भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-राजन्! सम्पूर्ण पापोंका नाशक, कल्याणकारक तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला अनन्तचतुर्दशी नामक एक व्रत है, जिसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सम्पन्न किया जाता है।
युधिष्ठिरने पूछा- भगवन्! आपने जो अनन्त नाम लिया है, क्या ये अनन्त शेषनाग हैं या कोई अन्य नाग हैं अथवा परमात्मा हैं या ब्रह्म हैं? अनन्त संज्ञा किसकी है? इसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! अनन्त मेरा ही नाम है। कला, काष्ठा, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग तथा कल्प आदि काल-विभागोंके रूपमें मैं ही अवस्थित हूँ। संसारका भार उतारने तथा दानवोंका विनाश करनेके लिये वसुदेवके कुलमें मैं हो उत्पन्न हुआ हूँ। पार्थ ! आप मुझे ही विष्णु, जिष्णु, हर, शिव, ब्रह्मा, भास्कर, शेष, सर्वव्यापी ईश्वर समझिये और अनन्त भी मैं ही हूँ। मैंने आपको विश्वास उत्पन्न करनेके लिये ऐसा कहा है।
युधिष्ठिरने पुन: पूछा- भगवन् ! मुझे आप अनन्त-व्रतके माहात्म्य और विधिको तथा इसे किसने पहले किया था एवं इस व्रतका क्या पुण्य है, इसे बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा- युधिष्ठिर! इस सम्बन्धमें एक प्राचीन आख्यान है, उसे आप सुनें। कृतयुगमें वसिष्ठगोत्री सुमन्तु नामके एक ब्राह्मण थे। उनका महर्षि भृगुकी कन्या दीक्षासे वेदोक्त-विधिसे विवाह हुआ था। उन्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम शीला रखा गया। कुछ समय बाद उसकी माता दीक्षाका ज्वरसे देहान्त हो गया और उस पतिव्रताको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ। सुमन्तुने पुन: एक कर्कशा नामकी कन्यासे विवाह कर लिया। वह अपने कर्कशा नामके समान ही दुःशील, कर्कश तथा नित्य कलहकारिणी एवं चण्डीरूपा थी। शीला अपने पिताके घरमें रहती हुई दीवाल, देहली तथा स्तम्भ आदिमें माङ्गलिक स्वस्तिक, पद्म, शङ्ख आदि विष्णुचिह्नोंको अङ्कित कर उनकी अर्चना करती रहती। सुमन्तुको शीलाके विवाहको चिन्ता होने लगी। उन्होंने शीलाका विवाह काँडिन्यमुनिके साथ कर दिया। विवाह के अनन्तर सुमन्तुने अपनी पत्रीसे कहा-'देवि! दामादके लिये पारितोषिक रूपमें कुछ दहेज द्रव्य देना चाहिये।' यह सुनकर कर्कशा क्रुद्ध हो उठी और उसने घरमें बने मण्डपको उखाड़ डाला तथा भोजनसे बचे हुए कुछ पदार्थोंको पाथेयके रूपमें प्रदान कर कहा-चले जाओ, फिर उसने कपाट बंद कर लिया।
काँडिन्य भी शीलाको साथ लेकर बैलगाड़ीसे धीरे-धीरे वहाँसे चल पड़े। दोपहरका समय हो
*प्रायः अन्य ज्यौतिष ग्रन्थों तथा पुराणोंके अनुसार अग्निदेवकी तिथि प्रतिपदा ही है। चतुर्दशी शिवजीकी तिथि है। यहाँ भी शिवजीकी ही पूजा है, अतः कल्पान्तर-व्यवस्था मान लेनी चाहिये।
गया। वे एक नदीके किनारे पहुंचे। शीलाने देखा ना कि शुभ वस्त्रोंको पहने हुए कुछ स्त्रियाँ चतुर्दशीके दिन भक्तिपूर्वक जनार्दनकी अलग-अलग पूजा कर रही हैं। शीलाने उन स्त्रियोंके पास जाकर पूछा-'देवियो। आपलोग यहाँ किसकी पूजा कर रही हैं, इस व्रतका क्या नाम है।' इसपर स्त्रियाँ बोली-'यह व्रत अनन्तचतुर्दशी नामसे प्रसिद्ध है।' शीला बोली-'मैं भी इस व्रतको करूँगी, इस व्रतका क्या विधान है, किस देवताकी इसमें पूजा की जाती है और दानमें क्या दिया है जाता है, इसे आपलोग बतायें।' इसपर स्त्रियोंने कहा-'शीले! प्रस्थभर पक्कानका नैवेद्य बनाकर नदीतटपर जाय, वहाँ स्नान कर एक मण्डलमें अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजा करे और कथा सुने। उन्हें नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्यका आधा भाग ब्राह्मणको निवेदित कर आधा भाग प्रसादरूपमें है ग्रहण करनेके लिये रखे। भगवान् अनन्तके सामने चौदह ग्रन्थियुक्त एक दोरक (डोरा) स्थापित ‘कर उसे कुंकुमादिसे चर्चित करे। भगवान्को वह दोरक निवेदित करके पुरुष दाहिने हाथमें और स्त्री बायें हाथमें बाँध ले। दोरक-बन्धनका मन्त्र इस प्रकार है-
अनन्तसंसारमहासमुद्रे भग्नान् समभ्युद्धर वासुदेव ।
अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते।
(उत्तरपर्व ९४ । ३३)
'हे वासुदेव! अनन्त संसाररूपी महासमुदमें डूब रही हूँ, आप मेरा उद्धार करें, साथ ही अपने अनन्तस्वरूप, मुझे भी आप विनियुक्त कर लें। हे अनन्तस्वरूप। आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।
दोरक बाँधोके अनन्तर नैवेद्य ग्रहण करना चाहिये। अन्तमें विधरूपी अनन्तदेव भगवान् नारायणका ध्यान कर अपने घर जाय। शीले। हमने इस अनन्तवतका वर्णन किया। तदनन्तर शीलाने भी विधिसे इस व्रतका अनुष्ठान किया। पाथेय निवेदित कर उसका आधा भाग ब्राह्मणको प्रदान कर आधा स्वयं ग्रहण किया और दोरक भी बाँधा। उसी समय शीलाके पति कौडिन्य भी वहाँ आये। फिर वे दोनों बैलगाड़ीसे अपने घरकी ओर चल पड़े। घर पहुँचते ही व्रतके प्रभावसे उनका घर प्रचुर धन-धान्य एवं गोधनसे सम्पन्न हो गया। वह शीला भी मणि-मुक्ता तथा स्वर्णादिके हारों और वस्त्रोंसे सुशोभित हो गयी। वह साक्षात् सावित्रीके समान दिखलायी देने लगी। कुछ समय बाद एक दिन शौलाके हाथ में बंधे अनन्त-दोरकको उसके पतिने क्रुद्ध हो तोड़ दिया। उस विपरीत कर्मविपाकसे उनकी सारी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, गोधन आदि चोरोंने चुरा लिया। सभी कुछ नष्ट हो गया। आपसमें कलह होने लगा। मित्रोंने सम्बन्ध तोड़ लिया। अनन्तभगवान्के तिरस्कार करनेसे उनके घरमें दरिद्रताका साम्राज्य छा गया। दुःखी होकर कौडिन्य एक गहन वनमें चले गये और विचार करने लगे कि मुझे कब अनन्तभगवान् के दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। उन्होंने पुनः निराहार रहकर तथा ब्रह्मचर्यपूर्वक भगवान् अनन्तका व्रत एवं उनके नामोंका जप किया और उनके दर्शनोंकी लालसासे विह्वल होकर वे पुन: दूसरे निर्जन वनमें गये। वहाँ उन्होंने एक फले-फूले आम्र-वृक्षको देखा और उससे पूछा कि क्या तुमने अनन्तभगवान्को देखा है? तब उसने कहा-'ब्राह्मण देवता। मैं अनन्तको नहीं जानता।' इस प्रकार वृक्षों आदिसे अनन्तभगवान्के विषयमें पूछते-पूछते घास चरतो हुई एक सवत्सा गौको देखा। कौडिन्यने गौसे पूछा-'धेनुके ! क्या तुमने अनन्तको देखा है ?' गौने कहा-'विभो। मैं अनन्तको नहीं जानती।'
इसके पश्चात् कौडिन्य फिर आगे बढ़े। वहाँ उन्होंने देखा कि एक वृषभ घासपर बैठा है। पूछनेपर वृषभने भी बताया कि मैंने अनन्तको नहीं देखा है। फिर आगे जानेपर कौडिन्यको दो रमणीय तालाब दिखलायी पड़े। कौडिन्यने उनसे भी अनन्तभगवान्के विषयमें पूछा, किंतु उन्होंने भी अनभिज्ञता प्रकट की। इसी प्रकार काँडिन्यने अनन्तके विषयमै गर्दभ तथा हाथीसे पूछा, उन्होंने भी नकारात्मक उत्तर दिया। इसपर वे कौडिन्य अत्यन्त निराश हो पृथ्वीपर गिर पड़े। उसी समय कौडिन्यमुनिके सामने कृपा करके भगवान् अनन्त वृद्ध ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हो गये और पुन: उन्हें अपने दिव्य चतुर्भुज विश्वरूपका दर्शन कराया। भगवान् का दर्शनकर कौंडिन्य अत्यन्त प्रसत्र हो गये और उनकी प्रार्थना करने लगे तथा अपने अपराधोंके लिये क्षमा माँगने लगे-
पापोऽहं पापकर्माहं पापात्पा पापसम्भवः ।
पाहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव ।।
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्।
(उत्तरपर्व ९४।६०-६१)
कौंडिन्यने भगवान् से पुनः पूछा-भगवन् ! घोर वनमें मुझे जो आम्रवृक्ष, वृषभ, गौ, पुष्करिणी, गर्दभ तथा हाथी मिले, वे कौन थे? आप तत्त्वतः इसे बतलायें।
भगवान् बोले-'द्विजदेव! वह आम्रवृक्ष पूर्वजन्ममें एक वेदज्ञ विद्वान् ब्राहाण था, किंतु उसे अपनी विद्याका बड़ा गर्व था। उसने शिष्योंको विद्या-दान नहीं किया, इसलिये वह वृक्ष-योनिको प्राप्त हुआ। जिस गौको तुमने देखा, वह उपजाऊ शक्तिरहित वसुन्धरा थी, वह भूमि सर्वथा निष्फल थी, अतः वह गौ बनी। वृषभ सत्य धर्मका आश्रय ग्रहणकर धर्मस्वरूप ही था। वे पुष्करिणियाँ धर्म और अधर्मकी व्यवस्था करनेवाली दो ब्राह्मणियाँ थीं। वे परस्पर बहिनें थीं, किंतु धर्म-अधर्मके विषयमें उनमें परस्पर अनुचित विवाद होता रहता था। उन्होंने किसी ब्राह्मण, अतिथि अथवा भूखेको दान भी नहीं किया। इसी कारण वे दोनों बहिनें पुष्करिणी हो गयीं, यहाँ भी लहरोंके रूपमें आपसमें उनमें संघर्ष होता रहता है। जिस गर्दभको तुमने देखा, वह पूर्वजन्ममें महान् क्रोधी व्यक्ति था और हाथी पूर्वजन्ममें धर्मदूषक था। हे विप्र ! मैंने तुम्हें सारी बातें बतला दीं। अब तुम अपने घर जाकर अनन्त व्रत करो, तब मैं तुम्हें उत्तम नक्षत्रका पद प्रदान करूंगा। तुम स्वयं संसारमें पुत्र-पौत्रों एवं सुखको प्राप्तकर अन्त में मोक्ष प्राप्त करोगे। ऐसा वर देकर भगवान् अन्तर्धान हो गये।
कौडिन्यने भी घर आकर भक्तिपूर्वक अनन्तवतजा पालन किया और अपनी पत्नी शीलाके साथ ने धर्मात्मा उत्तम सुख प्रासकर अन्तमें स्वर्ग में पुनर्वसु नामक नक्षत्रके रूप में प्रतिष्ठित हुए। जो व्यक्ति इस व्रतको करता है या इस कथाको सुनता है, वह भी भगवान के स्वरूपमें मिल जाता है। (अध्याय ९४)