पुष्पके समान गन्ध होती है, क्षत्रियमें चन्दनके समान, वैश्यमें घृतके समान और शूद सर्पमें मत्स्यके समान गन्ध होती है। ब्राह्मण सर्प नदी, कूप, तालाब, झरने, बाग-बगीचे और पवित्र स्थानों में रहते हैं। क्षत्रिय सर्प ग्राम, नगर आदिके द्वार, तालाब चतुष्पथ तथा तोरण आदि स्थानों, वैश्य सर्प शमशान, ऊपर स्थान, भस्म, पासादिके डेर तथा वृक्षोंगे। इसी प्रकार शूह सर्प अपवित्र स्थान, निर्जन जन शून्य घर, श्मशान आदि बुरे स्थानों में निवास करते है। बाहरण साधेत एवं कपिल वर्ण, अग्निके समान तेजस्वी, मनस्वी और सात्त्विक होते हैं। क्षत्रिय सर्प मूंगैके समान रक्तवर्ण अथवा सुवर्णके तुल्य पीत वर्ण तथा सूर्यके समान तेजस्वी, वैश्य सर्प अलसी अथवा बाण-पुष्पके समान वर्णवाले एवं अनेक रेखाओंसे युक्त तथा शूद्र सर्प अञ्जन अथवा काकके समान कृष्णवर्ण और धूम्रवर्णके होते हैं। एक अङ्गुष्ठके अन्तरमें दो दंश हों तो बालसर्पका काटा हुआ जानना चाहिये। दो अङ्गुल अन्तर हो तो तरुण सर्पका, ढाई अङ्गुल अन्तर हो तो वृद्ध सर्पका देश समझना चाहिये।
अनन्तनाग सामने, वासुकि बायीं ओर, तक्षक दाहिनी ओर देखता है और कर्कोटककी दृष्टि पीछेकी ओर होती है। अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापा, शंखपाल और कुलिक ये आठ नाग क्रमश: पूर्वादि आठ दिशाओं के स्वामी हैं। पा, उत्पल, स्वस्तिक, त्रिशूल, महापद्म, शूल, क्षेत्र और अर्धचन्द्र-ये क्रमश: आठ नागोंके आयुध हैं। अनन्त और कुलिक ये दोनों ब्राह्मण नाग-जातियाँ हैं, शंख और बासुकि क्षत्रिय, महापय और तक्षक वैश्य तथा पद्म और कर्कोटक शूद्र नाग हैं। अनन्त और कुलिक नाग शुक्लवर्ण तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हैं, वासुकि और शंखपाल रक्तवर्ण तथा अग्रिसे उत्पन्न है, तक्षक और महापा स्वल्प पीतवर्ण तथा इन्द्रसे उत्पन्न हैं, पर और कोंडक कृष्णवर्ण तथा यमराजसे उत्पन्न है।
सुमन मुनिने पुनः कहा-राजन् ! सपाक ये लक्षण और चिकित्सा महर्षि कश्यपले सहामुनि गौतमको उपदेला प्रसंगम कहे और यह भी बताया सहा अधिपूर्वक गोली पूजा करे बताया कि सदा भक्तिपूर्वक नागोंकी पूजा करे और पञ्चमीको विशेषरुपसे दूध, खीर आदिसे उनका पूजन करे। श्रावण शुक्ला पञ्चमीको द्वाराके दोनों ओर गोबर के द्वारा नाग बनाये। दही, दूध, दूर्वा, पुष्प, कुश, गन्ध, अक्षत और अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे नागोंका पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। ऐसा करनेपर उस पुरुषके कुलमें कभी सर्पोंका भय नहीं होता।
भाद्रपदकी पञ्चमीको अनेक रंगोंके नागोंको चित्रितकर घी, खीर, दूध, पुष्प आदिसे पूजनकर गुग्गुलकी धूप दे। ऐसा करनेसे तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते हैं और उस पुरुषकी सात पीढ़ीतकको सौंपका भय नहीं रहता।
आश्विन मासकी पञ्चमीको कुशका नाग बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उनका पूजन करे। दूध, घी, जलसे स्नान कराये। दूधमें पके हुए गेहूँ और विविध नैवेद्योंका भोग लगाये। इस पञ्चमीको नागकी पूजा करनेसे वासुकि आदि नाग संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष नागलोकमें जाकर बहुत कालतक सुखका भोग करता है। राजन्! इस पञ्चमी तिथिके कल्पका मैंने वर्णन किया। जहाँ ॐ कुरुकुल्ले फट् स्वाहा'- यह मन्त्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई सर्प नहीं आ सकता।
(अध्याय ३६-३८)
Summary of chapter 1 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Madhyama Parva is the second of the five parvas of the Bhaviṣya Mahāpurāṇa, traditionally understood as the bridge between the Sūrya-centred dharmic teachings of the Brahma Parva and the historical-prophetic narratives of the Pratisarga Parva. Detailed chapter-by-chapter content for this parva has not been available in the present sources. ---