भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- राजन्! अब मैं आत्मप्रतिकृतिकी दान-विधि बता रहा हूँ। यह दान मान सम्मान बढ़ानेवाला है। यह किसी समय किया जा सकता है। पार्थ । अपने स्वरूपको लोहेकी एक मूर्ति बनाकर अपना जो अभीष्ट वाहन हो उसपर स्थापित करे। अपने मित्रों, बन्धुओं और सभी उपकरणोंसे युक्त होना चाहिये। वह मूर्ति रत्नों तथा वस्त्रादिसे अलंकृत हो। उसे कुंकुमसे अनुलित कर कर्पूर तथा अगरुसे सुवासित कर दे। अगर स्त्री आत्मप्रतिकृतिदान करे तो उसे अपनेको शय्यामें सोती हुई रूपमें चित्रित करे और अपने अभीष्ट पदार्टीको पासमें रखे। अपने और अपनी स्त्रीके लिये उपकारी वस्तुओंको भी वहाँ रखे। सभी वस्तुओंको यथास्थान रखकर स्नान कर श्वेत
वस्त्र धारण करे और लोकपाल, ग्रहों, गौरी, विनायककी पूजाकर हाथमें पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर ब्राह्मणके सम्मुख इस मन्त्रका उच्चारण करे-
आत्मनः प्रतिमा घेयं सर्वोपकरणैर्युता॥
सर्वरनसमायुक्ता तब विप्र निवेदिता ।
आत्माशम्भुः शिवः शौरिः शक्रःसुरगणैर्वृतः॥
तस्मादात्मप्रदानेन ममात्मा सुप्रसीदतु ।
(उत्तरपर्व १८५1१-११)
'ब्राह्मणदेवता! सभी उपकरणों और सभी रत्नोंसे युक्त यह मेरी प्रतिमा है, इसे मैं आपको समर्पित करता हूँ। मेरा आत्मा शम्भु, शिव, विष्णु तथा शक्र इस प्रतिकृतिमें अधिष्ठित है, अतः आत्मप्रतिकृतिके दानसे मेरा आत्मा प्रसत्र हो। ऐसा उच्चारण कर प्रतिमा ब्राह्मणको समर्पित करे। बाह्मण भी 'कोऽयाकस्मा'(य७४८) इस मन्त्रका पाठ करते हुए प्रतिमा ग्रहण करे। यजमान प्रदक्षिणा कर नमस्कारपूर्वक उसका विसर्जन करे। राजन्! इस विधानके साथ जो आत्मप्रतिकृति-दान देता है, वह देवताओंसे आवत होकर दिव्य सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। पुण्य क्षीण होनेके बाद वह पुरुष कामनाओंके फलको भोगते हुए राजाके रूपमें रहता है, अभीष्ट बन्धुओंके साथ उसका कभी भी वियोग नहीं होता और वह स्वर्गमें अनन्तकालतक सुख प्राप्त करता है। (अध्याय १८५)