ब्रह्माजी बोले-दिण्डिन् ! जिस आदित्यवारको हस्त नक्षत्र हो उसे पुत्रद (आदित्य-) वार कहा जाता है। उस दिन उपवास करना चाहिये और श्राद्ध करके मध्यम पिण्डका प्राशन करना चाहिये। धूप, माल्य, दिव्य गन्ध, आदि नाना प्रकारके उपचारोंसे सूर्यनारायणका पूजन कर महाश्वेता- मन्त्रको जपते हुए साधकको सूर्यनारायणके समक्ष ही शयन करना चाहिये। प्रात:कालमें ही उठकर स्नान आदिसे निवृत्त हो सूर्यभगवान्को अर्घ्य देना चाहिये। रक्त-चन्दन तथा करवीरके पुष्पोंसे पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् पाँच ब्राह्मणोंको बुलाकर उनमेंसे दो ब्राह्मणोंको मगसंज्ञक तथा तीन ब्राह्मणों को भीमसंज्ञक मानकर विधिपूर्वक पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। श्राडके समाप्त होनेपर मध्यम पिण्डको भगवान् सूर्यके सामने रखकर निम्रलिखित मन्त्रसे भक्षण करना चाहिये-
स एष पिण्डो देवेश योऽभीष्टस्तव सर्वदा।
अश्रामि पश्यते तुभ्यं तेन मे संततिर्भवेत् ।।
(ब्राह्मपर्व ८६।१०)
इस विधानसे पूजा करनेपर सूर्यनारायण निश्चित ही पुत्र प्रदान करते हैं। इस प्रकार उपवासपूर्वक व्रतको करनेसे धन-धान्य, सुवर्ण, सुख-आरोग्य तथा सूर्यलोक भी प्राप्त होता है, किंतु विशेषरूपसे पुत्र-प्राप्तिका ही फल है, इसीसे इस वारको पुत्रद कहते हैं।
ब्रह्माजीने कहा-दिण्डिन्! दक्षिणायनके दिन जो वार हो, वह जयवार कहा जाता है। इस दिन किया गया उपवास, नक्तव्रत, स्नान-दान तथा जप भगवान् सूर्यमें सौगुनी प्रीति बढ़ानेवाला होता है। अतः सूर्यमें सौगुनी प्रीति बढ़ानेवाले इस नक्त-व्रतादिको अवश्य करना चाहिये।
यदि उत्तरायणके दिन रविवार हो तो उसे जयन्तवार कहते हैं। इस दिन भगवान् सूर्य स्नान- दानादि कर्म तथा पूजन करनेवालोंको हजार गुना फल प्रदान करते हैं। इस दिन उपवास करके घृत, दूध तथा इक्षुरससे सूर्यनारायणको स्नान कराकर कुंकुमका विलेपन करना चाहिये और गुग्गुलका धूप देकर मोदकका नैवेद्य समर्पित करना चाहिये। इस प्रकार भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करके तिलसे हवन करना चाहिये। तदनन्तर यथाशक्ति ब्राहाणोंको मोदक, तिल तथा शकुली (पूरी)- का भोजन कराना चाहिये। (अध्याय ८६-८७)
Summary of chapter 55 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The final section of the primary tithi vrata cycle covers the thirteenth and fourteenth tithis. The Trayodaśī is sacred to Yama and the pitṛs; the Caturdaśī to Śiva (with Mahāśivarātri receiving full treatment). The Paurṇamāsī observances conclude the regular cycle, encompassing the major annual festivals: the Śarad Paurṇamāsī (Kaumudī-mahotsava), the Phālguna Paurṇamāsī (Holika), and the Guru Paurṇamāsī. The Paurṇamāsī vratas carry among the highest merit in the entire Uttara Parva vrata calendar.