भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब मैं सप्तमी-कल्पका वर्णन करता हूँ। आप इसे प्रीतिपूर्वक सुनें । माघ महीनेको शुक्ला सप्तमीको संकल्पकर भगवान् सूर्यका वरुणदेव नामसे पूजन करे। अष्टमीके दिन तिल, पिष्ट, गुड़ और ओदन ब्राह्मणों को भोजन कराये, ऐसा करनेसे अनिष्टोम यज्ञ का फल प्रास होता है । फाल्गुन शुक्ला सममीको भगवान सूर्यका पूजन करनेसे वाजपेय-यजका फल प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ला सप्तमी में वेदांशु नामसे सूर्य- पूजन करनेसे उक्थ नामक यज्ञके समान पवित्र फल प्राप्त होता है। वैशाखके शुक्ल पक्षको सप्तमौको धाता नामसे पूजा करनेसे पशुबन्ध-यागके पुण्यके समान फल प्राप्त होता है। ज्येष्ठ मासको ससमीको इन्द्र नामसे सूर्यको पूजा करनेसे वाजपेय-यज्ञका दुर्लभ फल प्राप्त होता है। आषाढ़ मासकी सप्तमीको दिवाकरकी पूजा करनेसे बहुत सुवर्णकी दक्षिणावाले यज्ञका फल पास होता है। श्रावणकी सममीको मातापि (लोलार्क)-को पूजनेसे सौत्रामणि यागका
*इसी व्रतका ठोक इन्हीं श्लोकोंमें हेमाहि, जयसिंह-कल्पद्रुम तथा व्रतराज आदि निबन्ध-प्रन्थोंमें मुक्ताभरण सप्तमीके नाम से उल्लेख किया गया है और उसके श्लोक भविष्यपुराणके नामसे सूचित किये गये हैं, किंतु आशर्य है कि यहाँ इसे कुकुट-मर्कटी-सातमी नहीं कहा गया है। सम्भव है कि भविष्यपुराण के अन्य कि-हाँ हस्तलिखित प्रतियोंकी पुष्पिकामें इन्हें मुक्ताभरण-सलमी के नाम से निर्दिष्ट किया गया हो। मोनियर विलियम नामक संस्कृत अंग्रेजीके विख्यात कोष में कैटलास नामरो कुक्कुट मर्कट-राममोके नामका ही उल्लेख किया गया है।
फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें शुचि नामसे सूर्यका पूजन करे तो तुलापुरुष-दानका फल प्राप्त होता है। आश्विन शुक्ला सप्तमीको सविताको पूजा करनेसे सहल गोदानका फल मिलता है। कार्तिक शुक्ला सप्तमीमें सप्तवाहन दिनेशकी पूजा करनेसे पुण्डरीक-यागका फल प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें भानुकी पूजा करनेसे दस राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। पौष मासमें शुक्ल पक्षको सप्तमीको भास्करकी पूजा करनेसे अनेक यज्ञोंका फल मिलता है। इसी प्रकार प्रत्येक मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको भी उन-उन नामोंसे पूजा करनी चाहिये।
महाराज! इस प्रकार एक वर्षतक व्रत और पूजन कर उद्यापन करे । पवित्र भूमिपर एक हाथ, दो हाथ अथवा चार हाथ रक्त चन्दनका मण्डल बनाकर उसमें सिंदूर और गेरुका सूर्यमण्डल बनाये। कमल आदि रक्तपुध्यो, शल्लकी वृक्षके गोंद आदिसे निर्मित खूप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। अन्न तथा स्वर्णसे भरे कलशोंको उनके सामने स्थापित करे। फिर अग्निसंस्कार कर तिल, घृत, गुड़ और आककी समिधाओंसे 'आ कृष्णेन०' (यजु० ३३ । ४३) इस मन्त्रसे एक हजार आहुति दे। अनन्तर द्वादश ब्राह्मोको रक्त वस्त्र, एक-एक सवत्सा गौ, छतरी, जूता, दक्षिणा और भोजन देकर क्षमा-प्रार्थना करे । बादमें स्वयं भी मौन होकर भोजन करे।
इस विधिसे जो सप्तमीका व्रत करता है, वह नीरोग, कुशल वक्ता, रूपवान् और दीर्घायु होता है। जो पुरुष ससमीके दिन उपवास कर भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। यह उभय-सप्तमीव्रत सम्पूर्ण अशुभोंको दूर कर आरोग्य और सूर्यलोक प्राप्त करानेवाला है, ऐसा देवर्षि नारदका कहना है। (अध्याय ४७)