भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-राजन्! एक बार कौशिकमुनि अग्निहोत्र करनेके बाद सुखपूर्वक बैठे हुए थे। उसी समय महर्षि गर्गने उनसे पूछा-'ब्रह्मन्! बंदीगृहमें निरुद्ध हो अथवा विषम परिस्थितियोंमें अवरुद्ध, दस्यु, शत्रु या हिंस पशुओंसे घिरा हो तथा व्याधियोंसे पीड़ित तो ऐसे व्यक्तिकी कैसे मुक्ति हो सकती है। इसे आप मुझे बतलायें।'
कौशिकमुनि बोले-गर्भाधानके समय, जन्म- नक्षत्रमें, मृत्यु-सम्बन्धी ज्ञान होनेपर जिसको रोग- व्याधि उत्पन्न हो जाती है, उसे कष्ट तो होता ही है, उसकी मृत्यु भी सम्भाव्य है। यदि कृत्तिका नक्षत्रमें कोई व्याधि होती है तो वह पीड़ा नौ रातत्तक बनी रहती है। रोहिणीमें तीन राततक, मृगशिरामें पाँच राततक और यदि आदमि रोग उत्पन्न हो तो वह व्याधि प्राध-वियोगिनी हो जाती है। पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्रमें सात रात, आश्लेषामें नौ रात, मधामें बीस दिन, पूर्वाफालानी में दो मास, उत्तराफाल्गुनीमें तीन- पक्ष (पैंतालीस दिन), हस्तमें स्वल्पकालिक पौड़ा, चित्रामें आधे मास, स्वातीमें दो मास, विशाखामें बीस दिन, अनुराधामें दस दिन, ज्येष्ठामें आधे मास और मूलमें मृत्यु हो जाती है। पूर्वाषाढ़ामें पंद्रह दिन, उत्तराषालामें बीस दिन, प्रवणसे दो मास, धनिष्ठामें आधा मास, शतभिषामें दस दिन, पूर्वाभाद्रपदमें नौ दिन, उत्तराभाद्रपदमें पंद्रह दिन, रेवतीमें दस दिन तथा अश्विनी में एक दिन-रात कष्ट होता है मुने। कुछ विशिष्ट नक्षत्रों में व्याधि उत्पन्न होनेपर मनुष्यके प्राणतक भी चले जाते है, इसमें संदेह नहीं। इसकी विशेष जानकारीके लिये ज्योतिषियोंसे भी परामर्श करना चाहिये।
रोगके प्रारम्भिक नक्षत्रका ज्ञान हो जानेपर उस नक्षत्रके अधिदेवताके निमित्त निर्दिष्ट द्रव्योंद्वारा हवन करनेसे रोग-व्याधिकी शान्ति हो जाती है। व्याधि नक्षत्रके किस चरणमें उत्पन्न हुई है, इसका ठीक पता लगाकर आपत्तिजनक स्थितियों में व्याधिसे मुक्तिके लिये उस नक्षत्रके स्वामीके मन्त्रोंसे अभीष्ट समिधाद्वारा हवन करना चाहिये। अश्विनी नक्षत्र में क्षीरी (दूधवाले–वट, पीपल, खिरनी आदि) वृक्षोंकी समिधासे अश्विनीकुमारोंके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। भरणी में 'यमदैवत यमाय स्वाहा०' इस मन्त्रसे घी, मधु और तिलसे हवन करना चाहिये। इसी प्रकार कृत्तिकामें भी अनिके मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। रोहिणी में प्रजापति के मन्त्रसे, मृगशिरामें पीसे, पुनर्वसुमें दितिदेवीके लिये दूध और घी- मिश्रित आहुति प्रदान करनी चाहिये। पुष्य में बृहस्थितिके मन्त्रोंसे घी और दूधद्वारा, आश्लेषाके देवता सर्प हैं, अत: बड़के दूध और घीसे मिश्रित आहुति देनी चाहिये। इसी प्रकार स्वाती, मूल आदि सभी नक्षत्रोंमें घी-मिश्रित आहुति देनी चाहिये।
मुने! ब्रहाजीने यह बतलाया है कि विधिपूर्वक गायत्री मन्त्रद्वारा भी प्राय: एक सहस्र (१,०००) घृतकी आहुतियाँ देनेपर सम्पूर्ण ज्वरों एवं व्याधियोंका सद्य: उपशमन हो सकता है। क्योंकि गायत्रीका अर्थ ही है कि गान, हवन, पूजनद्वारा त्राण करनेवाली। (अध्याय १४५)
ज्योतिर्निबन्ध आदि ज्यौतिष-प्रयोंके अनुसार आर्यो, आश्लेषा, पू०फा०, स्वाती, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ा और पू०भा० मैं मृत्युका भय होता है या बीमारी ल्पिर हो जाती है। अत: इसको निवृत्ति के लिये तत्तद् मन्त्र आदिका जप-हवन करना चाहिये।