भविष्य महा पुराण

भद्रादित्य, सौम्यादित्य और कामदादित्यवार-व्रतोंकी विधिका निरुपण

ब्रह्माजी बोले-दिण्डिन् ! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिको जो वार हो उसका नाम  भद्र है। उस दिन.जो मनुष्य नक्तव्रत और उपवास करता है, वह हंसयुस विमानमें बैठकर सूर्यलोकको  जाता है। उस दिन श्वेत चन्दन, मालती-पुष्प, विजय-धूप तथा खीरके नैवेद्यसे मध्याह्नकालमें सूर्यनारायणका पूजन करके ब्राह्मणको भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये।

दिण्डिन् ! यदि रोहिणी नक्षत्रसे युक्त आदित्यवार हो तो उसे सौम्यवार कहा जाता है। उस दिन किये जानेवाले स्नान, दान, जप, होम, पितृ-देवादि तर्पण तथा पूजन आदि कृत्य अक्षय होते हैं।

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षकी पाठी तिथिको जो चार हो, वह कामदवार कहलाता है। यह वार भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय है। इस दिन जो

यह स्तोत्र वर्तमान उपलब्ध भविष्यपुराणमें प्राप्त नहीं होता, इससे यह उसका खिल-भाग प्रतीत होता है। नारदपुराणमें उपलब्ध भविष्यपुराणको सूची भी वर्तमान में उपलब्ध भविष्यपुराणमें नहीं मिलती। कालक्रमसे पुराणोंका प्राचीन रूप न रह जानेसे आज गा सब एकत्र उपलब्ध नहीं हो पाता, परंतु प्रायः सभी बड़े स्तोत्र-संग्रहोंमें यह 'आदित्यहृदय-स्तोत्र' संगृहीत है। वाल्मीकीय रामायणमें। अगस्त्यमुनिप्रोक्त 'आदित्पइदय-स्तोत्र' भविष्यपुराणके 'आदित्यहृदय-स्तोत्र' से भिन्न है।

*महाश्वेता-मन्त्र 'गायत्री-मन्त्र' का ही अपर पर्याय प्रतीत होता है।

भक्ति और श्रद्धासे सूर्यनारायणकी पूजा करता है, वह सभी पातकोंसे विमुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। इस व्रतको करनेसे विद्यार्थीको विद्या, पुत्रेच्छुको पुत्र, धनार्थीको धन और आरोग्यके अभिलाषीको आरोग्यकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार कामदवार-व्रतसे और अन्य सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, इसीलिये इसका नाम कामद है। (अध्याय ८३-८५)