भविष्य महा पुराण

सूर्य-प्रतिष्ठाका मुहूर्त और मण्डप बनानेका विधान

नारदजी बोले-साम्ब ! भगवान् सूर्यको स्थापनाके लिये प्रतिपदा, द्वितीया, चतुर्थी, पञ्चमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा-ये तिधियाँ प्रशस्त मानी गयी है। चन्द्रमा, भ, गुरु और शुक्र इन ग्रहों के उदित एवं अ[कूल होनेपर भगवान सूर्यको प्रतिमा की प्रतिक्षा करनी चाहिये सूर्य की स्थापनामें तीनों उत्तर, रेवतो, अश्विनी, रोहिणी हस्त, पुनर्वस,

पुण्य, श्रवण और भरणी-ये नक्षत्र प्रशस्त हैं। प्रतिष्ठाके लिये यज्ञभूमि भूसी, राख, केश आदिसे रहित एवं शुद्ध होनी चाहिये। उसमें बालू, कंकड़ एवं कोयले न हों। दस हाथ लम्बा-चौड़ा मण्डप बनवाना चाहिये। उसके चारों ओर वृक्ष, उद्यान, उपवन आदि होने चाहिये। उस गण्डपमें चार हाथ लम्बी-चौड़ी वेदीका निर्माण करे। नदीके

संगम-स्थानसे मिट्टी अथवा बालू लाकर वहाँ बिछाये। भलीभाँति मण्डपको गोबर आदिसे उपलिप्स करे, पूर्व दिशामें चतुरस्न, दक्षिण दिशामें अर्धचन्द्र, पश्चिम दिशामें वर्तुलाकार और उत्तर दिशा में पद्मके आकारवाले चार कुण्डोंका निर्माण करे। वट, पीपल, गूलर, बेल, पलाश, शमी अथवा चन्दनके द्वारा पाँच-पाँच हाथके खंभे लगाये। शुक्ल वस्त्र, पुष्पमाला, कुश आदिके द्वारा प्रत्येक खंभेको अलंकृत करे।

मण्डपके मध्यमें अलंकृत वेदीके ऊपर कुश बिछाकर पुष्पोंसे आच्छादित करे या ढककर प्रतिमाको रखे। मण्डपके आठों दिशाओंमें क्रमशः पीत, रक्त, कृष्ण, अञ्जनके समान नील, वेत, कृष्ण, हरित और चित्रवर्णकी आठ पताकाएँ आठ दिक्पालोंकी प्रसन्नताके लिये लगाये। सफेद और लाल चूर्णसे वेदीके ऊपर कमलकी आकृति बनाये। 'वेद्या वेदिः०' (यजु० १९।१७) इस मन्त्रसे वेदीका स्पर्श करे। 'योगे योगेति-' (यजु ११।१४) इस मन्त्रसे उसपर पूर्वाग्र और उत्तराग्र कुशोंको बिछाये। वहाँ उत्तम बिछावन और दो तकियोंसे युक्त एक शय्या एवं विविध भक्ष्य पदार्थों को मण्डपमें रखे। एक उत्तम श्वेत छत्र वहाँ स्थापित कर विचित्र दीपमालासे मण्डलको अलंकृत करे। (अध्याय १३४)